सब से प्रधान प्रश्न यह है कि यज्ञोपवीत का परिमाण ९६ चप्पे ही क्यों है ? ९५ या ९७ क्यों नहीं, एकाध ज्यादा या कम हो गया तो उससे क्या हानि ? कम से शायद कुछ हानि हो सकती है किन्तु 'अधिकस्याधिकं फलम्' तो होना चाहिये।
वादी का उपरोक्त प्रश्न ठीक है, किन्तु क्या सांसारिक व्यवहार में हम ऐसे उदाहरण नहीं देखते जहां एक निश्चित परिमाण ही कार्य की सफलता का कारण माना जाता है। उससे कम या उससे अधिक परिमाण से उसका फल सर्वदा विपरीत हो जाया करता है। रासायनिक विज्ञान (Chemistry) के विद्यार्थी भली प्रकार जानते हैं कि उसमें एक निश्चित परिमाण में अमुक वस्तुओं का संयोग ही पदार्थान्तर की उत्पत्ति का कारण बन जाया करता है।
उदाहरणतया—कार्बन के अणुओं में एक निश्चित पृथक् २ क्रम और ताप उत्पन्न करके उसे हीरा, काला सीसा (Graphite) और चारकोल में परिवर्तित कर दिया जाता है। यह तो प्रायः सभी जानते हैं कि यदि दो दो तोले शहद और मक्खन मिला लिया जाय तो वह विष बन जाता है, कम या अधिक को मिलाने से कुछ नहीं बनता। इस प्रकार हम लोक में देखते हैं कि एक निश्चित परिमाण ही कार्य सिद्धि का निमित्त होता है। फलतः यज्ञोपवीत में ९६ चप्पों के परिमाण का सिद्धिदायक होना कोई लोक विरुद्ध बात नहीं है यह तो हुआ कम या अधिक को सम्मिलित करने के विषय पर विचार। अब ९६ ही क्यों ग्रहण किये जायें इस विषय में शास्त्र सम्मत नीचे लिखे हेतुओं का अनुशीलन कीजिए।
(१) हमने पीछे कहा है गायत्री वेदमाता है। समस्त वेदों में वह इसी प्रकार व्याप्त है जैसे माता पृथक् होते हुए भी मांस रक्त मज्जा आदि धातुओं के रूप में पुत्रों के शरीर में सर्वदा व्याप्त रहती है *। गायत्री के चौबीस अक्षर होते हैं, चारों वेदों में व्याप्त गायत्री छन्द के सम्पूर्ण मिलाकर २४×४=९६ अक्षर हो जाते हैं। चूंकि यज्ञोपवीत एक ऐसा संस्कार है जिसमें द्विज बालक को गायत्री एवं वेद दोनों का अधिकार प्राप्त होता है इसलिये इस संख्या को दृष्टि में रखते हुए श्रुति ने ९६ चप्पे वाले यज्ञोपवीत को ही धारण करने का विधान किया है। निम्नलिखित कारिका में आचार्यों ने इसी भावको व्यक्त किया है—
चतुर्वेदेषु गायत्री चतुर्विंशतिकाक्षरी।
तस्माच्चतुर्गुणं कृत्वा ब्रह्मतन्तुमुदीरयेत्॥
(शिष्टस्मृति)
(२) हमारा शरीर २५ तत्त्वों से बना हुआ है, सत्वरजस्तम इन गुणत्रय से यह सर्वदा व्याप्त रहता है। फलतः २८ संख्यात्मक—समुदाय वाला यह शरीर तिथि, नक्षत्रादि विविध भागों में विभक्त अनेक मानव संवत्सर पर्यन्त, इस संसार में जीवन धारण करता है। यह जीवन लक्ष्यहीन नहीं है। 'खाओ पीओ मौज उड़ाओ' आज के सभ्य तथा प्रगतिशील मानव समाज का सिंहनाद भले ही हो किन्तु जीवन के एक २ क्षण को प्रभु का अमित वरदान समझने वाले महर्षियों ने इसका सर्वात्मना सदुपयोग किया और ईश्वरीय ज्ञान वेद का अवलम्बन करके ब्रह्म प्राप्ति का शाश्वत् लक्ष्य मनुष्य के सामने रक्खा। अब यदि उपरोक्त सभी पदार्थों की संख्या का समन्वित योग किया जाय तो यह जानकर आश्चर्य होता है कि यह भी ९६ ही होता है, यथा—
तत्त्व २५, गुण ३, तिथि १५, वार ७, नक्षत्र २७, वेद ४, काल ३, मास १२, इन सब का जोड़ ९६ हुआ।
सामवेद छान्दोग्य परिशिष्ट में इसी अभिप्राय को लेकर '९६ चप्पे क्यों' के प्रश्न का समाधान करते हुए कहा गया है—
तिथिवारञ्च नक्षत्रं तत्त्ववेदगुणान्वितम्।
कालत्रयं च मासाश्च ब्रह्मसूत्रं हि षण्णवम्॥
(३) 'लक्षं तु चतुरो वेदा लक्षमेकं तु भारतम्' इस आप्त वचन में वैदिक ऋचाओं की संख्या एक लाख बताई गई है। श्री भगवान् पतञ्जलि ने भी महाभाष्य में वेद मन्त्रों की संख्या एक लाख बतलाई है। इन एक लाख मन्त्रों में ८०००० मन्त्र कर्मकाण्ड सम्बन्धी हैं, १६००० उपासना काण्ड सम्बन्धी और ४००० ज्ञान काण्डसम्बन्धी। ब्रह्मचर्यावस्था—अर्थात् उपवीत होने के अनन्तर वानप्रस्थ पर्यन्त प्रत्येक द्विजाति कर्म और उपासना का अधिकारी होता है और चतुर्थाश्रम—सन्यास में चले जाने पर उसे ज्ञान का अधिकार मिलता है। वेद की उपर्युक्त मर्यादा के अनुसार चूंकि उपनीत होने वाले व्यक्ति को ९६ हजार ऋचाओं का ही अधिकार प्राप्त होता है इसलिए उस उपवीत का परिमाण भी ९६ चप्पे होना युक्तिसंगत ही है। शेष ४००० ऋचाओं के स्वाध्यायादि का जब अधिकार प्राप्त होगा तब यज्ञोपवीत की—जो प्रवृत्ति मार्ग के प्राणियों के लिए ही है कोई आवश्यकता नहीं रहती। इसलिए स्मार्त सन्यास धारण करने के समय उस मार्ग पर प्रस्तुत होने वाले व्यक्ति की शिखा और सूत्र दोनों वस्तुएं दूर कर दी जाती हैं।
यज्ञोपवीत की लम्बाई मोटाई के विषय में धर्मशास्त्रकारों की व्यवस्था है—
पृष्ठवंशे च नाभ्याञ्च धृतं यद्विन्दते कटिम्।
तद्धार्यमुपवीतं स्यान्नातिलम्बं न चोच्छ्रितम्॥
सिद्धार्थफलमानेन धार्यं स्यादुपवीतकम्।
यशोहरमतिस्थूलमतिसूक्ष्मं धनापहम्॥
अर्थात्—द्विजाति को ऐसा यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये जो कन्धे के ऊपर से आता हुआ और नाभि का स्पर्श करता हुआ कटि तक ही पहुँचे, न इससे नीचे और न ऊपर। उसकी मोटाई सरसों की फली की तरह होनी चाहिये यदि उससे अधिक मोटा होगा तो वह यश नाशक होगा और पतला धन नाशक। यह व्यवस्था ९६ चप्पे का यज्ञोपवीत होने पर ही ठीक बैठती है। ऋषिकुल ब्रह्मचर्याश्रम हरिद्वार की वैदिक प्रयोगशाला में जब इस सिद्धान्त का इसी दृष्टि से परीक्षण किया गया तो यह देखकर आश्चर्य की सीमा न रही कि ९६ चप्पेवाला यज्ञोपवीत बिलकुल कटि पर्यन्त ही पहुँचा जब कि अन्य परिमाण वाले यज्ञोपवीत इस कसौटी पर पूरे न उतरे। उसकी मोटाई आदि के बारे में जो कुछ कहा गया है वह कोई रहस्यमय उक्ति नहीं है। सभी लोग जानते हैं कि यज्ञोपवीत का इस परिमाण से अधिक मोटा होना अपने फूहड़पन तथा अयोग्यता का निर्देशक होने के कारण जहाँ स्पष्ट ही यश का नाशक है, वहाँ बहुत पतला यज्ञोपवीत बार २ टूट जाने के कारण धन नाशक होगा ही।
(५) सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार मानव शरीर का आयाम ८४ अंगुल से लेकर १०८ अंगुल तक होता है जिसका कि मध्यमान ९६ ही होता है। इस दृष्टि से यज्ञोपवीत के ९६ चप्पे होने ही उपयुक्त है।
तात्पर्य यह है कि विभिन्न आचार्यों द्वारा विभिन्न दृष्टिकोणों से परखे गये उपरोक्त समाधानों का अनुशीलन करने के बाद प्रत्येक विचारशील पाठक इसी परिणाम पर पहुँचेगा कि श्रुतिविहित स्मृत्यनुमोदित एवं मेधावी महर्षियों द्वारा समर्थित यज्ञोपवीत मान सम्बन्धी उपर्युक्त सिद्धान्त सर्वथा सोच समझकर ही निर्धारित किया गया है।
* टिप्पणी—आयुर्वेद के मतानुसार मानव शरीर में विद्यमान पदार्थों में से वीर्य, अस्थि ओज शिरा स्नायु आदि की उत्पत्ति पिता के शुक्र से होती है और रक्त मज्जा मांस मेद की उत्पत्ति माता के रज से। वीर्य एवं रजगत सभी गुण दोष सर्वदा मनुष्य शरीर के मूल में विद्यमान रहते हैं और इसी में कुल परम्परागत रोग एक से दूसरे के शरीर में प्रविष्ट हो जाया करते हैं। (सुश्रुत ३-३६)।