यज्ञोपवीत है तो सूत के धागों से बना हुआ नौ तार का एक डोरा ही,—परन्तु यह नौतार एक विशेष विधि से बने हुए ही होने चाहिएँ, मनमाने तरीके से सूत के कुछ धागों को बटकर यज्ञोपवीत नहीं बनाया जा सकता—वह तो सूत का डोरा मात्र होगा—यज्ञोपवीत नहीं।
विशेष विधि क्यों ?
हमने पीछे बतलाया है कि यज्ञोपवीत द्विजाति के उन सम्पूर्ण उत्तरदायित्व, कर्तव्य भार, एवं उदात्त भावनाओं का प्रतीक है जो ईश्वर ने उसे सौंपी है। इसका सीधा अर्थ है कि यज्ञोपवीत महज एक सूत का डोरा नहीं किन्तु भावना सम्बन्धी अंश से व्याप्त एक ऐसा सूत्र है, जो हमारे जीवन को श्रुति-स्मृत्यनुमोदित मार्ग से भटकने से रोकता है। यदि उसके भावना सम्बन्धी अंग को हम सर्वथा भुलादें तो वह यज्ञोपवीत नहीं किन्तु सूत के चन्द धागों के अतिरिक्त कुछ न होगा। इन भावनाओं की जागृति के लिए ही शास्त्रकारों ने यज्ञोपवीत निर्माण की विधि निर्धारित की है और साथ ही यह भी व्यवस्था दी है कि प्रत्येक यज्ञोपवीत धारी स्वयं अपने हाथ के परिमाण से यज्ञोपवीत का निर्माण करे। जब हम स्वयं अपने हाथ से निर्माण करेंगे तभी उस विधि में होनेवाली तत्तद् क्रियाओं के प्रति हमारे हृदय में जिज्ञासा पैदा होगी जिसका समाधान हम आचार्य या कुल-गुरुओं की सेवा में प्राप्त कर सकेंगे। इससे हमारे हृदय का अज्ञान ही दूर न होगा अपितु यज्ञोपवीत धारण से हम कितना गुरुतर भार अपने कन्धों पर उठाने को प्रस्तुत हो रहे हैं, कितनी भारी जुम्मेदारी हमारे ऊपर आपड़ी है यह सब बातें भी हमें भली भांति ज्ञात होंगी। यदि बिना परिश्रम या बिना किसी विशेष विधान के हम सूत से यज्ञोपवीत तैय्यार करें या बाजार से खरीदें तो इन सब भावनाओं की ओर हमारा ध्यान जाना सर्वथा असंभव है।
वह कौन २ भावनायें हैं ? इसका विवेचन तो हम आगे करेंगे पहिले संक्षिप्त में यज्ञोपवीत निर्माण विधि का वर्णन करना अनुचित न होगा। महर्षि कात्यायन कहते हैं—
अथातो यज्ञोपवीतनिर्माणप्रकारं वक्ष्यामः। ग्रामाद्बहिस्तीर्थे गोष्ठे वा गत्वाऽनध्यायवर्जितपूर्वाह्णे कृतसंध्याष्टोत्तरशतं सहस्रं वा यथाशक्ति गायत्रीं जपित्वा ब्राह्मणेन तत्कन्यया सुभगया धर्मचारिण्या वा कृतं सूत्रमादाय भूरिति प्रथमां षण्णवतीं मिनोति, भुवरिति द्वितीयां, स्वरिति तृतीयां मीत्वा, पृथक् पलाशपत्रे संस्थाप्य, आपोहिष्ठेति तिसृभिः, शन्नो देवीत्यनेन सावित्र्याचाभिषिच्य वामहस्ते कृत्वा त्रिः संताड्य, व्याहृतिभिस्त्रिवलितं कृत्वा, पुनस्ताभिस्त्रिगुणितं कृत्वा, पुनस्त्रिवृतं कृत्वा प्रणवेन ग्रन्थिं कृत्वोङ्कारमग्निं नागान् यमपितॄन् प्रजापतिं वायुं सूर्यं विश्वान् देवान् नवतन्तुषु क्रमेण विन्यस्य संपूजयेद्। देवस्येत्युपवीतमादाय, उद्वयं तमसस्परीत्यादित्याय दर्शयित्वा यज्ञोपवीतमित्यनेन धारयेदित्याह भगवान्कात्यायनः।
(कात्यायन परिशिष्ट)
अर्थात्—अब हम यज्ञोपवीत बनाने की विधि कहते हैं। यज्ञोपवीत बनाने वाले को चाहिए गांव से बाहर किसी तीर्थस्थान मन्दिर या गोशाला में जाकर अनध्याय रहित किसी भी दिन संध्यावन्दनादि नित्यकर्म तथा यथाशक्ति गायत्री जप करके ऐसे सूत से यज्ञोपवीत बनावे जो किसी ब्राह्मण द्वारा या ब्राह्मणकुमारी द्वारा अथवा सधवा ब्राह्मणी द्वारा बनाया हुआ हो। इस सूत को 'भूः' इस मन्त्र का उच्चारण कर ९६ अंगुष्ठ सहित चारों अंगुलियों के मूल पर लपेटे और उसे उतारकर किसी ढाक के पत्ते पर रख दे। इसी प्रकार 'भुवः' इस शब्द का उच्चारण कर दूसरी बार, और 'स्वः' इस शब्द का उच्चारण कर तीसरी बार हाथ पर लपेटे। अनन्तर 'आपोहिष्ठा' 'शन्नोदेवी' 'तत्सवितु' इत्यादि तीन मन्त्रों से उन्हें जल से भिगोकर बायें हाथ में रखकर तीन बार फटकारे। फिर तीन व्याहृतियों से उसे एक बटा देकर एक रूप बनाले। फिर उन्हीं मन्त्रों से उसे त्रिगुणित करे और बटकर एक रूप बना ले उसको फिर त्रिगुणित करके प्रणव से उसमें ब्रह्मग्रन्थी लगावे। उसके ९ तन्तुओं में ॐकार अग्नि आदि देवताओं का क्रमशः आवाहन और स्थापन करे। 'उद्वयं तमसस्परि' इत्यादि मन्त्र से सूर्य के सन्मुख करके 'यज्ञोपवीत' इस मन्त्र से धारण कर ले।
कात्यायन से मिलती जुलती निर्माण विधि ही अन्य गृह्यसूत्रों में भी मिलती है। महर्षि देवल आदि स्मृतिकारों ने भी इसका पूर्ण समर्थन किया है। इस विधि को पढ़कर साधारण व्यक्ति एक बारगी चकित रह जाता है, वह समझता है यह व्यर्थ का गोरख धन्धा है जो श्रद्धालु जनता को भरमाने के लिए बनाया गया है, किन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। उपरोक्त सभी क्रियाएँ वैज्ञानिक एवं गूढ़ अभिप्रायपूर्ण हैं जिनको समझ लेने पर हमें उन मेधावी महर्षियों की बुद्धि का कायल होना पड़ता है जिन्होंने आज से लाखों वर्ष पूर्व इन तत्त्वों का प्रत्यक्ष अनुभव करके उससे मानव जातिको कृतकृत्य किया।