वर्तमान भौतिक युग में जब कि मनुष्य के सम्पूर्ण कार्य-कलाप बिना मतलब के कभी नहीं होते, जब कि प्रत्येक वस्तु का प्रत्यक्ष दृष्ट लाभ उसमें प्रवृत्ति का कारण होता है तब यह प्रश्न स्वाभाविक है कि शिखा क्यों रक्खी जाए ? अपटुडेट समाज में मनुष्य को पोंगापन्थी सिद्ध कर देने वाले, केश सौन्दर्य में विघ्न स्वरूप बालों के इस गुच्छे को शिर पर पाल रखने से क्या फायदा ? इसलिये अब हम पौरस्त्य एवं पाश्चात्य दृष्टिकोणों से शिखा के कतिपय लाभों पर विचार करते हैं।

(१) शिखा हमारी ज्ञान शक्ति को चैतन्य रखते हुए उसे सर्वदा अभिवृद्धि की ओर अग्रसर रखती है। यह विज्ञानानुकूल बात है कि काली वस्तु सूर्य की किरणों में से अधिक ताप तथा शक्ति का आकर्षण किया करती है। इस वस्तु को सिद्ध करने के लिए हमें दूर जाने की आवश्यकता न होगी। आप सफेद और काले कपड़ों के दो टुकड़े लीजिए, उनको भिगोकर धूप में सूखने डाल दीजिये, आप देखेंगे कि काला कपड़ा सफेद की अपेक्षा जल्दी से सूख गया। हमने अपनी प्रयोगशाला में इसे स्वयं अनुभव किया है। दो शीशे के बर्तन—जिनमें एक सफेद था तथा दूसरा काला, एक ही समय में सूर्य की धूप में रखे गये और ५ मिनट बाद जब दोनों का तापांश नापा गया तो काले बर्तन का तापांश दूसरे की अपेक्षा ५ डिग्री ज्यादा था। इसके बाद हमने उनके मोटे तले के नीचे सफेद और काले कपड़े के दो टुकड़े रक्खे कुछ क्षण बाद काले वस्त्र-खण्ड में धुआं उठना शुरू हुआ और इसके पूरे १ मिनट बाद दूसरे में। हमारे इन सब उदाहरणों का तात्पर्य यही है कि काली वस्तु में सूर्य-किरणों को विशेष रूप से अपने में आत्मसात् करने की शक्ति होती है। वैसे भी सूर्य की प्रखर किरणों से काले हुए व्यक्ति दक्षिण देश में खूब देखे जा सकते हैं। अस्तु,

इसके अतिरिक्त प्रकृति में दूसरा नियम यह पाया जाता है, कि प्रत्येक क्षुद्रांश (जुज) सर्वदा अपने महान् अंशी (कुल) में मिल कर ही अपनी पूर्णता को प्राप्त करता है। प्रकृति की सभी वस्तुएं इसी नियम के आधीन काम कर रही हैं। सभी नदियें अतुल जलराशि समुद्र में मिल कर ही शान्त होती हैं। कोई भी पार्थिव वस्तु ऊपर फेंकने पर भी पार्थिवपन के कारण ही पृथ्वी की ओर आकर्षित होती है। दीपक की लौ—'जो कि तेजस शक्ति भण्डार सूर्य का ही एक सूक्ष्मभाग है—सर्वदा इसी लिये ऊर्ध्वगामी देखी जाती है। 'अण्ड पिण्डवाद' के अनुसार इसी नियम को अपने शरीर पर भी परखिये। हमारी बुद्धि को शास्त्रों ने सूर्य का अंश माना है। इसीलिये हम प्रतिदिन 'भूर्भुवः स्वः' आदि गायत्री मन्त्र से अपनी बुद्धि एवं मेधा को जागृत करने के लिये भगवान् सूर्य की उपासना करते हैं और उनसे बुद्धि का दान मांगते हैं। पाश्चात्य विज्ञानवादियों ने उसे 'Sun is the first cause of life' कह कर जीवन शक्ति का मूल कारण स्वीकार किया है। उस सूर्यांश भूता बुद्धि तथा प्राण-शक्ति को जागृत करने के लिए ऋषियों ने बुद्धि-केन्द्र मस्तिष्क पर गोखुर के बराबर बालों का एक गुच्छा रखने का विधान किया है। बालों का यह गुच्छा जिसे हम शिखा कहते हैं काले रंग का होने के कारण सूर्य से मेधा प्रकाशिनी शक्ति का विशेष आकर्षण करके ऊर्ध्वाभिमुखी बुद्धि को और भी उन्नत करने में सहायक होता है इसमें किसी को सन्देह का कोई स्थान ही नहीं।

(२) सामने के चित्र को ध्यानपूर्वक देखिये, इसे देखने से आपको विदित होगा कि ठीक शिखा स्थान के नीचे मज्जा तन्तुओं द्वारा निर्मित बुद्धि चक्र और उसके ही समीप ब्रह्मरन्ध्र हैं, इन दोनों के ऊपर सहस्रदल कमल में अमृत-रूपी ब्रह्मा का अधिष्ठान है। शास्त्रविधि से जब मनुष्य उस परम पुरुष परमात्मा का ध्यान करता है या वेदादि स्वाध्याय करता है तब इनके अनुष्ठान से समुत्पन्न अमृत तत्त्व वायुवेग से इस सहस्र दल कर्णिका में प्रविष्ट हो जाता है। यह अमृततत्त्व यहीं नहीं रुकता किन्तु अपने केन्द्र स्वरूप भगवान् सूर्य में लीन होने के लिये शिर से भी बाहर निकलने का प्रयत्न करता है। शिखा ग्रन्थि से टकरा कर वह विद्युत् प्रवाह स्वरूप अमृत वापिस लौट कर सहस्रदल कर्णिका में ही रह जाता है। कदाचित् शिखा खुली हो या न हो तो वह अमृत उप द्वार से निकल कर अल्पवेग वाला होने के कारण सूर्य से तो मिल नहीं पाता किन्तु अन्तरिक्ष में ही विलीन हो जाता है। इसलिए मन्वादि धर्म शास्त्रकारों ने स्नान संध्या जप होम स्वाध्याय दान आदि कर्मों के समय शिखा में ग्रन्थी लगाकर ही इन कार्यों के करने का विधान किया है, यथा—

स्नाने दाने जपे होमे, संध्यायां देवतार्चने।
शिखाग्रन्थि सदा कुर्यादित्येतन्मनुरब्रवीत्॥
(मनु संहिता)

इसी अमृत तत्त्व को कुछ विचारकों ने 'ओरा' शक्ति के नाम से स्मरण किया है। पाश्चात्य वैज्ञानिक इसी शक्ति को मिस्टोरियन फोर्स (Mystirion force) के नाम से स्मरण करते हैं।

सम्पूर्ण प्रकृति मंडल में फैली हुई एक दूसरी शक्ति और है जिसे हम सतत चिन्तन या ध्यान शक्ति द्वारा अपने शरीर में प्रविष्ट कर सबल तथा मेधावी बन सकते हैं, इसे ओज शक्ति (Vrillic Power) नाम से स्मरण किया जाता है। दुनिया के सभी सन्त महात्माओं और आध्यात्मिक पुरुषों में निरन्तर ध्यानावस्था में रहने से इसी अदृश्य शक्ति का प्रादुर्भाव हो जाया करता है जिसके बल पर वे सहस्रों मनुष्यों के मन पर अपना अद्भुत प्रभाव डालने में समर्थ हो जाते हैं। शिखा बांधकर पूर्वोक्त कार्यों का अनुष्ठान करते हुए हम ऐसी दशा में आ जाते हैं कि हमारे शरीर में विद्यमान शक्ति—जो रोमों द्वारा बाहर निकलते हुए क्रमशः क्षीण होती जाती है—क्षीण न हो और हम प्रकृति मंडल से अन्य शक्ति का आकर्षण सुगमता पूर्वक कर सकें। बहुधा आपने ऐसे अनेक पात्र देखे होंगे कि जिनको उलटा कर देने पर भी उनमें पड़ा हुआ जलादि तरल पदार्थ बाहर नहीं आता किन्तु उसमें और जल खप सकता है। स्कूलों में बालकों के पास ऐसी चोर दवातें प्रायः देखने को मिल सकती हैं। शिखाबद्ध मानव की भी यही दशा समझनी चाहिये।

सुप्रसिद्ध पाश्चात्य विचारक एवं वेद भाष्यकार मैक्समूलर ने शिखा द्वारा प्राप्त होने वाली इसी शक्ति पर विचार करते हुए उपसंहार में लिखा है—

The concentrations of mind upwords sends a rush of this power through the top of the head.

अर्थात्—शिखा के द्वारा मानव मस्तिष्क अतीव सुगमता से इस (Vrillic power) शक्ति के प्रवाह को धारण कर सकता है।

इसी तथ्य की पुष्टि में स्वामी दयानन्दजी महाराज ने अपने 'धर्म विज्ञान' में पाश्चात्य जगत् के सुप्रसिद्ध विज्ञान वेत्ता विक्टर ई० क्रोमर (Victor E Cromir) लिखित पुस्तक से निम्न उद्धरण दिया है—

In meditation one receives the vrillic influx. While concentrating one pours it out. If one however, concentrates one's mind upon God there is an outgoing and an inflowing process set up. The concentration of the mind upwords sends a rush of this force through the top of the head and the respone comes as a fine rain of soft magnetism These two forces cause a beautiful display of colour to the higher vision, The out pouring from above is beautiful beyond description
(Vril Kalpaka)

अर्थात्—ध्यान के समय ओज शक्ति प्रकट होती है। किसी वस्तु पर चिन्तन एकाग्र करने से ओज शक्ति उसकी ओर दौड़ती है। यदि परमात्मा पर चित्त एकाग्र किया जाय तो मस्तक के ऊपर शिखा के रास्ते ओज शक्ति प्रकट होती है। परमात्मा की शक्ति उसी पथ से अपने भीतर आया करती है। सूक्ष्म दृष्टि सम्पन्न योगी इन दोनों शक्तियों के सुन्दर रंग को भी देख लेते हैं। जो शक्ति परमात्मा से अपने भीतर आती है उसकी तुलना नहीं की जा सकती।

(३) शारीरिक विज्ञान के अनुसार जिस स्थान पर शिखा रखी जाती है उसे पिनल ज्वैंड (Pinal jwend) कहा जाता है। इसके नीचे एक विशेष प्रकार की ग्रन्थी होती है जो पिचुइट्री (Pituetry) कहलाती है। इस ग्रन्थी में एक विशेष प्रकार का रस बनता है जो स्नायुओं द्वारा सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर शरीर को बढ़ाता और बलशाली बनाता है। शिखा द्वारा इन ग्रन्थियों को अपना कार्य करने में बड़ी सहायता प्राप्त होती है एवं वे चिरकाल तक अपना कार्य करती रहती हैं। इससे मनुष्य न केवल दीर्घकाल तक स्वस्थ रह कर जीवन यापन करता है किन्तु उसकी ज्ञान शक्ति भी अक्षुण्ण बनी रहती है।

विगत वर्षों में इस सम्बन्ध में पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने जो खोज की है और वे जिस परिणाम पर पहुंचे हैं उसका कुछ आभास उनके लेखों से अनूदित निम्न उद्धरणों से अच्छी तरह मिल सकता है।

सर चार्ल्स ल्यूकस—

'शिखा का जिस्म के उस जरूरी अंग से बहुत सम्बन्ध है जिससे ज्ञान वृद्धि और तमाम अंगों का संचालन होता है। जब से मैंने इस विज्ञान की खोज की है तब से मैं खुद चोटी रखता हूं।

डा० हाय्वमन—

"मैंने कई वर्ष भारत में रहकर भारतीय संस्कृति का अध्ययन किया है। यहां के निवासी बहुत काल से शिर पर चोटी रखते हैं जिसका जिक्र वेदों में भी पाया जाता है। दक्षिण में तो आधे सिर पर 'गोखुर' के समान चोटी रखते हैं। उनकी बुद्धि की विलक्षणता देखकर मैं अत्यन्त प्रभावित हुआ हूं। अवश्य ही बौद्धिक विकास में चोटी बड़ी सहायता देती है। शिर पर चोटी या बाल रखने बड़े लाभदायक हैं। मेरा तो हिन्दू धर्म में अगाध विश्वास है। मैं खुद भी चोटी रखने का कायल हो गया हूं।
(गार्ड मैगजीन नं० २५८, पृष्ठ १२२, सन १८९९)

उपर्युक्त वैज्ञानिक तथ्यों से पूर्ण परिचित होने के कारण ही न केवल भारतीय, किन्तु पाश्चात्य जगत् के भी प्रायः सभी वैज्ञानिक, विचारक, सम्भ्रान्त लेखक एवं कवि शिर पर शिखा ही नहीं रखते थे किन्तु उनके समस्त शिर पर आपको जटा सदृश लम्बे बाल ही दिखाई देंगे। स्मृतिकारों के शब्दों में हम इन्हें 'पंच शिखी' कह दें तो कोई अत्युक्ति न होगी। पाठकों के अवलोकनार्थ हम कतिपय पौरस्त्य एवं पाश्चात्य विद्वानों के चित्र दे रहे हैं जिन्हें देखकर पाठकों को यह जानने में देर न लगेगी कि बालों का समुन्नत होना बौद्धिक जीवन के साथ कितना गहरा सम्बन्ध रखता है।

(४) कुछ भारतीय विचारकों के मतानुसार सम्पूर्ण मानव शरीर में व्याप्त एक मुख्य नाड़ी है जिसे सुषुम्ना कहते हैं। प्रस्तुत चित्र में लाल रंग वाली नाड़ी को ध्यान से देखिये, यही सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त सुषुम्ना नाड़ी है जो मस्तिष्क में जाकर समाप्त होती है। इसके उत्कृष्ट रन्ध्र भाग शिखा स्थल के ठीक नीचे खुलते हैं जैसा कि चित्र में भलीभांति देखा जा सकता है। यही स्थान ब्रह्मरन्ध्र है और बुद्धितत्त्व का केन्द्र है। कहा जाता है कि साधारण दशा में जबकि हमारे शरीर के अन्य रोम पसीने आदि द्वारा शारीरिक ऊष्मा को बाहर फेंकते हैं सुषुम्ना केन्द्र के बालों द्वारा तेजो निःसरण होता है। उसी को रोकने के लिए शिखा में ग्रन्थी का विधान है जिससे वह तेज शरीर में ही रुक कर मन शरीर व मस्तिष्क को अधिक उन्नत कर सके। इस विचार का अनुमोदन भी कतिपय पाश्चात्य दार्शनिकों ने किया है, यथा—

सुप्रसिद्ध डा० आई० ई० क्लार्क एम० ए० डी० ने लिखा है—

'जब मैं चीन भ्रमण करने गया, वहाँ मैंने देखा कि चीनी लोग भी हिन्दुस्तानियों की तरह आधे शिर से ज्यादा बाल रखते हैं। मैंने जब से इस विज्ञान की खोज की है तब से मुझे विश्वास हो गया है कि हिन्दुओं का हर एक नियम विज्ञान से भरा पड़ा है। चोटी रखना हिंदुओं का धर्म ही नहीं सुषुम्ना के केंद्रों की रक्षा के लिए ऋषि मुनियों की खोज का विलक्षण चमत्कार है'।

इसी प्रकार मि० अर्ल थामन साहेब ने अलार्म मैगजीन के १९२१ के वार्षिकांक में पृष्ठ १९९४ पर लिखा है—

"सुषुम्ना की रक्षा हिन्दू लोग चोटी रखकर करते हैं जबकि अन्य देशों में लोग शिर पर लम्बे बाल रखकर या हैट लगाकर इसकी रक्षा का प्रयत्न करते हैं। इन सब में चोटी रखना सबसे मुफीद है। किसी भी प्रकार हो सुषुम्ना की रक्षा करना ही सबसे जरूरी है।'

(५) मानव शरीर को प्रकृति ने यद्यपि इतना सबल बनाया है कि वह बड़े से बड़े आघात चोट आदि को सहन करके भी जीवित रह जाता है किन्तु फिर भी शरीर में कुछ ऐसे स्थान हैं, जिन पर आघात होने से मनुष्य की तत्काल मृत्यु हो सकती है। ऐसे स्थानों को मर्म कहा जाता है। आयुर्वेद में कई प्रकार के मर्म स्थानों का वर्णन किया गया है। शिखा के अधोभाग में भी एक मर्म स्थान होता है जिसके लिए सुश्रुतकार ने लिखा है—

मस्तकाभ्यन्तरोपरिष्टात् शिरासंधिसन्निपातो रोमावर्तोऽधिपतिस्तत्रापि सद्योमरणम्। (सुश्रुत ६।७१)

अर्थात्—मस्तक के भीतर ऊपर को जहां पर बालों का आवर्त (भंवर) होता है वहां सम्पूर्ण नाड़ियों और संधियों का सन्निपात (मेल) है उसे अधिपति मर्म कहा जाता है। यहां पर चोट लगने से तत्काल मृत्यु हो जाती है।

शिखा इस अत्यन्त कोमल तथा सद्योमारक मर्मस्थान के लिए प्रकृति प्रदत्त कवच है जो कि न केवल आकस्मिक आघातों से इस मर्म को बचाती है किन्तु उग्र शीत आतपादि से भी इसकी रक्षा करती है। विदेशों में इसी मर्मस्थान को उग्र शीततापादि से बचने के लिए टोप (Hat) धारण किया जाता है जिसकी कि नकल आजकल भारत के नवसभ्य समाज में खूब हो रही है। किन्तु प्रकृति प्रदत्त चन्द तोले वजन वाले इस शिखा रूपी त्राण के मुकाबले लगभग आधासेर वजन का व्यर्थ भार सिर पर उठाये फिरना कितनी बुद्धिमत्ता है इसे स्वयं समझा जा सकता है।

आप प्रश्न करेंगे कि हैट के मुकाबले में शिखा का क्या महत्व हो सकता है ? किन्तु वस्तु विज्ञान की दृष्टि से देखें तो शिखा में हैट से कुछ कम गुण न मिलेंगे। इस बात को आप चन्द उदाहरणों द्वारा अच्छी तरह समझ सकते हैं। ऊन को प्रायः सभी व्यक्ति जानते और पहचानते हैं। ऊन क्या है—भेड़ के शरीर के बाल ही तो—ऐसे ही बाल जैसे हमारे या आपके सिर पर होते हैं। इसलिए इन दोनों में गुणों की समता होना कोई आश्चर्य नहीं है। सांसारिक व्यवहार में ऊन का खूब प्रयोग होता है और उसकी विशेषताओं से सारा संसार परिचित है। अतः इन्हें जान लेने पर हम सहज ही शिखा की विशेषताओं से परिचित हो सकेंगे।

(क) ऊन की प्रथम विशेषता है बाह्य शीत आदि से रक्षा—उदाहरणतया—पशुओं को लीजिए, प्रकृति ने पशुओं के शरीर पर इसलिये घने बाल दिये हैं कि वे सर्दी से अपनी रक्षा कर सकें बर्फीले पहाड़ों पर होने वाले रीछ आदि प्राणियों की रक्षा उनके बालों के ही कारण होती है अन्यथा उनकी मृत्यु निश्चित है।

(ख) सर्दी की तरह यह बाह्य गर्मी से भी शरीर को बचाता है—आपने देखा होगा बर्फ को गर्मी से बचाने के लिये ऊन के कम्बल या बोरी में लपेट दिया जाता है जिससे वह पिघल न जाय, ऊनी वस्त्र में लपटने से बाहर की गर्मी उस पर असर नहीं करती और वह वैसा ही बना रहता है।

(ग) ऊन बिजली के प्रवाह को बाहर से अन्दर और अन्दर से बाहर नहीं आने देता। इसीलिये यदि किसी आदमी को बिजली पकड़ ले तो उसे ऊनी कम्बल डालकर छुड़ाया जा सकता है क्योंकि उसको स्पर्श करके विद्युत् प्रवाह बाहर ही रुक जाता है। बिजली के तार तथा अन्य यन्त्रों में इसीलिये ऊनी तथा रेशमी धागों का प्रयोग किया जाता है।

जब शरीर से वियुक्त हुए बालों में (ऊन) में भी यह गुण सर्वदा विद्यमान रहते हैं तब शरीरस्थ बालों का इन गुणों से युक्त होना कोई आश्चर्यप्रद नहीं। फलतः यह कहना अत्युक्ति नहीं समझनी चाहिये कि शिखा द्वारा अधिपति मर्म की रक्षा सम्भव है।

(६) शिखा आर्यजाति का एक पवित्र सामाजिक चिह्न है, जिसने सैकड़ों सम्प्रदाय जाति उपजाति आदि भेदों में विभक्त हुई भी इस जाति की एकता को अक्षुण्ण रखने में प्रमुख भाग लिया है। जिसने भूमण्डल के लाखों वर्ग मील में फैले हुए विशाल हिन्दू समाज को सांस्कृतिक एवं धार्मिक एकता के सूत्र में पिरोकर एक बनाकर रखा है। यों तो सभी सभा सोसाइटियों ने अपने सदस्यों के लिये विभिन्न प्रकार के चिह्न निश्चित किये हुए हैं जिनके द्वारा तत्तत् समाज या पार्टी के मेम्बरों को सर्वत्र पहचाना जा सकता है, और उनमें परस्पर प्रेम तथा एकत्व की भावना का संचार होता है। जैसे मुसलमानों की तुर्की टोपी, ईसाइयों का क्रास, सिक्खों के केश तथा कृपाण, आर्य समाजियों की 'ओम्' वाली टोपियें, राजनैतिक आधार पर संगठित हुए समाजों में जैसे—कांग्रेसियों की गांधी टोपी, राष्ट्रीय स्वयंसेवकसङ्घ वालों की काली टोपी और नेकर खाकसारों की हरी वर्दी, आदि चिन्ह उक्त पार्टियों या समाज के सदस्यों के परिचायक चिन्ह हैं।

किन्तु जरा ध्यान से विचार करें—यह सब चिन्ह कृत्रिम होने के कारण जहां व्यय साध्य हैं वहां साथ ही साथ इनके खोये जाने का भी भय रहता है। एक समय ऐसा भी हो सकता है जब पुरुष अनिच्छा से ही कहीं पहुँच जाए और इन चिन्हों को साथ ले जाना भूल जाय। ऐसी दशा में जब तक वह उस समाज में अपनी सदस्यता का कोई निश्चित प्रमाण न दे सके, तब तक आदर का पात्र नहीं हो सकता। किंतु शिखा आर्य जाति के लिए ऐसा सस्ता सरल प्राकृतिक चिन्ह है जिसकी न सम्भाल की चिन्ता न खोये जाने का डर। जो सर्वदा शरीर के साथ रह कर जहां जीवन काल में आर्यत्व की परिचायक बन कर मनुष्य को सामाजिक स्नेह और सहानुभूति की प्राप्ति कराती रहती है, वहां यदि किसी कारण से अज्ञात स्थान या अज्ञातावस्था में मृत्यु भी हो जाए तो शव की पहचान कराकर उसे दुर्गत होने से बचाकर अग्नि के समर्पण करवा सकती है।

१९४७ के भारतीय गृह विप्लव ने हिन्दू जाति की आंखों पर पड़े हुए परदे को हटाकर स्पष्ट दिखलाया कि शिखा जैसे सामाजिक चिह्न का क्या महत्व है। इससे पहले पाश्चात्य शिक्षादीक्षित हिंदूसमुदाय ने इसे व्यर्थ समझकर नाई की भेंट चढ़ा दिया था। चोटी के चन्द बालों का वह गौरवमय उज्जवल इतिहास, केवल चोटी के प्रश्न पर अपने अमूल्य जीवन की आहुति देने वाले हकीकत जोरावरसिंह और फतेहसिंह के वंशधरों की आंखों से ओझल होता जा रहा था। सदियों तक चलती हुई यवनों की दुधारी तलवारों के बीच भी जो बाल अक्षुण्ण रहे, उन्हें शिक्षित नामधारी हिन्दू स्वयं कटवा कर यवनों की नैतिक विजय की घोषणा करने लगे थे।

ऐसे समय में भारत में अचानक क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ। भारतवर्ष स्वतन्त्र हुआ और गोरे शासक सदा के लिये यहां से विदा हो गये, किंतु उन्होंने देश में साम्प्रदायिकता की जो चिनगारी वर्षों से सुलगा रखी थी वह ज्वालामुखी बनकर फट पड़ी। भारत और पाकिस्तान—हिंदू एवं मुस्लिम आदर्शों के दो विभिन्न राष्ट्र ! काफिरों और मोमिनों की दो बस्तियां ? मिस्टर जिन्ना के चिर आकांक्षित स्वप्न का सत्य और सुनहला प्रतिरूप पाकिस्तान ! फिर वहां हिन्दुओं के लिये क्या गुंजाइश, फलतः एक ऐसा भीषण गृह विप्लव हुआ जिसे आज का मानव कभी नहीं भूल सकता। ऐसे समय में हमने देखा चोटी और जनेऊ यह दो ही ऐसे चिह्न थे जिनके द्वारा शत्रु मित्र की पहिचान होती थी। उस समय पूर्वी पंजाब और पश्चिमी बंगाल की उस रक्त रंजित भूमि में इन दोनों चिह्नों के बिना किसी व्यक्ति का बाहर निकलना खतरे से खाली नहीं था। प्रतिहिंसा पूर्ण हिन्दू जब चुन २ कर अपने शत्रुओं से प्रतिशोध ले रहे थे, तब चोटी और जनेऊ ही थे जो संदिग्ध व्यक्तियों की जान बचाने में समर्थ होते थे।

हमने देखा दफ्तरों के वे फैशनेबल बाबू और कालेजियेट छात्र जिन्होंने चोटी को ओल्ड फैशन की निशानी कह कर अलविदा कह दी थी—अपने अनादृत उपेक्षित सामाजिक चिन्ह को उस समय पुनः अपना रहे थे। इस प्रकार अन्य किसी दृष्टिकोण से न सही, एक सामाजिक चिह्न के नाते ही सही, शिखा रखना प्रत्येक हिन्दू का परम कर्तव्य है।