तीन की संख्या ऐहलौकिक और पारलौकिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक सभी क्षेत्रों में अपना विशेष स्थान रखती है। ऋग् यजु, साम-वेद तीन, पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्यु,-लोक तीन, सत्त्व, रज तम-गुण तीन, ब्रह्मा, विष्णु महेश-प्रधान देवता तीन, गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिण-अग्नि तीन, और यज्ञोपवीत के अधिकारी भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य-तीन ही। ऐसी दशा में यज्ञोपवीत के निर्माण में भी तीन सूत का उपयोग सर्वथा सुसंगत ही है। जब यह समस्त विश्व ही त्रिगुणात्मिका प्रकृति के अभिन्न निमित्तोपादान कारण से निर्मित है, इसके प्रत्येक कण में त्रिगुण ओतप्रोत है तब यज्ञोपवीत का त्रिगुणात्मक तन्तुओं से निर्माण और त्रिवृतकरण कोई समझ में न आने लायक बात नहीं है।

इसका अभिप्राय यह भी है कि इसे ब्रह्मचारी गृहस्थ वानप्रस्थ तीन आश्रमों में रहते हुए धारण किया जाता है। चतुर्थाश्रम में पहुँचने पर जब मनुष्य स्मार्त ज्ञान मार्ग की ओर अग्रेसर होता है तब यज्ञोपवीत से उसे कोई प्रयोजन नहीं रहता।

चूंकि यज्ञोपवीत के धारण से मनुष्य देवत्व की ओर अग्रेसर होता है—मृत्युलोक से ऊपर उठता है, इसलिये उन तीन सूतों को महाव्याहृति मन्त्रों से ऊपर को ही ऐंठा जाता है यह क्रिया मानो उसे ऊर्ध्व गमन की प्रेरणा देती है।

तीन सूत्र से निर्मित यह उपवीत उपरोक्त विधि से निर्मित होने पर अब नव तन्तुमय सूत्र बन जाता है। यह नवों तन्तु साधारण तन्तु नहीं किन्तु विभिन्न देवताओं के आवास स्थान होते हैं। गृह्य सूत्रकारों ने लिखा है कि यज्ञोपवीत तैय्यार हो जाने पर उसके नव तन्तुओं में विधिवत् निम्नलिखित देवताओं का आवाहन प्रतिष्ठापन करे। अमुक २ देवताओं का यह आवाहन और प्रतिष्ठापन 'भावनावाद' के अनुसार हमारे हृदय में तत्तद् देवताओं के विशेष गुणों का सञ्चार करेगा।—'मैंने तेज धृति शुचि आदि विविध गुण परिपूर्ण देवताओं से अध्यासित उपवीत को धारण किया है। मैं तेजस्वी हूँ, मैं धृतिमान हूँ, मैं शुद्ध हूँ' आदि भावनाएँ हमारे चारित्रिक एवं नैतिक विकास में कितनी उपयोगी सिद्ध होती हैं इसे प्रत्येक विचारशील पाठक सहज ही अनुभव कर सकता है।

इन देवताओं की विद्यमानता से मनुष्य की मानसिक वृत्तियें विपथगामी न होकर शास्त्र निर्दिष्ट श्रेय मार्ग के प्रति प्रवृत्त होती हैं, कलुषित विचारों का दमन होता है और शुभ विचारों का उदय। जिस प्रकार राजा के सान्निध्य में मनुष्य दुराचरण में प्रवृत्त होते हुए भयभीत होते हैं इसी प्रकार इन देवताओं के सानिध्य से भी उसका मन पाप की ओर प्रवृत्त होने में भय का अनुभव करता है। यह बात प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा भली भांति देखी जा सकती है कि जब मनुष्य विपथगामी होने लगता है तो सब से पहिले वह यज्ञोपवीत को ढोंग समझकर बाहर फेंक देता है। इससे उसका स्वच्छन्द मन भारमुक्त हो जाता है। जिन देवताओं के सान्निध्य से पाप करते हुए उसका हृदय कांपता था, उसकी स्वच्छन्द प्रवृत्तियों में बाधा पड़ती थी उन्हें दूर करके ही उसका अज्ञ हृदय प्रसन्नता अनुभव करने लग जाता है। अब उसके सामने भक्ष्याभक्ष्य और कार्याकार्य का कोई बन्धन नहीं रहता। इससे यह सिद्ध होता है कि यज्ञोपवीत में ऐसी कोई शक्ति अवश्य थी जो बार-बार उसके हृदय को टोकती थी और उसे पापाचरण में प्रवृत्त होते समय रोकती थी।

यह ९ देवता कौन-कौन हैं इसके लिए सामवेदीय छान्दोग्य परिशिष्ट में लिखा है—

ॐकारोऽग्निश्च नागश्च सोमः पितृप्रजापती।
वायुः सूर्यश्च सर्वश्च तन्तुदेवा अमी नव॥

ॐकारः प्रथमे तन्तौ द्वितीयेऽग्निस्तथैव च।
तृतीये नागदैवत्यं चतुर्थे सोमदेवता॥
पञ्चमे पितृदैवत्यं षष्ठे चैव प्रजापतिः।
सप्तमे मारुतश्चैव अष्टमे सूर्य एव च॥
सर्वे देवास्तु नवमे इत्येतास्तन्तुदेवताः॥

निम्नलिखित कोष्ठक से आह्वनीय देवताओं और उनके गुण विशेष का परिचय मिल सकता है।

नाम तन्तु — अधिष्ठाता — गुण
१ — ॐकार — ब्रह्मलाभ
२ — अग्नि — तेजस्विता
३ — अनन्त — धैर्य
४ — चन्द्र — आह्लादकत्व
५ — पितृगण — स्नेह
६ — प्रजापति — प्रजापालन
७ — वायु — शुचित्व
८ — सूर्य — प्राणत्व
९ — सर्वदेव — सर्वगुण