यज्ञोपवीत निर्माण विधि में पीछे बतलाया गया है कि यज्ञसूत्र के तैय्यार हो जाने पर उसमें प्रणव रूपी महामन्त्र का उच्चारण करता हुआ ब्रह्मग्रन्थी लगादे। यह ब्रह्मग्रन्थी ब्रह्मसूचक ग्रन्थी होने के कारण ही ब्रह्मग्रन्थी कहलाती है। यह समस्त विश्व ब्रह्म से प्रादुर्भूत हुआ है और अन्त में उसी में लय हो जायेगा। 'हरिरेव जगद् जगदेव हरि' के अनुसार यह समस्त संसार ब्रह्म की ही छाया माया है और उससे भिन्न संसार में कुछ भी नहीं है। मनुष्य इस महान् तत्त्व को भुलाकर ही काम-क्रोध लोभ-मोहादि सांसारिक प्रपंचोंमें लिप्त हो जाता है। इस सर्वदा स्मरणीय तत्त्वको प्रतिक्षण ध्यान में रखने के अभिप्राय से ही यज्ञोपवीत अन्त में ब्रह्मग्रन्थी पर समाप्त होता है। संसार में प्रायः यह परिपाटी प्रसिद्ध है कि जब हम किसी वस्तु को विशेषरूप से स्मरण रखना चाहते हैं तो उसके लिए कपड़े में एक गांठ लगा लिया करते हैं। 'गांठ बांध लेना' ऐसे ही अर्थ में एक सुप्रसिद्ध लोकोक्ति तक बन गई है। फलतः ब्रह्मप्राप्ति रूप चरम लक्ष्य की स्मारक ही यह ग्रन्थी 'ब्रह्मग्रन्थी' कहलाती है। प्रणव रूपी महामन्त्र स्वयं समस्त वेद राशिका संक्षिप्ततम रूप है। उसमें विद्यमान अ+उ+म् यह तीनों वर्ण सत्त्वरजस्तम तथा ब्रह्मा विष्णु रुद्ररूपी ब्रह्माण्ड-नियामक तीनों शक्तियों के प्रतिनिधि हैं। इस प्रकार समस्त आध्यात्मिक वाङ्मय मूलाधारभूत प्रणव से उस उपवीत में ग्रन्थी बन्धन प्रणव जप द्वारा ब्रह्म में लय होने की शास्त्रीय पद्धति का कितना सुन्दर निदर्शन है—यह अनायास ही समझा जा सकता है।

ब्रह्मग्रन्थी के ऊपर अपने-अपने गोत्र प्रवरादि के भेद से १, २, या ५ गांठ लगाने के शास्त्रीय विधान का तात्पर्य अपनी कुल-परम्परा से आती हुई शास्त्र मर्यादा की रक्षा है और है उन पुण्यात्माओं पूर्वपुरुषों का स्मरण जिनके हम उत्तराधिकारी हैं, जिनकी सुदीर्घ तपश्चर्या अटूट परिश्रम और सत्यनिष्ठा के कारण आज हम सम्मान के साथ जीवित हैं।