गृह्यसूत्रकारों ने शौच लघुशंका आदि के समय यज्ञोपवीत को कान पर लपेटने का विधान किया है, जैसा कि—

दिवासन्ध्यासु कर्णस्थो ब्रह्मसूत्र उदङ्मुखः।
कुर्यान्मूत्रपुरीषे च रात्रौ चेद्दक्षिणामुखः॥

—इत्यादि शास्त्रीय वचनों से स्पष्टतया प्रतीत होता है। शास्त्र के इस विज्ञान पूर्ण विधान के विषय में प्रायः अनेक प्रकार की शंकायें आस्तिक जन के हृदय में भी विद्यमान रहती हैं। प्रायः कहा जाता है कि यज्ञोपवीत कान पर ही क्यों लपेटा जाय—और वह भी दाहिने पर ही क्यों ? क्यों न उसे शिर पर रख लिया जाय या कन्धे पर इस प्रकार डाल लिया जाय कि उसके अपवित्र होने का यदि कोई भय है तो वह भी दूर हो इसलिए हम इस विषय पर कुछ पंक्तियें लिखना आवश्यक समझते हैं।

शास्त्रीय दृष्टि से

यों तो मानव शरीर का ऊपरी भाग शिर आदि ज्ञान का केन्द्र होने के कारण परम पावन माना जाता है किन्तु उसमें भी दाहिने कान को शास्त्रकारों ने विशेष महत्त्व दिया है, जैसा कि—

आदित्या वसवो रुद्रा वायुरग्निश्च धर्मराट्।
विप्रस्य दक्षिणे कर्णे नित्यं तिष्ठन्ति देवताः॥

—इत्यादि अनेक उक्तियों द्वारा दाहिने कानमें आदित्य वसु रुद्र आदि देवताओंका निवास स्थान बतलाया गया है। इसलिए दाहिने कान की पवित्रता तथा महत्ता के अभिप्राय से ही पूज्य महर्षियों ने यज्ञोपवीत को उस दशा में जब कि सम्पूर्ण शरीर ही अपावन होता है पवित्रता के सबसे महान केन्द्र कान पर रखने का विधान किया है।

स्वास्थ्य की दृष्टि से

शास्त्र विहित नियम प्रायः अनेक दृष्टिकोणों को अपने साथ समन्वित करके चलते हैं इसलिए इस नियम को हम शारीरिक शास्त्र (Physiology) दृष्टि से परखना चाहते हैं। मानव शरीर को ध्यान से देखिए। मध्य में वीर्यकोष है, यहां से चलने वाली लाल रंग की नाड़ी—जिसे आयुर्वेद में लोहितिका या रक्तवाहिनी कहा जाता है—दाहिने कान से होकर मनुष्य के मल-मूत्रद्वार तक पहुंचती है। यों तो मनुष्य शरीर के नवों दर्वाजों से अनेक प्रकार का मल निकलता रहता है किन्तु वीर्यरूपी मल जो कि शरीर रूपी भवन की नींव के समान है—मल या मूत्रद्वार से ही क्षरित हुआ करता है। प्रायः शौच के समय जोर लगाने से या लघुशङ्का के साथ वीर्य अज्ञात रूप से स्खलित होने लगता है और ध्यान न देने पर यह एक भयङ्कर रोग का रूप धारण कर लेता है जिससे शारीरिक स्वास्थ्य नष्ट होकर मनुष्य जीवित ही मृतवत् हो जाता है, यदि इस नाड़ी को किसी प्रकार वेध दिया जाय या उसके प्रवाह को किसी भांति रोक दिया जाय तो फिर वीर्य के स्खलित होने का किसी प्रकार का भय नहीं रहता। क्रान्तदर्शी महर्षियों ने इन सब बातों का प्रत्यक्ष अनुभव करके इस नाड़ी के भेदन के लिए जहां एक ओर कर्णवेध की रीति प्रचलित की थी, वहां यज्ञोपवीत द्वारा उस नाड़ी को बांधने का स्वास्थ्यकर नियम भी प्रचलित किया था। इसके कारण वे वीर्यरक्षा में तो समर्थ होते ही थे किन्तु यज्ञोपवीत की पवित्रता को भी अक्षुण्ण रखते थे।

लौकिक दृष्टि से

लौकिक दृष्टि से कान पर यज्ञोपवीत का होना, मनुष्य के अपवित्र हाथ पांव होने का एक चिन्ह है—जिसे देखकर दर्शक दूर से ही समझ सकता है कि अमुक व्यक्ति जब तक मिट्टी आदि से हाथ मांज कर शुद्धि आदि न कर ले तबतक वह अस्पृश्य है। आजकल नयी सभ्यता में पले हुए महानुभाव शौचोपरान्त शुद्धि का ख्याल नहीं रखते जिससे हाथों में समाये मल के कीटाणु अनेक प्रकार के रोगों के कारण बनते हैं। यज्ञोपवीत ऐसी दशा में शुद्धि करने की प्रेरणा प्रदान करता है उसका यह मोटा लाभ है जिसे सर्व साधारण समझ सकते हैं।