हमने पीछे कहा था, कि यज्ञोपवीत की उत्पत्ति और उसके प्रचलन का ऐतिहासिक निर्धारण मानव बुद्धि से परे की वस्तु है किन्तु फिर भी कुछ आधुनिक विचारकों ने इस दिशा में कुछ निर्णय करने की जो उपहासास्पद चेष्टा की है और भांति-भांति की कल्पनाओं की उड़ान भरी है, उसका कुछ आभास स्वर्गीय श्री लोकमान्य तिलक के नीचे लिखे विचारों में भली-भांति मिल सकता है। यह विचार केवल लोकमान्य के ही नहीं किन्तु भारतीय संस्कृति के विषय में नवीन दृष्टिकोण से विचार करनेवाले पौरस्त्य और पाश्चात्य सभी विद्वानों के विचारों का सही प्रतिनिधित्व करते हैं। तिलक जी ने लिखा है—
"मृगशीर्ष नक्षत्र को वैदिक शब्दों में प्रजापति और यज्ञ कहते हैं। किसी समय (तिलक के मत से लगभग ८००० ईसा पूर्व) इस नक्षत्र से वर्ष का आरम्भ माना जाता था इसीलिये संस्कृत में इस मास को 'अग्रहायण' भी कहते हैं। वर्ष के आरम्भ से अन्त तक नाना प्रकार के यज्ञ किये जाते थे। मृगशीर्ष नामक नक्षत्र मण्डल में कुछ तारिकाओं की स्थिति मेखला के आकार की है। मृगशीर्ष, या प्रजापति, या यज्ञ की इस मेखला को देखकर प्राचीन आर्यों ने मेखला तथा यज्ञोपवीत धारण करना आरम्भ किया था, पट्टा डोरी या कपड़े का एक टुकड़ा जो यज्ञ के समय कमर बन्द के रूप में कमर पर बांधा जाता था यही यज्ञोपवीत कहलाता था।" (ओरायन)
उपर्युक्त कल्पना में कितना तथ्य है इसे पाठक अनायास ही समझ सकते हैं। हम नहीं पूछना चाहते कि आकाश में चमकने वाले सूर्य चन्द्र आदि अन्य ग्रहों की नकल करके आर्यों ने तत्सदृश अन्य चिह्न भी क्यों न धारण किये ? प्रजापति तो वेदों में सूर्य को भी कहा गया है और बार-बार कहा गया है, यथा—
प्रजापतिर्वै सविता (बृहदारण्यक)
—इसके अतिरिक्त यज्ञ यागादि प्रायः दिन में ही सम्पन्न होते हैं तब सूर्य के अनुकरण पर उन लोगों ने कोई चिह्न क्यों न धारण किया ? हम यह भी नहीं पूछना चाहते कि यज्ञ-यागादि का विधान करने वाले शतपथ ब्राह्मणादि ग्रन्थों में प्रस्तुत कल्पना की कोई झलक क्यों नहीं मिलती ? यदि यज्ञोपवीत उन नक्षत्रावलियों का अनुकरण मात्र ही था तो इसके निर्माण के लिए पृथक् विधि-विधान की क्या आवश्यकता थी। उन्हीं ब्राह्मण ग्रन्थों में—जिनके अनुसार वर्ष के आरम्भ से अन्त तक यज्ञादि हुआ करते थे—यज्ञोपवीत निर्माण का एक विशेष प्रकार मिलता है जो स्पष्टतया इस बात का प्रतिपादक है कि यज्ञोपवीत किसी वस्तु का अनुकरणात्मक चिह्न नहीं किन्तु द्विजाति के उन सम्पूर्ण उत्तरदायित्वों, कर्तव्यभारों एवं उदात्त भावनाओं का प्रतीक है जो ईश्वर ने उसे सौंपे हैं। इसलिये ऐसी कोई भी कल्पना ऐतिहासिक दृष्टिकोण से कोई मूल्य नहीं रखती और सर्वथा हास्यास्पद ही है।