वैदिक स्वरूप

आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्तः।
तं रात्रिस्तिस्र उदरे बिभर्ति तं जातं द्रष्टुमभियन्ति देवाः॥
(अथर्व० ११।५।७)

अर्थ—आचार्य बालक का उपनयन संस्कार करके उसे ब्रह्मचर्य व्रत का आदेश देकर अपने पास रखता है। यह ब्रह्मचारी तीन रात्रि गुरु के पास रहता है और फिर जब वह द्विजत्व रूप दूसरा जन्म ग्रहण कर उत्पन्न होता है, तब उसे देखने के लिये देवता भी एकत्रित होते हैं।

आठवां संस्कार उपनयन या यज्ञोपवीत संस्कार है जिसकी महत्ता पूर्वोक्त सभी संस्कारों से अधिक है और आज के इस गये गुजरे जमाने में जब कि लोग प्रायः संस्कारों को भूल बैठे हैं, यह संस्कार आज भी किसी न किसी रूप में सर्वत्र देखने को मिल सकता है। यही क्यों प्रगतिवाद के इस नये युग में इस संस्कार का जितना प्रचार एवं प्रसार हुआ है, उसको देखकर प्रत्येक वेदाभिमानी का हृदय रोने लग जाता है। इस संस्कार का जितना प्रचार बनाम छीछालेदर वर्तमान समय में हुई उसकी सम्भावना शायद पूज्यपाद महर्षियों ने कभी की भी न होगी।

धर्मशास्त्रकारों ने ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य इन तीन वर्णों के लिए इसका विधान किया था, दुःख है कि वे तो इसकी महिमा को भूलते जा रहे हैं किन्तु द्विजेतर दूसरी जातियों को जनेऊ क्या मिला एक जादू का डोरा मिल गया जिसे पहन कर वे एक ही क्षण में ब्राह्मण और न जाने उनमें भी ऊपर क्या से क्या बन जाते हैं। न किसी तप की आवश्यकता न संयम की ! फूंक मारते ही सृष्टि परिवर्तन ! इस प्रकार के प्रचार से कितना अनर्थ हो रहा है। इसका अनुमान सुप्रसिद्ध आर्यसमाजी पं० नरदेव जी शास्त्री वेदतीर्थ के निम्न उद्धरण से भलीभांति लगाया जा सकता है—

'सहस्रों अन्त्यजों को पकड़ पकड़ कर उनके गले में यज्ञोपवीत डाले जा रहे हैं पर करोड़ों ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यों के बालक यज्ञोपवीत के बिना ही शूद्र हुए जाते हैं, उनको यज्ञोपवीत देने की किसी को चिन्ता ही नहीं। इनकी शिक्षा दीक्षा की किसी को परवाह नहीं है। अधिकारी अनधिकारी का ध्यान नहीं, पात्र अपात्र का विचार नहीं। न जाने क्या हो रहा है और न जाने क्या होकर रहेगा। और रोग यह हो गया है कि यज्ञोपवीत के गले में पड़ते ही ये लोग अपनी जाति आदि को पूछने पर भी ठीक ठीक नहीं बताते। इस प्रकार सब संकट हो रहा है। उद्धार चाहने वाले उपाय सोचते हैं पर अपाय नहीं सोचते।'
(आर्यसमाज इतिहास प्रथम भाग)

यज्ञोपवीत के अधिकारी अनधिकारी प्रश्न पर तो हम आगे विचार करेंगे, प्रकृत में हमारे कथन का तात्पर्य इतना ही है कि यज्ञोपवीत संस्कार बड़ा महत्वपूर्ण एवं आवश्यक संस्कार है और इसीलिए लोग इसकी ओर इतने अन्धाधुन्ध आकर्षित हो रहे हैं।

इस संस्कार को महर्षियों ने 'द्विजत्व' साधक के स्थान पर बैठाकर अन्य संस्कारों की अपेक्षा इसका विशेष गौरव प्रदर्शित किया है इसके बिना ब्राह्मण ब्राह्मण नहीं, क्षत्रिय क्षत्रिय नहीं और वैश्य वैश्य नहीं। द्विज माता पिता के शरीर से जन्म ग्रहण करने के बाद भी द्विज सम्बन्धी शास्त्रीय अधिकार प्राप्त करने के लिए इस संस्कार की अपेक्षा रहती है। जब तक यह संस्कार न हो जाय तब तक—

'न ह्यस्मिन्युज्यते कर्म किञ्चिदामौञ्जीबन्धनात्।
(मनु २-१७१)

अर्थात्—यज्ञोपवीत संस्कार हुए बिना द्विज किसी कर्म का अधिकारी नहीं'—मनु के इस वचन के अनुसार न उसे सन्ध्या वन्दनादि किसी कर्म में अधिकार है और नाही उसे द्विज श्रेणी में परिगणित किया जा सकता है। एक प्रकार से यह आचार्य एवं वेद माता गायत्री के सहयोग से होने वाला दूसरा जन्म है। और क्योंकि इस जन्म द्वारा, उपनीत बालक को विनश्वर स्थूल शरीर की अपेक्षा अविनाशी ज्ञानमय शरीर प्राप्त होता है इसलिए इस द्वितीय जन्म का महत्त्व पहिले जन्म की अपेक्षा अधिक ही है। यथा—

तत्र यद् ब्रह्मजन्मास्य मौञ्जीबन्धनचिह्नितम्।
तत्रास्य माता सावित्री पिता त्वाचार्य उच्यते॥
(मनु २-१७०)

अर्थात्—मौञ्जी बन्धन संस्कार (यज्ञोपवीत) ब्रह्मत्वाधायक जन्म है जिसमें गायत्री माता और आचार्य पितृस्थानीय होता है।

इस दृष्टि से विचार करने पर पाञ्चभौतिक स्थूल शरीर दाता माता पिता की अपेक्षा वेद रूपी अक्षुण्ण शरीर देकर मुक्तिपथ की ओर अग्रेसर करने वाले सावित्री एवं आचार्य रूपी माता पिता का गौरव स्पष्ट ही है। 'गरीयान् ब्रह्मद पिता' कह कर मनुजी महाराज ने आचार्य का जो अभिनन्दन किया है उसे युक्तियुक्त ही कहा जा सकता है।

किन्तु दुःख है ऐसे महत्वपूर्ण संस्कार का जो दुरुपयोग और उपेक्षा आज हो रही है उसे लिखते हुए लेखनी सहम जाती है, हृदय रोने लगता है और विश्व की सर्वश्रेष्ठ एवं सभ्यतम आर्य-जाति का नैतिक अवपतन शतसहस्रमुखी बन कर आंखों के सामने छा जाता है। हिन्दू जाति ने शिखा और सूत्र के सहारे ही अपने को जीवित रक्खा है। उसका सम्पूर्ण विगत इतिहास शिखा और सूत्र का ही इतिहास है। सभ्यताओं के उस संघर्ष काल में आर्य जाति, इन्हीं पावन प्रतीकों के साथ आगे बढ़ी। विधर्मियों ने सर्वदा अपने आक्रमणों का लक्ष्य शिखा-सूत्र को ही बनाया—यह बात इतिहास के परिचित पाठकों से छिपी हुई नहीं है। बौद्ध नरेशों के राज्य काल में यज्ञोपवीत सर्वदा उनकी क्रूर दृष्टि का लक्ष्य रहा और मुगल बादशाहों ने तो शिखा-सूत्र के विरुद्ध जो जिहाद बोला वह इतिहास की चिरस्मरणीय दुर्घटना रहेगी। १। मन यज्ञोपवीत प्रति दिन उतरवाकर ही भोजन करने वाले मुगल शासक जीवन भर यज्ञोपवीत के विरुद्ध लड़ते रहे किन्तु आर्य-जाति ने उसे न छोड़ा। चमकती दुधारों के बीच भी सूत के ये चन्द धागे जिस दृढ़ता से आर्यजाति को बचाते रहे वह कुछ कम गौरवास्पद नहीं है, किन्तु आज ? सृष्टि के प्रारम्भ से आर्य शरीर की शोभा बढ़ाने वाला वह यज्ञोपवीत आज कहाँ है ? हमारी ऐतिहासिक विजयों का प्रतीक वह यज्ञोपवीत आज हमसे विदा हो गया ! हमने स्वयं उसे तुच्छ और व्यर्थ समझकर निकाल फेंका। आज जब कि अन्य जातियाँ अपने सांस्कृतिक तथा राष्ट्रीय चिन्हों को खोज खोजकर उन्हें पुनः अपना रही हैं तब हम ही ऐसे बुद्धू हैं जो लाखों वर्ष पुराने अपने इस संस्कार को और इसके प्रतीक यज्ञोपवीत को उतार फेंकने पर तुले हुए हैं। जो लोग यज्ञोपवीत धारण करते भी हैं उनमें आज ऐसे कितने हैं जो इसे स्वयं तैय्यार करते हैं। रोजाना चर्खा चला कर अपने काते हुए सूत के ही वस्त्र पहिरने का व्रत लेने वाले कथित देश सेवक हिन्दू भी दो निचली धागे इस यज्ञोपवीत के लिए व्यय नहीं कर सकते। आज अन्य बाजारू सौदों की तरह जनेऊ भी आपको बाजार में बिकते हुए मिल सकते हैं। अधिकांश सज्जन शास्त्र विश्वासी होते हुए भी प्रमादवश इसे पहिरने पर बाध्य होते हैं। इन्हें हम तीन या छः तार के धागों का समूह मात्र ही कह सकते हैं जनेऊ नहीं। न इनके निर्माण में विधि का विचार है न पवित्रता का खयाल। मन्त्रों से प्रतिष्ठा की तो चर्चा ही क्या ?

यज्ञोपवीत धारण करने वालों में आधी से अधिक संख्या उन लोगों की है जो इसे किसी खास लौकिक मतलब से ही पहिनते हैं। उन्हें न उसके धारण से उत्पन्न कर्तव्य भार का ध्यान है न उसके नियमोपनियमों का। उनके लिए तो यज्ञोपवीत हरवक्त गले में पड़ा रहने वाला एक ऐसा सूत का डोरा है जो शास्त्रीय आज्ञा पालन के साथ २ उनके ट्रंक, सन्दूकों की चाबियों को सुविधापूर्वक सुरक्षित रखने के काम आता है। कविवर मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में—

यज्ञोपवीत देख उनका धन्य भाग्य सराहिए।
पर चाबियों के बांधने को डोर भी तो चाहिए।

यह उनकी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति का अच्छा खासा साधन है। ऐसे ही लोगों पर व्यंग्य कसते हुए कवि शिरोमणि शूद्रक ने अपने नाटक में शर्विलक नामक चोर के मुख से कहलाया है—

"यज्ञोपवीतं हि नाम ब्राह्मणस्य महदुपकरणद्रव्यम् विशेषतोऽस्मद्विधस्य चोरस्य कुतः—

एतेन मापयति भित्तिषु कर्ममार्गम्।
एतेन मोचयति भूषणसम्प्रयोगान्॥
उद्घाटनं भवति यन्त्रदृढे कपाटे।
दंष्टस्य कीटभुजगैः परिवेष्टनञ्च॥
(मृच्छ अ ३, १६)

अर्थात्—जनेऊ ब्राह्मण के बड़े काम की चीज है और खास कर मुझ जैसे चोर के लिये, क्योंकि यह सेंध लगाने के समय दीवार नापने के लिए फीते का काम देता है। सोती हुई स्त्रियों और बच्चों के कसे हुए आभूषण इसकी सहायता से ढीले करके निकाले जा सकते हैं। बंद तालों को खोलने में तो यह खूब ही काम देता है (क्योंकि अनेक प्रकार की चाबियों को सुरक्षित रखता है) और यदि कहीं कोई कीड़ा सांप बिच्छू आदि काट जाय तो इसको लपेट कर विष को फैलने से रोका जा सकता है।