यज्ञोपवीत की उत्पत्ति और प्रचलन का ऐतिहासिक निर्धारण मानव-बुद्धि से परे की वस्तु है क्योंकि यह कोई सौ दो सौ या हजार दो हजार वर्ष से सम्बन्ध रखने वाली वस्तु नहीं है कि आज के इतिहास के पण्डित इस पर अधिकारपूर्वक अपनी लेखनी उठा सकें। इसका सम्बन्ध तो उस काल से है जबकि प्रलय के गर्भ में अनन्तकाल से प्रसुप्त मानव सृष्टि धीरे-धीरे जागने लगी थी, मानव में नव-चेतना का प्रकाश हुआ था और ज्ञान की प्रथम रश्मि से उसका हृदय आलोकित हो उठा था। सृष्टि के उस नवोदयकाल में आदिमानवों=महर्षियों के मानस-पटल पर उद्भूत हुआ वह ईश्वरीय ज्ञान ही आज 'वेद' नाम से पुकारा जाता है। यज्ञोपवीत की उत्पत्ति इस ईश्वरीय ज्ञान के साक्षात्कार से भी पूर्व हुई समझनी चाहिये, क्योंकि वेद में भी इस संस्कार के माहात्म्य के दर्शन होते हैं। हम इस प्रकरण के प्रारम्भ में कतिपय वैदिक मन्त्र दे आये हैं जिनसे हमारे इस कथन का भली-भांति समर्थन हो जाता है।

यज्ञोपवीत धारण के पावन मन्त्र में भी यज्ञोपवीत की उत्पत्ति का संक्षिप्त किन्तु स्पष्ट वर्णन विद्यमान है जिससे हमें इसके काल निर्धारण में पर्याप्त सहायता मिल सकती है। वह मन्त्र है—

यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।

इस मन्त्र को यज्ञोपवीत धारण करने के समय प्रायः सभी लोग बोला करते हैं किन्तु इसके अर्थ गाम्भीर्य पर कदाचित् ही किसी ने ध्यान दिया होगा।

हम पीछे कह आए हैं कि यज्ञोपवीत संस्कार हुए बिना किसी को भी वेद पाठ या गायत्री जाप का अधिकार नहीं है।

कृतोपनयनस्यास्य व्रतादेशनमिष्यते। (मनु-२-१७३)

—भगवान् मनु के इस आदेशानुसार इस संस्कार के बाद ही मनुष्य को श्रुति स्वाध्याय का अधिकार मिलता है। यह बात प्रायः सभी जानते हैं कि सृष्टि के आदि प्रवर्तक श्री ब्रह्मा जी महाराज हैं। महाप्रलय के उस भीषणकाल में जबकि यह समस्त ब्रह्माण्ड जलप्लुत होता है, चारों ओर जल के अतिरिक्त कोई वस्तु प्रयत्न करने पर भी नहीं दिखाई देती तब 'ब्रह्म ब्रह्माऽभवत्स्वयम्' के अनुसार साक्षात् परब्रह्म ही श्री ब्रह्माजी महाराज के रूप में प्रादुर्भूत होकर पूर्व कल्पानुरूप वैदिक ज्ञान के सहारे ही सृष्टि का विस्तार करते हैं। वेद के सर्वप्रथम ज्ञाता प्रवक्ता और उपदेष्टा भी यही हैं। किन्तु प्रश्न हो सकता है कि बिना यज्ञोपवीत संस्कार हुए ब्रह्मा को वेद ज्ञान और प्रवचन का अधिकार कैसे मिला ? उनका यज्ञोपवीत संस्कार किसने सम्पन्न कराया ? क्या बिना यज्ञोपवीत के ही उन्होंने वेद का स्वाध्याय और प्रवचन किया ? अगर ऐसा ही हो तो इसका तो अर्थ हुआ कि यज्ञोपवीत बाद के ऋषियों द्वारा आविष्कृत कोई सामाजिक या विद्या-सम्बन्धी चिन्ह मात्र ही है।

नहीं, वास्तव में ऐसी बात नहीं है, यज्ञोपवीत धारण में विनियुक्त इस सुप्रसिद्ध मन्त्र में इन सब प्रश्नों का बड़ी सरलता से सुस्पष्ट उत्तर दिया गया है। श्रुति कहती है—'यज्ञोपवीत परम पवित्र है, यह सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्माजी के साथ ही उत्पन्न हुआ है। यह आयु तेज बल को देने वाला है इसीलिए इसे धारण करना चाहिए।"

मन्त्रार्थ से सुस्पष्ट है कि सृष्टिनायक श्री ब्रह्माजी महाराज यज्ञोपवीत धारण किए हुए ही प्रादुर्भूत हुए थे, इसीलिये उन्हें मर्यादानुसार स्वाध्याय का अधिकार प्राप्त हुआ और उसी वेद-ज्ञान के बल पर वे 'यथापूर्वमकल्पयत्' के अनुसार सृष्टि रचना में समर्थ हो सके। इससे यह भी सुस्पष्ट हो गया कि यज्ञोपवीत वेद की ही भांति अनादि है उसका प्रारम्भ परवर्ती महर्षियों ने नहीं किया और नाही कभी सामाजिक या विद्या-चिह्न के रूप में उसका आविष्कार हुआ है।