यज्ञोपवीत के सदृश ही सूत्रनिर्मित चिह्न विशेष प्रायः सभी देशों और सभी जातियों में पाये जाते हैं जो इस बात के सूचक हैं कि एक समय सभी जातियें आर्य-जाति का अभिन्न अंग थीं, किन्तु कालान्तर में अशिक्षावश अथवा देश-विदेशों में प्रसार आदि के कारण वे आर्यत्व से पतित हो गईं किन्तु बहुत से रीति-रिवाज धार्मिक चिह्न आज भी भग्नावशेष अवस्था में उन लोगों में प्रचलित हैं। इनका क्या रहस्य है इस बात को तो वे लोग नहीं जानते, किन्तु रूढ़ि रूप में इन्हें धारण अवश्य करते हैं।

मुसलमान

मुसलमानों में सूत्रात्मक यज्ञोपवीत की तरह गण्डे का प्रचलन है, जिसे मौलवी आयु-बल आदि की सिद्धि के लिये उन्हें पहिरने को देते हैं। इसके अतिरिक्त ताजियों के वक्त—जो कि एक प्रकार से मृतक श्राद्ध का ही विकृत रूप है—बायें कन्धे पर लाल कपड़े का एक टुकड़ा या डोरा, जिसे हम उपवस्त्र कह सकते हैं—रखना आवश्यक माना जाता है और ऐसा करना उन मृतात्माओं की सद्गति का हेतु समझा जाता है। यह हिन्दुओं के श्राद्धकालीन यज्ञोपवीत के अपसव्य का ही अनुकरण है। इसी प्रकार हज्ज यात्रा के समय भी सफेद रंग का वस्त्र-खण्ड गले में बांधे रखना हाजी के लिये अनिवार्य है।

ईसाई

रोमन कैथोलिक ईसाई यज्ञोपवीत की ही भांति ऊन का बना हुआ एक सूत्र-विशेष हरवक्त अपनी कमर में बांधे रहते हैं, जिसमें यज्ञोपवीत की भांति तीन ही ग्रन्थी लगाई जाती है। वे लोग इसकी पवित्रता का विशेष ध्यान रखते हैं और प्रोटेस्टैन्ट ईसाई पादरी भी कमर में रस्सी बांधना धार्मिक अनुष्ठान मानते हैं। इङ्गलैण्ड की वर्तमान प्रथा के अनुसार वहां का राजा ही 'धर्माचार्य' भी होता है, तदनुसार 'धर्माचार्य' के रूप में वर्तमान इङ्गलैण्ड के किसी भी बादशाह के चित्र में तादृश रस्सी के दर्शन किये जा सकते हैं।

पारसी

पारसी लोग मन्त्र पाठपूर्वक सूत्रनिर्मित एक डोरा अपनी कमर में पहिनते हैं और उसे अपने धर्म का मुख्य अंग समझते हैं। भारतीयों की भांति उनके यज्ञोपवीत धारण का भी एक विशेष मन्त्र है। वह है—

फ्राते मजदा ओवरत् पौखनिम् आयम्य ओं धनेम् स्तेहर पाए संघेम् मैन्यु—तस्तेश् बंधुहिस् दा एनस् भज दथास्निस्॥

अर्थात्—मजदा या सनिन धर्म के चिह्न, हे तारका मण्डित कुश्ता ! तुझे पुराने काल में मजदा ने धारण किया है।

सिक्ख

अंग्रेजों की कूटनीति के शिकार और वर्तमान में राजनैतिक अधिकारों की लिप्सा से मोहान्ध सिक्ख भाई आज चाहे यज्ञोपवीत धारण नहीं करते किन्तु सिक्ख सम्प्रदाय प्रवर्तक श्री गुरु नानक से गुरु गोविन्दसिंह तक के सभी गुरु शास्त्रीय विधि से यज्ञोपवीत धारण करते रहे हैं। यह बात उनके जीवन चरित्रों से बिलकुल प्रमाणित हो जाती है, यथा—

गुरु नानक

(क) असविध श्री नानक गतिदानी।
उपदेशन की उच्चरत बानी॥
वदन वदन विप्रन वरि आई।
यज्ञोपवीत दियो पहिराई॥
(ना० प्र० ४२)

छठे गुरु हरि गोविन्दसिंह

(ख) गुरु निदेश सुन विप्र तब शुभ जञ्जु कर धार,
कर पूजा गुरु पुत्र गर लागो प्रोहित डार।
हरि गोविन्द कह्यो हम गरे जञ्जु हरि अस पाई,
कुल प्रोहित कुलरीति कहि पाइओ गर हर्षाई॥
(गु. वि. पा अध्याय ५ अंक ६)

९वें गुरु तेग बहादुर

तिलक जञ्जु राखा प्रभु ताका, कीनो बड़ो कलू मही साका।
(दशम ग्रन्थ विचित्र नाटक अ ५)

१०वें गुरु गोविन्दसिंह

पन्थ प्रकाश में गुरु गोविन्दसिंह का विवाह कालिक शरीर सौन्दर्य वर्णन करते हुए लिखा है—

पीत पुनीत उपरना धोती जोती रवि नव छाजै।
पीत जनेऊ मनो बदन शशि पै बिजरी बिजुरी भ्राजै॥

बौद्ध

बुद्ध गया के प्रसिद्ध मन्दिर में सुप्रतिष्ठित बुद्ध प्रतिमा को ध्यानपूर्वक देखने से भली-भांति जाना जा सकता है कि चतुर शिल्पी ने जहां पाषाण को टांककर शिर के बालों के गुच्छक और शरीर पर ओढ़ा हुवा महीन उत्तरीय वस्त्र दिखाने का प्रयत्न किया है वहां उत्तरीय वस्त्र में झलकता हुवा सव्य यज्ञोपवीत भी कलापूर्ण ढंग से दिखाया है। लामा लोगों की कमर में अनिवार्य रूपेण बन्धा ऊर्णामय रस्सा भी प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।