संसार में प्रत्येक वस्तु की सफलता का रहस्य उसके नियम पालन पर ही निर्भर है। इसके बिना इस वस्तु से लाभ न हो यह तो सुसम्भव है ही किन्तु कभी २ तो वह इतनी विपरीत फलदायक हो जाती है कि जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। नियम का यह प्रतिबंध—जिसे उग्र शब्दों में 'अड़गा' कहा जाता है—मनुष्य के लिए सर्वथा अपरिहार्य है। आप चाहे स्वस्थ हैं या बीमार, नियम की परिधि से बच नहीं सकते। बीमार होकर डाक्टर के पास जाइये, बीमारी की दवा के साथ २ वह आपको अनुपान के नियम, पथ्य परहेज आदि भी अवश्य बताएगा। अगर इस अनुपान आदि को रोगी बेकार समझे और उसका पालन न करे तो वह चाहे मकरध्वज भी खाये तो भी उसके के लिये हितकारी नहीं हो सकता। यज्ञोपवीत के लिए भी शास्त्रकारों ने इसी प्रकार कुछ नियम स्थिर किये हैं जिनका पालन उपवीतधारी के लिए आवश्यक है। आज लोग आक्षेप करते हैं कि आर्य जाति के सम्पूर्ण धार्मिक विधान एवं वेद शास्त्र सब अर्थहीन हो गए हैं। जिस यज्ञोपवीत के विषय में श्रुति डिंडिम घोष के साथ कहती है कि—"यह बल आयु तथा तेज का देने वाला है इसे धारण करो" किन्तु उसके धारण करने वालों में आज कितने व्यक्ति ऐसे हैं जो पूर्णायु बलिष्ठ और तेजस्वी हों ? उन विदेशी राष्ट्रों के मुकाबले में जहाँ कि लोग यज्ञोपवीत का नाम भी नहीं जानते, भारतवर्ष—जहां कि यज्ञोपवीत का प्रचार है, स्वास्थ्य आयु आदि सभी दृष्टि से गिरा हुआ है। तब—"यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः" का पाठ क्या कोरा पुण्य पाठ नहीं है ? इस प्रकार के आक्षेप करने वाले व्यक्ति इस बात को भूल जाते हैं कि उपवीत धारण करने वालों में आज ऐसे कितने व्यक्ति हैं, जो यज्ञोपवीत धारण के साथ उसके नियमों के पालन के ऊपर भी तत्परता पूर्वक ध्यान देते हैं ? जब तत्परता एवं सावधानी पूर्वक नियमों का पालन ही नहीं होता तो बल आयु एवं तेज की वृद्धि कैसे हो ? जब अनुपान और पथ्य पर ध्यान नहीं तो दवा के गुणों पर सन्देह क्यों ? इसलिए कल्याणाभिलाषी सज्जनों को नियम पालन का पूरा ध्यान रखना चाहिए, तब वे देखेंगे कि महर्षियों के वचन तथा श्रुति का वह डिण्डिम घोष असत्य नहीं।

(१) शुद्ध स्वदेशी एवं हाथ के बने हों—

यज्ञोपवीत के लिए शास्त्रकारों का पहिला नियम है कि वह स्वदेशी सूत से अपने हाथ से शास्त्रीय विधि पूर्वक बनाया हुआ हो। उसका सूत भी—अधिक अच्छा तो यही है कि स्वयं कातकर तैयार किया हो किन्तु यदि ऐसा न हो सके तो ब्राह्मण की कन्या या सौभाग्यवती ब्राह्मण स्त्री द्वारा काता हुआ होना चाहिये, यथा—

ब्राह्मणेन तत्कन्यया सुभगया धर्मचारिण्या ब्राह्मण्या वा कृतं सूत्रमादाय
(कात्यायन-परिशिष्ट)

यह नियम उपवीत धारण करने वाले प्रत्येक व्यक्ति में स्वावलम्ब की भावना पैदा करने वाला एवं स्वदेशी वस्तुओं के प्रति अनुराग का संचार करने वाला है। महर्षियों ने यज्ञोपवीत को बाजारू चीज नहीं बनाया कि कोई भी रत्ती छल्ली खरीद कर उसे गले में डाल ले। बाजारू वस्तु में उस विधि का और उन पवित्र भावनाओं का विचार कौन रखता है। जिस प्रकार पिछले दिनों जब खद्दरधारियों की बाढ़ सी आगई और कांग्रेस के रचनात्मक प्रोग्राम के अनुसार सूत कातने वालों की संख्या कम हो गई तो महात्मा गांधी ने यह नियम बना दिया था—जो कि कल तक भी खद्दर भण्डारों में चलता रहा है—कि खद्दर पहिनने का अधिकार केवल उसे है जो चर्खा कातकर अपने लिए सूत तैयार कर सके, इसी प्रकार यज्ञोपवीत का अधिकार स्वयं तैयार करके पहिनने वाले द्विज को ही दिया गया है।

(२) सदोपवीतिना भाव्यम्

हम पीछे कह आये हैं 'उपवीत' कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे किसी खास अवसर पर धारण करें और शेष समय में वह गले के दुपट्टे की भांति खूंटी या ट्रंक की शोभा बढ़ाता रहे। वह तो संस्कार के दिन से लेकर मृत्यु पर्यन्त शरीर से अलग न होना चाहिये। चिता में भी वह शरीर के साथ ही रहता है धर्मशास्त्रकारों ने केवल एक अवस्था ऐसी रक्खी है जिसमें उपनीत द्विज अपने यज्ञोपवीत को स्वयं उतार देता है और उसे फिर कभी धारण नहीं करता। वह है स्मार्त संन्यासाश्रम—एक ऐसी परिस्थिति जब मनुष्य—'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या' के नित्य सिद्धान्त की ओर अग्रेसर होता है। उसकी आत्मा देश एवं काल की परिधि को भेदकर शाश्वत् ब्रह्म में लय होने के लिए प्रस्तुत होती है, केवल उसी दशा में शास्त्रकारों ने यज्ञोपवीत और शिखा का परित्याग कहा है। अन्यथा तो द्विज को सर्वदा यज्ञोपवीतधारी ही होना चाहिए। आज इस नियम की ओर से भी लोग उदासीन से हैं। कभी मिल गया तो पहिन लिया नहीं तो नहीं सही। कभी वह बाबूजी के कमीज के साथ धोबी को दे दिया जाता है और कभी खूंटी की ही शोभा बढ़ाता है। कभी खण्डित अर्थात् टूटा हुआ ही गले में पड़ा रहता है। घर में सूतक पातक भी हो जाता है फिर भी वही पुराना यज्ञोपवीत गले में पड़ा रहता है यही सब ऐसी बातें हैं जिनके कारण यज्ञोपवीत को हम सूत का डोरा मात्र बना देते हैं, इसलिये इन बुराइयों से बचना चाहिए। टूट जाने पर, घर में किसी का जन्म या मृत्यु हो जाने पर, रजस्वला, चाण्डाल, शव आदि से स्पर्श हो जाने पर, श्रावणी, सूर्य चन्द्र ग्रहणादि के अनन्तर, यज्ञोपवीत को अवश्य बदल लेना चाहिये, यथा—

(क) सूतके मृतके क्षौरे चाण्डालस्पर्शने तथा।
रजस्वलाशवस्पर्शे धार्यमन्यन्नवं तदा
(नारा० संग्रह)

(ख) मलमूत्रं त्यजेद्विप्रो विस्मृत्यैवोपवीतधृक्।
उपवीतं तदुत्सृज्य धार्यमन्यन्नवं तदा॥
(सायण)