निवर्तयाम्यायुषेऽन्नाद्याय प्रजननाय रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय। (यजु० अ० ३ म० ३३)

अर्थात्—हे बालक दीर्घायु के लिए, अन्न ग्रहण में समर्थ बनाने के लिए, उत्पादन शक्ति के लिए, ऐश्वर्य की वृद्धि के लिए सुन्दर सन्तान के लिए और बल तथा पराक्रम प्राप्ति के योग्य होने के लिये तेरा मुण्डन करता हूं।

चूड़कर्म संस्कार बल आयु तथा तेज की वृद्धि के लिए किया जाने वाला आठवां संस्कार है, इससे पूर्व के सात संस्कार दोष परिमार्जन श्रेणी के हैं। उनके द्वारा खान से निकले लोहे को—मिट्टी हटाना, मांजना, तपाना, आदि की तरह मानव शरीर को गर्भवास जन्य मलिनतादि निराकरण पूर्वक शुद्ध बनाया जाता है। चूडाकरण उपनयनादि चार संस्कारों द्वारा उसमें गुणाधान होता है—अर्थात् मानवोचित विशिष्टगुणों का समावेश किया जाता है।

'चूडा क्रियतेऽस्मिन्' इस विग्रह के अनुसार चूडाकरण संस्कार का अभिप्राय है वह संस्कार जिसमें बालक को चूडा अर्थात् शिखा दी जाए। अमरकोष के 'शिखा चूडा शिखण्डस्तु' इत्यादि श्लोकानुसार चूडा का अभिप्राय शिखा से ही है। गृह्य सूत्रकारों ने इसीलिए—

अथैनमेकशिखस्त्रिशिखः पञ्चशिखो वा यथैवैषां कुलधर्मः स्यात्। यथर्षिशिखा निदधात्येके।

अर्थात्—बालक को कुलधर्म के अनुसार एक शिखा, दो या तीन शिखा धारण करावे।

—इत्यादि वचनों से इस संस्कार के समय शिखा रखने का विधान किया है। इस संस्कार का समय जन्म से प्रथम या तीसरा वर्ष है जब कि बालक अपनी शैशव अवस्था के पहिले—किन्तु सब से भयपूर्ण—दौर को समाप्तकर चुकता है। शरीर विज्ञान के अनुसार यह समय ऐसा होता है जबकि दांतों के निकलने के कारण बालक के शरीर में कई प्रकार की व्याधि हो जाना अनिवार्य है। चूंकि उसका शरीर निर्बल हो जाता है और बाल झड़ जाते हैं ऐसे समय में इस संस्कार का विधान करके महर्षियों ने बालक को इन सब अस्वस्थकर कारणों से बचाने का प्रयत्न किया है।

इस संस्कार का दूसरा नाम मुण्डनसंस्कार भी है। यह त्वचा सम्बन्धी रोगों के लिए अत्यन्त लाभकारी होता है। शिखा को छोड़कर शिर के शेष बालों को मूंड देने से शरीर में तापक्रम कम हो जाता है और उस समय होने वाली फोड़े फुन्सी दस्त आदि व्याधि जोकि शरीर में उष्णता जन्य उबाल के कारण उत्पन्न होती हैं स्वतः शिथिल पड़ जाती हैं।

एक बार मुण्डन हो जाने पर फिर उगने वाले बाल बद्धमूल होने के कारण फिर झड़ते नहीं। आयुर्वेद के सुप्रसिद्ध ग्रन्थ चरक संहिता के देखने से ज्ञात होता है कि चूडाकरण के सम्बन्ध में मन्वादि स्मृतिकारों के वचन कोरे अर्थवाद या रोचक नहीं हैं किन्तु वे सत्य पर आधारित हैं। मुण्डन क्षौर आदि के लाभ हानियों का वर्णन करते हुए महर्षि चरक ने लिखा है—

पौष्टिकं वृष्यमायुष्यं शुचिरूपं विराजनम्।
केशश्मश्रुनखादीनां कर्तनं सम्प्रसाधनम्॥
(चरक सूत्रस्थान ५, सूत्र ९३)

अर्थात्—क्षौरादि कर्म करवाने से, नाखून कटवाने से और कंघी आदि से बालों को साफ रखने से पुष्टि, वृष्यता, आयु, पवित्रता और सुन्दरता आदि की वृद्धि होती हैं। बालक का मुण्डन कराने के अनन्तर उसके शिर में मलाई आदि की मालिश का विधान है जिससे मस्तिष्क के मज्जा तन्तुओं को कोमलता शीतलता तथा शक्ति प्राप्त होती है जो कि आगे चलकर बालक की बौद्धिक शक्ति के विकास में बड़ी सहायक होती है। वैसे भी ठंडा शिर मनुष्य के स्वास्थ्य का चिह्न है। बड़े बूढ़े मनुष्य—हाथ पांव गरम और ठंडे शिर को स्वास्थ्य की निशानी समझते हैं। इसलिए बालक को स्वस्थ तथा प्रसन्न रखने के लिए यह संस्कार अवश्य करना चाहिये।

हम पीछे कह आए हैं चूडाकरण संस्कार का प्रयोजन महर्षियों ने बल आयु तथा तेज की वृद्धि माना है। इस विषय पर हम कुछ विशद दृष्टिकोण से विचार करना चाहते हैं और बतलाना चाहते हैं कि एक समय था जब समस्त भूमण्डल में इस वैज्ञानिक संस्कार की प्रथा प्रचलित थी। सभी देशों के निवासी 'चूडा' अर्थात् शिखा के महत्व को समझते थे और उसे धारण करते थे।

बुद्धि बल आयु तेज की वृद्धि के साथ शिखा का क्या संबन्ध है इसको समझने के लिए हमें सर्वप्रथम मानव शरीर की रचना को समझना होगा तब हम सुगमतया महर्षियों के उपरोक्त कथन की सचाई को आंक सकेंगे, तभी हमें ज्ञात हो सकेगा कि वेद भगवान्—

दीर्घायुष्ट्वाय बलाय वर्चसे शिखायै वषट्

अर्थात्—दीर्घ आयु बल और तेज के लिए शिखा को स्पर्श करता हूं—की घन गम्भीर वाणी से मानव मात्र को शिखा धारण के लिए क्यों प्रेरित कर रहे हैं। स्मृतिकारों ने—

सदोपवीतिना भाव्यं सदा बद्धशिखेन च।
विशिखो व्युपवीतश्च यत्करोति न तत्कृतम्॥

—कहकर सभी धार्मिक कार्यों में शिखा को इतना महत्त्व क्यों दिया है ? क्या कारण है कि बिना शिखा के, या उसमें ग्रन्थी लगाए बिना जो कुछ भी धर्मानुष्ठान किया जाता है वह सब निष्फल हो जाता है।

मानव शरीर की रचना पर अगर आप ध्यान दें तो आपको मालूम होगा कि सम्पूर्ण शारीरिक प्रवृत्तियों का केन्द्र हमारा मस्तिष्क है। क्या मानसिक क्या शारीरिक सभी प्रकार की क्रियाओं का संचालन उसी के द्वारा होता है। यदि वह स्वस्थ है, समुचित शक्ति सम्पन्न है तो मनुष्य भी स्वस्थ रहता हुआ वेदोक्त 'शतं जीवेम शरदः' के अनुसार न केवल सौ वर्ष की आयु प्राप्त कर सकता है किन्तु इससे भी अधिक दीर्घजीवी हो सकता है हमें यह स्मरण रखना चाहिये कि दीर्घजीवन का मूल रहस्य 'युक्ताहार विहार'—अर्थात् अपनी दिनचर्या को नियमानुकूल बनाने में छुपा हुआ है, और युक्ताहार विहार के लिए ज्ञानशक्ति अक्षुण्ण रहना अनिवार्य है। उसी ज्ञानशक्ति को प्रबल एवं जागरूक रखने के लिए महर्षियों ने जिन अमोघ उपायों का आविष्कार किया है—शिखा भी उनमें से एक है।

हरिवंश पुराण में एक कथा आती है जिससे ज्ञात होता है कि शिखा न केवल ज्ञानशक्ति को सम्पन्न रखती है किन्तु बल पराक्रम एवं तेज के साथ भी उसका गहरा सम्बन्ध है। कहा जाता है महर्षि वशिष्ठ का सगर नामक एक विश्वविजयी शिष्य था। उसके पिता को पश्चिम देश के कुछ राजाओं ने मिलकर मार डाला। सगर ने पिता की मृत्यु का बदला चुकाने की प्रतिज्ञा की और उन राजाओं का विनाश करना प्रारम्भ किया। वे व्याकुल हो महर्षि वशिष्ठ की शरण में गए तथा उनसे प्राणरक्षा की प्रार्थना की। वशिष्ठ जी ने उन्हें अभयदान दे दिया एवं सगर को बुलाकर उनका विनाश करने से रोकना चाहा। सगर उनके वध का प्रण कर चुका था, इसलिए बड़ा दुविधा में पड़ा। एक ओर प्रतिज्ञा भंग का भय तो दूसरी ओर गुरु आज्ञा की अवहेलना का पाप। उसने महर्षियों से विचार विनिमय किया, अपनी संशयापन्न स्थिति को उनके सामने रक्खा और कर्तव्य का निर्देश चाहा। बहुत सोच विचार के बाद यह निश्चित हुआ कि उन राजाओं को सशिख मुण्डन कराकर छोड़ दिया जाय। तदनुसार ऐसा ही किया गया और सभी लोगों को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि शिखा छेदन के उपरान्त वे बिलकुल प्रभाव शून्य और निर्जीव से हो गए। इस प्रकार सगर ने अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करली एवं गुरु की आज्ञा भी भंग न हुई। सारांश यह कि हम देखते हैं—शिखा विज्ञान जानने वाले महर्षियों की दृष्टि में शिखा छेदन मृत्यु से कुछ कम नहीं समझा जाता था।