शिखा रखने की प्रथा का यद्यपि आज ह्रास होगया है और हिन्दुजाति के अतिरिक्त अन्य जाति के पुरुष शिखा विज्ञान की अनभिज्ञता के कारण शिखाहीन हो गये हैं किन्तु एक समय था जब कि सभी देशों में और सभी जातियों में शिखा रखने की प्रथा विद्यमान थी, ईसाइयों के धर्मशास्त्र 'बाइबिल' में सामसन् एगोनसटिस् (Samson Agonostis) के सम्बन्ध में एक कथा आती है कि वह बड़ा प्रतापी राजा था। उसके शत्रुओं ने उसे पराजित करने के लिये सभी प्रकार के उपाय किये किन्तु वे सफल न हो सके। अन्त में उन्हें मालूम हुआ कि उसने अपने शिर पर शिखा धारण की हुई है जिसके कारण वह अजेय है (At last they discovered that all his power lay on account of the tuft on his head) उन लोगों ने चालाकी से प्रसुप्त दशा में उसकी शिखा कटवादी जिससे वह पराजित हो गया। इस कथा से पता चलता है कि ईसाइयों में भी एक समय शिखा को बुद्धि बल का कारण समझा जाता रहा है।
पीछे दिये गये डा० आई० ई० क्लार्क के उद्धरण से चीन में शिखा धारण करने की रीति का भलीप्रकार पता चल जाता है।
हिब्रू जाति के मान्य ग्रन्थ (तलमद्) में इस प्रकार के कई वर्णन हैं जिनसे विदित होता है कि उस जाति में भी शिखा रखने की पद्धति प्रचलित थी।
मुसलमानों ने शिर से चोटी को उड़ाया, किन्तु वे उससे पीछा न छुड़ा सके, यह उनकी टोपी फाड़कर बाहर निकल आई है। उनकी टोपी को देखिये काले २ रेशमी धागों का चोटी सदृश गुच्छा आपको उनकी टोपी के ऊपर लटकता हुआ अवश्य दिखाई देगा। यह शिखा की नैतिक विजय नहीं तो क्या है ?
इस प्रकार धार्मिक, वैज्ञानिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक किसी भी दृष्टि से विचार करने पर 'शिखा' का मानव जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान ठहरता है। आर्य जाति की तो लाखों वर्षों की परम्पराओं का इतिहास इसके साथ जुड़ा हुआ है। वीर शिवा गुरु गोविन्दसिंह हकीकत आदि की उज्ज्वल वीरता का इतिहास शिखा-सूत्र का इतिहास है। वीर बालक जोरावरसिंह और फतेहसिंह ने इसी की रक्षा के लिये दीवारों में चुने जाकर हंसते २ मृत्यु का आलिंगन किया किन्तु शिखा-सूत्र को नहीं छोड़ा। इस प्रकार के महत्त्वपूर्ण चिन्ह की ओर हमारी आज की उपेक्षा शोचनीय है, जिसका शीघ्र ही परिहार होना चाहिये और प्रत्येक हिन्दू को चाहे वह किसी जाति का क्यों न हो—इससे भी अधिक हम तो कहेंगे प्रत्येक मनुष्य को—बल आयु तेज एवं बुद्धि की वृद्धि के लिये शिखा अवश्य धारण करनी चाहिये।