शिवौ ते स्तां व्रीहियवावबला सावदो मधौ।
एतौ यक्ष्मं विबाधेते, एतौ मुञ्चतो अंहसः॥
(अथर्व० ८।२।१८)

अर्थ—हे बालक, जौ और चावल तुम्हारे लिए बलदायक तथा पुष्टिकारक हों, क्योंकि यह दोनों वस्तुएं सभी प्रकार के यक्ष्मा-तपेदिक—नहीं होने देते तथा (देवान्न होने के कारण) मनुष्य को पाप से मुक्त करने वाले हैं

वेद के उपरोक्त मन्त्र में अन्नप्राशन संस्कार की महिमा पर प्रकाश डाला गया है। यह संस्कार उस समय किया जाता है जब कि बालक छः सात महीने का हो जाता है और उसकी पाचनशक्ति इस योग्य हो जाता है कि वह सुगमता से अन्न पचा सके। यह अवस्था प्रायः ६ महीने के बाद प्रारम्भ हो जाती है। इस समय बालक के दांत निकलने आरम्भ होते हैं। इस कार्य के सुगमता पूर्वक होने के लिए शरीर में क्षार—जोकि स्वास्थ्य के लिए उपयोगी पदार्थ है—की आवश्यकता उत्पन्न होती है, अगर उस आवश्यकता को बुद्धिमान् माता पिता, क्षार अर्थात् लवण युक्त अन्नादि द्वारा पूरा न करें तो बालक उसकी कमी मिट्टी से—जिसमें कि क्षार की मात्रा पर्याप्त होती है—पूर्ण करने लगते हैं इसलिए मातापिता को इस ओर पहिले ही ध्यान देना चाहिये।

अन्नप्राशन संस्कार इस बात का चिन्ह है कि अब से बच्चे को क्रमशः थोड़ा २ अन्न खिलाना आरम्भ कर दिया जाय और स्तन पान की मात्रा इसी प्रकार क्रमशः घटाई जाय।

यह संस्कार हमें यह भी बतलाता है कि मनुष्य का स्वाभाविक भोजन अन्न है मांस नहीं। आज का मानव इस तथ्य को भूलकर भक्ष्याभक्ष्य के नियम को तिलाञ्जलि दे सर्वभक्षी बन गया है, जिसका परिणाम स्पष्टतः आंखों के सामने है। व्रीहियवादि सात्विक अन्न खाने से उत्पन्न होने वाले पवित्रभाव आज संसार में कहां शेष है ? स्वार्थपरता, वैमनस्य और पारस्परिक घृणा—जिनके कारण कि आये दिन विश्व युद्ध का खतरा आज के सभ्य संसार के सामने छाया रहता है—इसी तामस भोजन से उत्पन्न दुष्प्रवृत्तियों का परिणाम है। आज जगह २ डाक्टरों हकीमों की दुकानों की वृद्धि का कारण यही मांसाहार है। तपेदिक और तत्सम्बन्धी अवान्तर रोग इसी प्रतिषिद्ध आहार विहार से उत्पन्न होते हैं।

पिछले दिनों 'मांसाहार से होनेवाले भयङ्कर दर्द' नामक पुस्तक में मांसाहार के विषय में विदेशी विद्वानों की कुछ सम्मतियें प्रकाशित हुई थीं जिनको देखने से विदित होता है कि संसार के अधिकांश उग्र रोग मांसाहार से ही होते हैं। नासूर, हरप्रकार के दांत आंख कान के दर्द, आंतों की बीमारियां, एपेन्डिसाइटिस जैसे भयङ्कर रोगों के रोगियों की परीक्षा करने पर डा० डगलस मेकडानल्ड, सर जेम्स सीयर एम० डी० ऐफ० आर० सी० पी०, प्रो० किथ, मि० होरेस फ्लेचर, डा० मेक फार्ड आदि विदेशी विद्वानों ने एक सम्मति से इन रोगों का कारण मांसाहार ही निश्चित किया है। मांसाहार हमारे इस प्रकरण का विषय नहीं है, यथा स्थान इस पर विशेष प्रकाश डाला गया है। यहाँ यही समझ लेना चाहिये कि मांस, मनुष्य का स्वाभाविक भोजन नहीं है। वेद ने उपरोक्त छोटे से मन्त्र में ही इस विषय की ओर सङ्केत किया है कि अन्न से ही यक्ष्मा सम्बन्धी रोगों का विनाश होता है मांस से तो यह बढ़ते ही हैं।

अन्नप्राशन संस्कार में बालक के आगे—पुस्तक, लेखनी खिलौने, मिठाई, अस्त्र शस्त्रादि बहुत सी वस्तुओं का एक ढेर रख दिया जाता है, बालक को गोद में से छोड़ दिया जाता है और देखा जाता है कि वह किस वस्तु की ओर अधिक आकर्षित होता है। वह जिस वस्तु की ओर आकर्षित हो, उससे उसके भावी जीवन की रुचि की कल्पना की जाती है और समयपर उसी कार्य में पटु होने के लिए प्रोत्साहन किया जाता है। यह एक मनोवैज्ञानिक क्रिया है। प्रायः देखा जाता है कि माता पिता बालकों को समुन्नत बनाने में उनकी रुचि का कोई विचार नहीं करते। बालक जहां चार पांच वर्ष का हुआ कि उसे स्कूल भेजना शुरु किया। आठ दश वर्ष तक यही चक्की चलती रहती है। बालक का पढ़ने में मन नहीं लगता परन्तु फिरभी उसे स्कूल जाना पड़ता है, रुचि न होते हुए भी अध्यापक बरबस पुस्तकों के ज्ञान को उसमें उड़ेल देना चाहता है। लड़का फेल हो जाता है। माता पिता फिर भी नहीं समझते उसे ठोक पीटकर पढ़ाना ही चाहते हैं, फल यह होता है कि स्वाभाविक रुचि के अभाव में वह बालक पढ़ने में सफल नहीं होता और उसके जीवन का वह अमूल्य भाग—जिसमें उसने भावी जीवन संग्राम की तैयारी करना थी मातापिता की मूर्खता से नष्ट हो जाता है। हमें अपने जीवन में ऐसे बहुत से बालकों को देखने का अवसर मिला है जिनको यदि सचमुच उनकी रुचि के अनुसार उचित शिक्षण दिया जाता तो वे आज और ही कुछ आदमी होते मेरे एक मित्र हैं बड़े सज्जन और संस्कृत भाषा के प्रेमी। उन्होंने अपनी रुचि के अनुसार अपने पुत्र को संस्कृत भाषा पढ़ाने का प्रयत्न किया किन्तु उस बालक की रुचि उस ओर शायद कभी नहीं हुई। पाठशाला में, घर में, पढ़ने के समय या खेलकूद के समय सर्वदा वह चित्र कला की ओर झुकी हुई अपनी रुचि को न दबा पाता। ज्येष्ठ आषाढ़ के लम्बे दिनों में जब माता पिता उसे धूप में जाने से रोकने के लिए घर के किवाड़ बन्द कर आराम करने लग जाते वह धीरे से उठता और किवाड़ों के समीप आ बैठता। मिट्टी के दीपकों में उसने कुछ रंग घोल रक्खे थे। वह भोला भाला बालक अपनी प्रतिभा के अनुसार कागजों पर चित्र बनाने का अभ्यास किया करता, ज्यों ही माता पिता जागने को होते उसका भीत हृदय सहम उठता। आखिर एक दिन मेरे मित्र ने उस बालक की चोरी पकड़ ही ली, उन्होंने वे चित्र हमें दिखाये। मैंने उनसे अनुरोध किया कि वे उसे किसी आर्टस्टुडियो में चित्रकला की शिक्षा दिलायें किन्तु मेरी यह सलाह और दूसरे लोगों की सम्मतियें भी उनके मन में न बैठीं। उनका प्रयत्न यही रहा कि किसी प्रकार वह बालक 'लघु कौमुदी' रटले। फल यह हुआ न तो वह लघुकौमुदी ही रट सका और चित्रकार तो बनता ही कैसे ? इस प्रकार न जाने देश के कितने होनहार बालकों की प्रतिभा बचपन में ही मसल दी जाती है और उनका जीवन नष्ट कर दिया जाता है।

इसलिये आवश्यकता है कि हम इस संस्कार द्वारा प्रथम, बालक की रुचि का परिचय प्राप्त करलें और तब उसे उसमें निपुण होने के लिये प्रोत्साहित करें।