यज्ञोपवीत शब्द 'यज्ञ' और 'उपवीत' इन दो शब्दों के संयोग से बना हुआ एक समस्त शब्द है जिस का अर्थ है—यज्ञ को प्राप्त कराने वाला। वेद में—

यज्ञो वै विष्णुः—(शतपथ १।१।१।२)

—कह कर समस्त चराचर में व्याप्त सगुण परमात्मा को यज्ञ शब्द से ही स्मरण किया गया है। इसलिए यज्ञोपवीत का शब्दार्थ 'परमात्मा को प्राप्त कराने वाला' है। स्मृतिसार में यज्ञोपवीत शब्द का निर्वचन करते हुए लिखा है—

यज्ञाख्यः परमात्मा य उच्यते चैव होतृभिः।
उपवीतं ततोऽस्येदं—तस्माद् यज्ञोपवीतकम्॥

इसके अतिरिक्त 'यज्ञेन संस्कृतमुपवीत' इस मध्यम-पदलोपी समास द्वारा यज्ञोपवीत शब्द का दूसरा अर्थ यज्ञ से पवित्र किया हुआ उपवीत='सूत्र' होता है। चूंकि यह संस्कार यज्ञ पूर्वक होता है इसलिए द्वितीय अर्थ भी संगत हो जाता है। उपनयन भी इसी संस्कार का दूसरा पर्यायवाचक शब्द है जिसका अर्थ होता है—ऐसा संस्कार जिसके द्वारा बालक गुरु के समीप ले जाया जाय। कुछ व्याख्याकारों के मतानुसार 'यज्ञार्थ-उपवीतम्'=यज्ञोपवीतम्=यज्ञ के लिए जो सूत्र धारण किया जाय अर्थात् जिसके धारण करने पर मनुष्य को सर्वविध यज्ञ करने का अधिकार प्राप्त हो उसे यज्ञोपवीत कहा जाता है।

इस विषय में यह समझ लेना आवश्यक है कि उपरोक्त विग्रह से निष्पन्न यज्ञोपवीत शब्द का अभिप्राय यह कदापि नहीं है कि जैसे आजकल के सभ्य पुरुष सभा सोसायटी आदि में जाते समय शोभा के लिए गले में दुपट्टा दुशाला या चादर आदि डाल लेते हैं और फिर उसे उतार कर रख लेते हैं इसी प्रकार यज्ञोपवीत भी केवल यज्ञादि के समय पहिनने के काम आता है। स्मृतिकारों ने—"सदोपवीतिना भाव्यं सदाबद्धशिखेन च" कह कर—उसे सदा धारण किये रहने का विधान किया है। जिस से इस प्रकार की भ्रान्ति का भली भांति निराकरण हो जाता है। पिछले दिनों हमें ऐसे ही किन्हीं "भैरवदत्त शर्मा 'गौड़' नामक भ्रान्त विद्वान् की 'वैदिक रहस्य' नामक पुस्तक देखने को मिली है, जो वैदिक मर्मज्ञों की श्रेणी में परिगणित होने का लोभ संवरण न कर सके और व्यर्थ की बातें लिखकर अर्थ का अनर्थ कर बैठे हैं। आपने जो कुछ लिखा है उसका सार यही है—"कि प्राचीन काल में यज्ञादि के लिए दीक्षित करते समय दीक्षित पुरुष को पीले लाल या सफेद रंग का एक वस्त्र कन्धे से लेकर कटि पर्यन्त लपेटने के लिए दिया जाता था जो बाद में प्रमाद तथा लोभवश वस्त्र के स्थान में डोरा रूप हो गया। यज्ञोपवीत कोई संस्कार नहीं और नाही चतुः संहिता में उसके पहिरने का कोई मन्त्र ही विद्यमान है। यज्ञोपवीत का कोई मुहूर्त नहीं मिलता। उपनयन=विद्याध्ययनार्थ गुरु गृहगमन—के समय यज्ञोपवीत धारण गृह्यसूत्रों की मर्यादा से बाहर है। हो सकता है यज्ञोपवीत का वर्तमान रूप जैनियों के संसर्ग से हम लोगों में आ गया है। जैनेऊ, जिनेऊ, जनेऊ यह नामकरण ही इस बात का अच्छा परिचायक है।" इत्यादि

उपर्युक्त बातों में कितना सार है पाठक इसे बिना विशेष विवेचना के ही समझ सकते हैं। महाशय जी ने इसी पुस्तक में अन्यत्र आर्यसमाजियों द्वारा 'आश्वमेधिक' मन्त्रों पर किये गये आक्षेपों का समाधान भी किया है जिससे आपके सनातन धर्मानुयायी होने में कुछ सन्देह नहीं रह जाता। ऐसी दशा में आपने केवल चार संहिताओं को ही 'वेद' मानकर बालू की नींव पर अपने अपूर्वमत का जो दृढ़ प्राचीर खड़ा करने का प्रयास किया है वह कहां तक न्यायसंगत है ? क्या चतुः संहिता के अतिरिक्त ब्राह्मण, उपनिषद् आदि वेद नहीं हैं ? यदि हैं तो फिर जब उनमें 'यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं' आदि दो दो मन्त्र विद्यमान हैं—स्वा० दयानन्द को भी अगत्या जिनकी शरण लेनी पड़ी और आज भी चारों संहिताओं को ही वेद मानने वाले आर्यसमाजी भी जिन मन्त्रों से लोगों को जनेऊ पहिराते हैं—तब चतुः संहिता का ही इतना आग्रह क्यों ?

यदि उपनयन काल में यज्ञोपवीत धारण गृह्य सूत्रकारों की मर्यादा से बाहर होता और यज्ञोपवीत केवल वस्त्र स्थानीय ही होता तो कात्यायन गृह्यसूत्र के परिशिष्ट में 'अथातो यज्ञोपवीत-क्रिया व्याख्यास्यामः' आदि से प्रारम्भ करके 'इत्याह भगवान् बौधायनः' तक के लम्बे सूत्र में यज्ञोपवीत निर्माण प्रकार पाया जाता है। तब यह कैसे कहा जा सकता है कि यज्ञोपवीत धारण गृह्य सूत्रकारों की मर्यादा से बाहर है। यदि गृह्य सूत्रों में ही यज्ञोपवीत न हो तो फिर होगा कहाँ ? केवल लोक प्रसिद्ध 'जनेऊ' शब्दसाम्य मात्र देखकर यज्ञोपवीत को जैनियों के संसर्ग से उत्पन्न हुआ अनुमान कर लेना भी हेत्वाभास पूर्ण होने से परास्त हो जाता है। जैन सम्प्रदाय में 'जनेऊ' नाम का कोई सूत्र धारण भी नहीं किया जाता है। वस्तुतः 'यज्ञ' शब्द का ही अपर पर्याय 'यजन' है, सो यकार छोड़कर 'जन' और उपवीत के 'उ' मात्र जोड़ने से 'जनेऊ' शब्द—यज्ञोपवीत का ही संक्षिप्त संस्करण है ! जैसे पर्वतीय देशों में पण्डित शब्द का संक्षिप्त संस्करण 'पंत' आज भी प्रचलित है। इस प्रकार तो कल को कोई कहने लगेगा कि शिखा भी हिन्दुओं में सिक्खों के संसर्ग से ही आई है क्योंकि सिक्ख और शिखा में काफी श्रुतिसाम्य है। यज्ञोपवीत के मुहूर्त वाला आक्षेप भी ऐसा ही है जैसे कोई कहे कि मुहूर्त ग्रन्थों में सर्वत्र विवाह संस्कार का मुहूर्त तो मिलता है परन्तु सप्तपदी का मुहूर्त कहीं भी नहीं मिलता। जब यज्ञोपवीत धारण उपनयन संस्कार का ही एक अंग है तब उसके लिए पृथक् मुहूर्त की क्या आवश्यकता ? तात्पर्य यह है कि यज्ञोपवीत शब्द के "यज्ञ के लिये धारण किये जाने वाला उपवीत (सूत्र)" इस अर्थ से किसी को भी भ्रान्त नहीं होना चाहिए।

ब्रह्म सूत्र शब्द यज्ञोपवीत का ही वाचक है जिसकी व्याख्या करते हुए स्मृति प्रकाश में लिखा है—

सूचनाद्ब्रह्मतत्त्वस्य वेदतत्त्वस्य सूचनात्।
तत्सूत्रमुपवीतत्वाद् ब्रह्मसूत्रमिति स्मृतम्॥

अर्थात्—चूंकि यह सूत्र द्विजाति को ब्रह्मतत्त्व तथा वेदज्ञान की सूचना देता है इसलिए इसे ब्रह्मसूत्र कहा जाता है।

"साकार परमात्मा को यज्ञ और निराकार परमात्मा को ब्रह्म कहा जाता है, दोनों को प्राप्त कराने वाला होने के कारण इसे यज्ञोपवीत या ब्रह्मसूत्र इन दोनों नामों से पुकारा जा सकता है। इसी प्रकार यज्ञसूत्र सावित्री-सूत्र आदि भी इसी के नाम समझने चाहिये।