इस संस्कार को उपनयन, यज्ञोपवीत, व्रतबन्ध मौञ्जीबन्धन आदि किसी भी नाम से यथेच्छ पुकारा जा सकता है। यह सब नाम यों ही नहीं पड़ गये हैं, किन्तु इस संस्कार के समय होने वाली तत्तत् क्रियाओं के कारण अन्वर्थ हैं। उपनयन का अर्थ है—गुरु के समीप प्राप्त कराना अर्थात् प्राचीन समय में यह संस्कार करके बालक को विद्याध्ययन के लिए गुरु के सुपुर्द कर दिया जाता था। उसे सब प्रकार की उपयोगी शिक्षा देकर—राष्ट्र के लिए सदाचारी सभ्य एवं सुशिक्षित नागरिक बना देना गुरु का कार्य होता था। वह बालक को जहाँ स्नेह पूर्वक पढ़ाता था वहाँ उसके सदाचार का भी पूर्ण ध्यान रखता था, फलतः गुरुओं के आश्रमों से बालक पूर्ण सदाचारी एवं विद्वान् बनकर निकलते थे। बालक को विद्याध्ययन के लिए भेजने के समय जब कि यह संस्कार होता था अच्छा खासा समारोह मनाया जाता था। आज भी जिन घरों में इस संस्कार का प्रचलन है वहां इसका समारोह विवाह से कुछ कम नहीं होता। आगन्तुक इष्ट मित्र परिजन एवं निमन्त्रित सज्जनों के हर्षोल्लास में, विविध वस्त्राभरणालंकृत कुल-वधुओं के मंगल गान तथा तप पूत ब्राह्मणों के घन-गम्भीर वेदपाठ के बीच सम्पन्न होने वाले इस पावन संस्कार को होते हुए जिन लोगों ने देखा है वे ही इस समारोह के विस्मयकारी प्रभाव को जान सकते हैं।

यह सब समारोह और उत्सव मनोविज्ञान से सम्बन्ध रखते हैं। आज भारतवर्ष में जब बालक प्रथम बार स्कूल में पढ़ने भेजे जाते हैं, तो वे ऐसे घबराते हैं जैसे पशु बाड़े में जाते हुए या अपराधी जेल जाते हुए। मास्टर जी की शक्ल में उन्हें हौवे का रूप दिखाई देता है किन्तु मनोविज्ञानवेत्ता उन महर्षियों ने बालक के हृदय में विद्याध्ययन का चाव भरने, गुरु से भय की अपेक्षा प्रेम भाव हृदय में रखने, एक शब्द में कहें तो रोते झींकते नहीं किन्तु हंसते २ पाठशाला में जाने के लिए ही इस संस्कार का प्रचलन किया था। विविध प्रकार के समारोहों के बीच होने वाली इस संस्कार की विभिन्न क्रियाओं से बालक के हृदय में विद्याध्ययन के लिए रुचि उत्पन्न होती थी और जब उसके खेल कूद के साथियों की ही तरह गुरु, बालक के दाहिने कन्धे पर हाथ रखकर प्रेमपूर्वक उसे—

मम व्रते ते हृदयं दधामि मम चित्तमनुचित्तं तेऽस्तु।
मम वाचमेकमना जुषस्व बृहस्पतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम्॥

अर्थात्—हे बालक ! मैं तेरे हृदय को ग्रहण करता हूँ। तुम अपने चित्त को सदा मेरे अनुकूल बनाना। मेरी वाणी को एकाग्र होकर श्रवण करना, देवगुरु बृहस्पति तुझे मुझ से संयुक्त करे।

—इत्यादि स्नेहभरी बातें कहता था तो बालक का अनायास ही गुरु से परिचय हो जाता था और वह उसे हौवा न समझ कर अपना अभिभावक समझने लग जाता था। इसके बाद आचार्य बालक को उस सप्रणव गायत्री मन्त्र का उपदेश देता है जिसकी उपासना से उसने अपने ब्रह्मचर्य जीवन को सफल बनाना है। हम पीछे कह आए हैं इस अवस्था में गायत्री ही उसकी माता होती है जिसकी अंगुली पकड़ कर वह चलना सीखता है और जिसके ज्ञान विज्ञान रूपी दोनों स्तनों का पान करके वह बलवान् और ज्ञानवान् हो जाता है।

आचार्य से दीक्षा ग्रहण करने के बाद ब्रह्मचारी भिक्षा के लिए भेजा जाता है। यह क्रिया यद्यपि आज नाटक के तौर पर पूरी कर दी जाती है किन्तु महर्षियों ने इसे वैज्ञानिक दृष्टि से ही इस संस्कार में सम्मिलित किया था। वैसे तो आजकल के भी सभी स्कूल, कालेज—चाहे वे डी० ए० वी० कालेज हों या फिर गांधी मैमोरियल कालेज—भिक्षा द्वारा उपार्जित धन से ही संचालित होते हैं, जिसे आज की सभ्य भाषा में चन्दा (Subscription) कहा जाता है और जिस भिक्षा के लिए आज छात्रों को नहीं, किन्तु उनके अभिभावकों, संस्था के ट्रस्टी सदस्यों और दूसरे लोगों को घर घर 'नारायण हरि' करना पड़ता है, या फिर ऐसी भिक्षा को जनता से बलात् वसूल किया जाता है और उससे ऐसी संस्थाओं को चलाया जाता है। कुछ भी हो आज के वैज्ञानिक युग में भी नामान्तर से हम इसी भिक्षावृत्ति से ही संस्थाओं को चलता हुआ पाते हैं, परन्तु चूंकि इनमें पढ़ने वाले विद्यार्थियों से फीस भी ली जाती है इसलिए वे अर्ध भिक्षार्जित स्कूल कहे जा सकते हैं। पूर्वकाल की संस्थाएँ-गुरुकुल ऋषिकुल—इससे कुछ भिन्न प्रणाली पर चलते थे। उनका संचालन मुख्यतः जनता से प्राप्त भिक्षान्न पर ही होता था, उनमें गरीब, अमीर, राजा, रंक सभी बालक बिना किसी भेद भाव के बिना किसी फीस के शिक्षा पाते थे। आचार्य सबको समान दृष्टि से देखते थे और उनमें भी परस्पर प्रगाढ़ प्रेम होता था। आदर्श मित्र कृष्ण और सुदामा ऐसे ही किसी आश्रम के सहाध्यायी थे, उनकी मित्रता का नवांकुर ऐसे आश्रम की छाया में ही उगा और वृद्धि को प्राप्त हुआ। ऐसे आश्रमों में शिक्षा पाने वाले छात्र अपनी उस शिक्षा का—जो उन्होंने राष्ट्र धन से प्राप्त की हुई होती थी—देश के लिए अधिक से अधिक उपयोग करते थे। राष्ट्र के इस ऋण को वे कम से कम पारिश्रमिक लेकर लोक सेवा करके चुकाना अपना कर्तव्य समझते थे। इन्हीं आश्रमों से शिक्षा प्राप्त स्नातक सफलता पूर्वक राज्यतन्त्रों का संचालन तक करते थे किन्तु उस समय भी उनके हृदय में यह भाव जागरूक रहता था कि मैंने यह सब शिक्षा जनता के अन्न से ही तो प्राप्त की है अतएव वह जनता के कर से इकट्ठे हुए राष्ट्र धन का उपयोग अपने व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति और मौज मजा लूटने में नहीं करता था वह न महलों में रहता था न हजारों रुपये मासिक का व्यर्थ बोझ राष्ट्र पर ही डालता था।

आप आइये हमारे साथ और पुरातन भारत की एक झांकी देखिये। हम आपको दिखायेंगे, प्राचीन भारत में आश्रमों से निकलने वाले स्नातक बड़े २ राज्यतन्त्रों का सञ्चालन करते हुए भी किस तरह रहते थे, कितना व्यय वे राष्ट्र का अपने निजी खर्च के लिए करते थे। हम आपको दूर नहीं ले जायेंगे—न सत्ययुग कालीन लोमश के पास ले चलेंगे जो कि सर्वाधिक दीर्घायु होते हुए भी अपने लिये झोपड़ी का झंझट मोल लेना व्यर्थ समझते हैं, अधिक धूप या वर्षा के समय एक पलाश पत्र मात्र ही शिर पर रखकर आयु बिता देते हैं, न हम त्रेता कालीन वशिष्ठ और विश्वामित्र के पर्ण कुटीर तक ही लेजाने की इच्छा रखते हैं, द्वापर कालीन सान्दीपन के आश्रम तक भी नहीं ले जाते किन्तु केवल दो सहस्र वर्ष पूर्ववर्ती एक ऐसे तपोधन के दर्शन कराते हैं जो भ्रू भंग मात्र से बद्धमूल नन्द-साम्राज्य को धूल में मिलाकर एक नगण्य बालक को भारत का समृद्ध सम्राट् बनाने की शक्ति रखते हैं।

हां सचमुच यह वन ही है-नगर से दूर-पर इतना दूर नहीं कि यहां सर्वसाधारण पहुँच न सके। यह सामने आप पर्णकुटी देख रहे हैं न, यही है सम्राट् चन्द्रगुप्त के महामात्य आचार्य चाणक्य का निवास-स्थान-जहां से वे सम्पूर्ण-भारत की राजनीति का संचालन करते हैं। यह सामने आचार्य ही तो बैठे हैं, कौपीन धारण किये हुए कुशा के आसन पर। कुटिया में क्या है ? हां सचमुच यह तो देखा ही नहीं, कभी आजकल की भांति बाहर से कुटी हो और अन्दर भोग-विलास एवं ऐश्वर्य के सभी साधन हों। नहीं ऐसा नहीं है, अन्दर क्या है, यह देखिये कविवर भारतेन्दु के शब्दों में—

कहुँ परे गोमय शुष्क, कहुं सिल परी शोभा दै रही।
कहुं तिल, कहूं जवरासि लागी बटुन जो भिक्षा लही॥
कहुं कुस परे कहुं समिध सूखत भारसों ताके नयो।
यह लखो, छप्पर महा जरजर होई कैसो झुकि गयो॥
(मुद्राराक्षस तृतीय अंक)

अस्तु यह तो है अपने सामान्य भ्रूभङ्ग से अनेक राष्ट्रों के भाग्य निर्णय कर देने वाले ऋषि आश्रमों में भिक्षार्जित अन्न से शिक्षा प्राप्त महामात्य चाणक्य का घर और आज अर्धभिक्षार्जित स्कूल कालेजों एवं विश्वविद्यालयों से निकलने वाले इसी स्तर के किसी 'जनसेवक' की विदेशी ठाठ-बाट से पटी-कुटी बखूबी नई दिल्ली में आकर देखने का प्रयत्न कीजिये। शायद किसी पूर्व जन्म के पुण्य से आपको दर्शन हो सके। अस्तु,

उपनयन संस्कार का अन्तिम किंतु महत्त्वपूर्ण भाग वे शिक्षाएं हैं जो बालक को ब्रह्मचर्याश्रम में प्रविष्ट होने से पूर्व दी जाती हैं और जो न केवल उसके विद्यार्थी जीवन को सफल बनाने में सहायता सिद्ध होती हैं अपितु इन्हीं महत्त्वपूर्ण नियमों के दृढ़ स्तम्भों के ऊपर उसके अशेष जीवन का उच्च प्रासाद खड़ा होता है। आज विद्यार्थी जीवन प्रारम्भ करने वाले बालक को यह शिक्षाएँ कौन देता है और तत्परता से इनका पालन कौन करवाता है। इसका परिणाम स्पष्ट है आज के स्कूल कालेजों में पलने वाली राष्ट्र की नई पौध अपनी सदाचार विहीन विश्रृंखल प्रवृत्तियों के कारण अकाल में ही मुर्झा जाती है। कंघा शीशा तो आजकल हर वक्त विद्यार्थियों की जेब में रहता है। स्कूल में भी पुस्तकों के साथ जाता है और जब तक दिन में दो-चार बार बाल न संवार लिये जायं तब तक उन्हें सबर ही नहीं आता। जेबों में रक्खे हुए अभिनेत्रियों के चित्र और फिल्मी गानों की पुस्तकों की जबतक एक-दो बार झांकी न ले लें तब तक रोटी हजम नहीं होती। तरह-तरह के कुव्यसनों में फंसकर अपने स्वास्थ्य और माता-पिता की गाढ़ी कमाई का सर्वनाश करके स्वच्छन्द घूमने वाले राष्ट्र के उन भावी कर्णधारों के आन्तरिक जीवन के चित्र देखकर हमें इन शिक्षाओं के महत्त्व का ज्ञान होता है जो इस संस्कार के अवसर पर आचार्य देता है।

"विद्यार्थी मधु मांस का सेवन न करे, नदी आदि के अगाध प्रवाह वाले जल में घुसकर स्नान न करे, अष्टविध मैथुन का त्याग करे, स्वांग, तमाशे, नाटक आदि न देखे। सुगन्धित पाउडर, सुरमा, सुगन्धित तेल आदि न लगावे। दुर्व्यसनों (ताश चौपड़ आदि) से सदैव दूर रहे। निन्दा-स्तुति, व्यर्थ बकवास, मिथ्या भाषणादि से अपने को अलग रखे।"

उपरोक्त नियमों की यदि पृथक् व्याख्या हो और इनकी लापरवाही के जो परिणाम आज स्कूल और कालेजों में देखने में आते हैं—यदि जनता के सामने रक्खे जायं तो एक स्वतन्त्र पुस्तक तैयार हो सकती है। इसलिए हमने संक्षेप में इन नियमों का दिग्दर्शन कराकर इस प्रकरण को यहीं समाप्त किया है।