यह प्रश्न सुसम्भव है कि जब काल एक है अखण्ड है दिन रात, चैत्र वैशाख, घड़ी प्रहर आदि सब व्यवहार सिद्धि के लिये मनुष्य कल्पित वस्तुएँ हैं, तब उपनयन के लिये आयु एवं ऋतुभेद की क्या आवश्यकता ? शुभ कार्य—फिर उपनयन जैसा शुभ कार्य तो—'यस्मिन्कस्मिन्दिने मर्त्यो श्रद्धाभक्तिसमन्वित' के अनुसार किसी भी दिन क्यों न कर लिया जाय ?
निःसन्देह देशकाल की एकता और अखण्डता अमान्य नहीं हो सकती परन्तु 'देशकाल वैचित्र्यवाद' के अनुसार समस्त विश्व में व्याप्त प्रकृति के उन अगणित चमत्कारों की ओर से भी वादी सर्वथा आंख नहीं मूंद सकता जिनके कारण एक ही भूमण्डल—उर्वर बंजर, जलमय और शुष्क, समतल और ऊबड़-खाबड़ आदि अनेक विभागों में और एक ही काल दिन-रात, सर्दी-गर्मी वर्षा आदि विविध भागों में स्वयमेव विभक्त हो जाता है। विदेशों की तो चर्चा छोड़िये जहां साइबेरिया के वर्कहोयान्सक (Verk hoyansk) नामक स्थान में तापक्रम, शून्य से भी ९५ अंश तक कम हो जाता है और इस अंश पर पहुंचकर पारा भी जम जाता है। भारत को ही देखिए, ज्येष्ठ और वैशाख के झुलसते दिनों में भी जहां लिहाफों व कम्बलों में सोना पड़ता है ऐसे शिमला आदि ठण्डे प्रदेश और पौष तथा माघ के ठिठुरते महीनों में भी जहां एक साधारण चादर में आनन्द से सोया जा सकता है ऐसे मद्रास आदि गर्म प्रदेश इसी भारत-भूमि पर विद्यमान हैं। भूस्वर्ग काश्मीर जैसा रमणीय हरा-भरा प्रदेश—जहां आत्म-सौंदर्य में विभोर प्रकृति उन्मत्त सुन्दरी की भांति खिल-खिलाकर हंसती ही रहती है इसी भारत में है और राजपूताने का वह शुष्क रेगिस्तान—जहां मीलों तक सिवाय रेत के और कोई चीज दिखाई ही नहीं देती—भी यही है। यदि अंगूरों का बाग लगाने वाला व्यापारी भूमण्डल की एकता के इसी सिद्धान्त से ही चिपटा रहे और मारवाड़ में बाग लगवाए तो उससे वह कितना कमाएगा यह अच्छी तरह समझा जा सकता है। इसी से मिलती-जुलती बात काल के सम्बन्ध में भी है, प्रत्येक वस्तु के विकास के लिये एक काल-विशेष प्रकृति की ओर से निर्धारित है जिसके आने पर तत्तद् वस्तुएँ स्वभावतः ही विकसित हो उठती हैं, यही इनका मौसम कहलाता है। आमों की बहार आषाढ़ और श्रावण में ही होती है, नारंगी और सन्तरों की पौष माघ में ही। गेहूं की फसल चैत्र वैशाख में ही पककर तैय्यार होती है आश्विन कार्तिक में कदापि नहीं। यद्यपि काल तो एक ही रहता है किंतु प्रकृति उसमें कितना महान् अन्तर डाल देती है। यह सब बातें अमुक-अमुक देश-काल विशेष की महत्ता की निर्णायक हैं। इनका पूर्ण ज्ञान तत्तत् विषय के विशेषज्ञों को ही होता है सर्वसाधारण को नहीं।
धार्मिक विधि-विधानों में समय-विशेष का महत्त्व प्रायः सभी सम्प्रदायों और मतों में मान्य है। स्वामी दयानन्द ने संस्कार विधि में—
"जिस दिन मूल आदि पुरुष नक्षत्रों से युक्त चन्द्रमा हो उसी दिन सीमन्तोन्नयन संस्कार करे"
—कहकर मुहूर्त के प्रति अपनी आस्था का परिचय दिया है। मुसलमान शुक्रवार को पाक मानते हैं और ईसाई रविवार को ही परमात्मा का विश्राम दिन होने के कारण पवित्र समझते हैं। जैन और बौद्ध अष्टमी एवं चतुर्दशी तिथि में विशेष प्रेम रखते हैं इसीलिये अशोक के समय में चतुर्दशी के दिन किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं हो सकती थी।
उपनयन के लिये भी क्रान्तद्रष्टा महर्षियों ने अमुक २ वर्ण के लिये आयु एवं ऋतु आदि का जो क्रम निर्धारित किया है वह भी कोरा धार्मिक विधानमात्र नहीं है किंतु सर्वथा प्राकृतिक विज्ञान पर आधारित रहस्यमय तथ्य है। यही वह समय है जिसमें किया हुआ कर्म अनन्त गुण फलदायक हो सकता है। पाठक नीचे दिये गए हेतुओं का ध्यान पूर्वक मनन करेंगे तो उन्हें ज्ञात होगा कि पूज्य महर्षियों ने कितनी गहराई में बैठकर उन तत्त्वों की खोज की है जिनका मानवशक्ति के विकास के साथ गहन सम्बन्ध है।
१—बृहदारण्यक उपनिषद् में महर्षि याज्ञवल्क्य ने महर्षि शाकल्य के प्रति ३३ देवता गिनाते हुए कहा है—
सहोवाच महिमान एवैषामेते त्रयस्त्रिंशत्त्वेव देवा इति। कतमे ते त्रयस्त्रिंशदित्यष्टौ वसव एकादश रुद्रा द्वादशादित्या एकत्रिंशदिन्द्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिंशाविति॥
(बृहदारण्यकोपनि० ९-२)
अर्थात्—तेतीस देवता कौन से हैं ? ८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, इन्द्र और प्रजापति। देवताओं में वसु ब्राह्मण स्वरूप हैं, रुद्र क्षत्रिय स्वरूप और आदित्य वैश्य स्वरूप। वसुओं में सर्व प्रथम अग्नि की उत्पत्ति हुई है जैसा कि—"अग्निः प्रथमो वसुभिर्नोऽव्यात्" इस श्रुति से स्पष्ट ज्ञात होता है। अग्नि का ब्राह्मण वर्ण के साथ कई प्रकार का सम्बन्ध है 'ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्' तथा 'मुखादग्निरजायत' इन दोनों श्रुति वचनों में विराट् के मुख से ब्राह्मण और अग्नि इन दोनों की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है, इसलिये यह दोनों सहोदर भाई हैं। "गुरुरग्निर्द्विजातीनाम्' कहकर स्मृतिकारों ने अग्नि को द्विजाति का गुरु माना है और उपनिषदों में उसे ब्राह्मण वर्ण का उपास्य देवता भी माना गया है। तात्पर्य यह है कि अष्ट वसुओं का ब्राह्मण के साथ सजातीय सम्बन्ध है। ब्राह्मण देवराज्य में इन अष्ट वसुओं के साथ मिलकर ही शक्ति संचय करता है इसलिये आठ वर्ष की अवस्था में ही ब्राह्मण बालक का यज्ञोपवीत उचित है।
रुद्र ग्यारह हैं। क्षत्रिय की भांति ये भी रजोगुण प्रधान उग्र प्रकृतियुक्त देवता हैं और उपनिषदों में इन्हें क्षत्रिय जाति का उपास्यदेव बतलाया गया है इसलिये शक्ति सञ्चयार्थ किया जाने वाला यह संस्कार क्षत्रिय बालक का ११वें वर्ष में जितना उपयुक्त हो सकता है उतना अन्य वर्षों में नहीं।
आदित्य १२ हैं। वैश्य की भांति इनका कार्य अपनी संचित समृद्धि से संसार का पोषण करना है। संसार के सम्पूर्ण धन धान्य इन्हीं की कृपा से फूलते फलते और पकते हैं, और हैं भी ये वैश्य वर्ण के उपास्य ही, इसलिये उपास्य देव के अनुकूल १२वें वर्ष में वैश्य बालक का यह मेधा-जनन संस्कार सम्पन्न हो तो उसके लिए कितना हितप्रद न होगा ?
२—पारस्कर गृह्य सूत्रकार ने छन्दों से सृष्टि विस्तार का प्रकरण लिखते हुए लिखा है—
गायत्र्या छन्दसा ब्राह्मणमसृजत्, त्रिष्टुभा राजन्यं, जगत्या वैश्यम्।
अर्थात्—गायत्री छन्द से ब्राह्मण की सृष्टि हुई, त्रिष्टुभ से क्षत्रिय की और जगती छन्द के योग से वैश्य की।
बृहदारण्यक उपनिषद् में इन गायत्री आदि छन्दों की विवेचना करते हुए बतलाया गया है—
अष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्र्यै पदम्। (बृ० उ० ५-१४-१)
अर्थात्—गायत्री छन्द का एक पाद आठ अक्षर का होता है, सुतरां ब्राह्मण बालक के उपनयन के लिये आठवें वर्ष से उपयुक्त समय दूसरा कौन हो सकता है ? जब गायत्री अष्टाक्षरपदा है तब उसे ग्रहण करनेवाला बालक भी क्यों न आठ वर्ष का ही हो ?
त्रिष्टुभ छन्द के प्रत्येक पाद में ११ अक्षर होते हैं, उससे उत्पन्न क्षत्रिय का उपनयन ११वें वर्ष में ही सम्यक् प्रतीत होता है।
इसी प्रकार जगती छन्द का प्रत्येक चरण १२ अक्षर का होता है इसलिये शास्त्रकारों ने वैश्य बालक के उपनयन के लिए बारहवां वर्ष ही उपयुक्त समझा है।
३—उपनयन काल में ऋतु निर्धारण भी तत्तद् वर्णों की प्रकृति के साथ सामञ्जस्य रखने के विचार से ही रक्खा गया है।
ब्राह्मण स्वभाव से ही शांत होता है उसमें क्रोध नहीं होता लेकिन आत्म गौरव की उष्णता अवश्य होती है और वसन्त ऋतु ? वह भी ब्राह्मण की तरह शांत ही, न उसमें पौष माघ का सा प्राणियों को सुन्न बना देने वाला भयंकर शीत और न ज्येष्ठ आषाढ़ की प्राण पीडक गर्मी। ब्राह्मण प्रकृति के साथ कितना सुन्दर समन्वय ! ऐसे समय में ब्राह्मण बालक का उपनयन करने पर उसमें द्विगुणित शक्ति का विकास होना स्वाभाविक है।
ग्रीष्म ऋतु ताप प्रधान है और क्षत्रिय बालक में भी वह ताप-पराक्रम एवं तेज स्वाभाविक रूप से निहित होता है। ग्रीष्म-ऋतु जैसी अनुकूल परिस्थितियों में उसका विकास स्वभाव सिद्ध ही है, इसलिए क्षत्रिय बालक का उपनयन ग्रीष्म में ही होना चाहिए।
धन धान्य परिपूर्ण शरद् ऋतु में वैश्य प्रकृति का प्रतिबिम्ब स्पष्ट झलकता है। व्यापार के लिये भी यही ऋतु सर्व श्रेष्ठ है। फलतः वैश्य बालक में विद्यमान इन गुणों के विकास के लिए शास्त्रकारों ने इसी ऋतु में उसके उपनयन का विधान किया है।