स्मृतिकारों ने उपनयन के लिये वर्णों के आधार पर पृथक्-पृथक् समय का निर्देश किया है, यथा—
गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनायनम्।
गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तु द्वादशे विशः॥
(मनु २-३६)
अर्थात्—ब्राह्मण बालक का गर्भ से आठवें वर्ष, क्षत्रिय का ११वें वर्ष और वैश्य का बारहवें वर्ष में उपनयन संस्कार करना चाहिये। यदि किसी विशेष कारण से उपरोक्त समय में न किया जा सके तो उससे दुगने अर्थात्—ब्राह्मण बालक का १६, क्षत्रिय का २२ और वैश्य का २४ वर्ष की अवस्था तक यह संस्कार सम्पन्न हो सकता है, जैसा कि मनुजी ने कहा है—
आषोडशाद् ब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते।
आद्वाविंशात्क्षत्रबन्धोराचतुर्विंशतेर्विशः॥
(मनु २-३८)
इसके बाद भी यदि यह संस्कार न हो तो फिर द्विज व्रात्य हो जाता है, अर्थात् सावित्री पतित हो जाने के कारण संस्कारानर्ह हो जाता है।
उपरोक्त अवस्थाओं के साथ-साथ गृह्यसूत्रकारों ने उपनयन के लिये प्रत्येक वर्ण के लिये ऋतु विशेष का भी निर्धारण किया है, यथा—
वसन्ते ब्राह्मणं ग्रीष्मे राजन्यं शरदि वैश्यम्॥
अर्थात्—ब्राह्मण बालक का वसन्त ऋतु में क्षत्रिय का ग्रीष्म ऋतु में, और वैश्य का शरद ऋतु में होना चाहिए।