(क) ब्रह्मचारिण एकं स्यात् स्नातकस्य द्वे बहूनि वा।
(आश्वलायन गृह्यसूत्र)

(ख) यज्ञोपवीते द्वे धार्ये श्रौते स्मार्ते च कर्मणि।
तृतीयमुत्तरार्थे च वस्त्राभावे तदिष्यते॥
(हेमाद्रि)

अर्थात्—(क) ब्रह्मचारी का एक यज्ञोपवीत होना चाहिए, स्नातक के दो या उससे अधिक। (ख) श्रौत स्मार्त कर्मों की निष्पत्ति के लिए दो यज्ञोपवीत धारण करने चाहियें, यदि उत्तरीय वस्त्र न हो तो तीसरा धारण किया जा सकता है।

धर्मशास्त्रकारों की उपर्युक्त व्यवस्था सम्बन्धी 'क्यों' का उत्तर (ख) भागोल्लिखित श्लोक में ही दे दिया गया है। ब्रह्मचर्यावस्थामें द्विज बालकका कार्य केवल अग्नि परिचर्या और गुरु शुश्रूषापूर्वक विद्याध्ययन है। कर्मकाण्ड के अन्य जटिल जंजाल से उस वटुक को शास्त्रों ने सर्वथा दूर रक्खा है क्योंकि ऐसा न करने से उसके अध्ययन में विघ्न पड़ने की पूरी सम्भावना है जैसा कि आजकल भी विद्यार्थियों को सब प्रकार के राजनैतिक संघर्षों से दूर रखने का प्रयत्न किया जाता है। चूंकि उस बालक को ब्रह्मचर्य्यावस्था में रहते हुए गृहस्थाश्रम में होने वाले काम्यकर्मादि नहीं करने पड़ते, इसलिए गृह्य सूत्रकारों ने उसे यज्ञवेदी पर एक ही यज्ञोपवीत धारण करने का विधान किया है। स्नातक हो जाने के उपरान्त मनुष्य को सभी प्रकार के श्रौत और स्मार्त कर्मों के करने की आवश्यकता पड़ती है इसलिए उभयविध कर्मों के प्रतिनिधि स्वरूप दो यज्ञोपवीत धारण करने का शास्त्रीय नियम सुसंगत होता है। लोग कहा करते हैं कि दूसरा यज्ञोपवीत स्त्री के हिस्से का है। उनके इस कथन का तात्पर्य इतना ही हो सकता है कि चूंकि स्त्री के आ जाने पर-समावर्तनानन्तर गृहस्थमे प्रवेश कर लेने पर-ही यह दूसरा यज्ञोपवीत धारण किया जाता है अतः लक्षणा से स्त्रीमूलक होने के कारण इस यज्ञोपवीत को स्त्री के हिस्से का कहना अनुपयुक्त नहीं। इसके अतिरिक्त सगुण और निर्गुण भेद से उभयविध ब्रह्म को प्राप्त कराने वाले होने के कारण दो ही ब्रह्मसूत्र धारण करने चाहिये।