सभ्यता संस्कृति एवं विभिन्न विचारों के इस संघर्षमय युग का विषाक्त प्रभाव सभी दिशाओं में पड़ा है और उससे मानव हृदय में अनन्तकाल से विद्यमान श्रद्धा एवं विश्वासमयी भावनाओं की सुदृढ़ नींव भी एकबारगी हिल उठी है। लोग शास्त्रवाद से, तर्क-अनैकान्तिक तर्कवाद की ओर आ रहे हैं और प्राचीन समय से चली आने वाली सभी व्यवस्थाओं को छिन्न-भिन्न करके मनमाना आचरण ही आज का धर्म हो गया है। जन-कल्याण-विधायिनी श्रुति माता ने, क्रान्तदर्शी महर्षियों तथा स्मृतिकारों ने त्रैवर्णिक पुरुषों को यज्ञोपवीत धारण करने का आदेश दिया था उन्हें तो वह व्यर्थ भार प्रतीत हो रहा है और जिनको श्रुति ने उपनयन के कठिन नियमों से मुक्त कर सरल पद्धति से कल्याण का अधिकारी बनाया वे स्त्री शूद्रादि, आज यज्ञोपवीत धारण करने के लिये उतावले दिखाई पड़ते हैं।

उनके उपनयन और वेदाध्ययन को सिद्ध करने के लिये जहाँ एक ओर हृदयग्राही रोचक तर्कों का आश्रय लिया जाता है वहाँ साथ ही वेद धर्मशास्त्र स्मृति-पुराण का आलोडन करके-उसमें लम्बी-चौड़ी डुबकियें लगाकर तत्सम्बन्धी प्रमाणों की पड़ताल करने में भी आकाश-पाताल एक किया जा रहा है।

हमारे विचार से यदि उपनयन सम्बन्धी इस निबन्ध में उपरोक्त विषय पर प्रकाश न डाला जाय तो यह अधूरा ही रहेगा एतदर्थ इस पर भी लगे हाथों कुछ विचार व्यक्त करना अप्रासंगिक न होगा।

आज के प्रगतिशील कहे जाने वाले सुधारकों की ओर से कहा जाता है कि जब भगवान् की प्रत्येक वस्तु मनुष्यमात्र के लिये बनाई गई है, यथा—सूर्य, चन्द्र, तारागण, वायु, जल, जंगल, पहाड़, पशु-पक्षी इत्यादि, तब वेद से या वेदप्रोक्त उपनयनादि संस्कारों से जिनमें मनुष्यमात्र का कल्याण निहित है—स्त्री एवं शूद्रों को क्यों वंचित रखा जाता है ? ज्ञान पर ताला लगाना या उसे किसी की बपौती समझकर दूसरों को उसे प्राप्त करने से रोकना कहाँ तक उचित है ? इस प्रकार की कल्याणमयी पद्धतियों पर और संस्कारों पर मनुष्यमात्र का समान अधिकार होना चाहिए। ऐसा न करना जहां एक ओर स्त्री शूद्रों के प्रति घोर अन्याय है, वहाँ साथ ही वेद की उस आज्ञा का प्रत्यक्ष विरोध भी, जिसके द्वारा उसने मनुष्यमात्र के लिए ज्ञान के द्वार खोल रखे हैं। 'यथेमां वाचं कल्याणीं' आदि अनेक मन्त्र और ऐतिहासिक साक्षियें इस बात के जीते-जागते प्रमाण हैं कि प्राचीनकाल में प्रत्येक पुरुष को समान रूप से उपनयन वेदपाठ आदि का अधिकार था आदि-आदि।

उपरोक्त तर्कों को सुनने और पढ़ने का अवसर हमें प्रायः मिलता ही रहता है। इधर सं० २००२ में जबकि हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस के धर्मविज्ञान विभागके प्रोफेसरों द्वारा विश्वविद्यालय के फारसी के प्रोफेसर मु० महेशप्रसाद जी एम० ए० 'मौलवी फाजिल' की कन्या कल्याणीदेवी को वेद पढ़ाना अस्वीकार कर दिया गया तबसे इस विषय की ओर लोगों का अधिक ध्यान आकृष्ट हुआ। इस घटना ने शान्त वातावरण में एक क्रान्ति-सी पैदा कर दी, सुधारकों और नवशिक्षित वेदज्ञाभिमानियों ने अखबार के कालम के कालम रंग डाले। तरह-तरह की पुस्तकें प्रकाशित की गईं जिनका एकमात्र उद्देश्य उसके वेदाधिकार का समर्थन था।

इस आन्दोलन में हमें दो प्रकार के व्यक्ति दिखाई पड़ते हैं। एक वे जो वेद धर्मशास्त्र आदि के नाम पर ऐसा करना चाहते हैं, दूसरे वे जो वेद शास्त्रादि को कोई प्रामाण्य न देते हुए तर्क के बल पर ही आरूढ़ हैं। पहिलों का कथन है कि वेद में कोई इस प्रकार का वचन नहीं है जिससे स्त्री शूद्रों के उपनयन या वेदाध्ययन का निषेध हो, यह तो रूढ़िवादियों द्वारा प्रचलित संकुचित मनोवृत्तिपूर्ण सिद्धान्त है—जिसका कि किसी आर्षग्रन्थ से समर्थन नहीं होता। तदनुसार हम प्रथम इस प्रकार के प्रमाण उपस्थित करेंगे जिनसे विदित होता है कि वेद से लेकर तदुपबृंहण रूप स्मृति, सूत्र, पुराणादि सभी ग्रन्थों में कितने स्पष्ट शब्दों में स्त्री शूद्र के उपनयनादि का निषेध समुपलब्ध होता है।

यहाँ यह समझ लेना चाहिए कि उपनयन तथा वेदाध्ययन इनका परस्पर आश्रयाश्रयी भाव सम्बन्ध है। यज्ञोपवीत या ब्रह्मसूत्र की परिणति यज्ञ और ब्रह्म—अर्थात् वेद के अध्ययन में है। सीधे शब्दों में हम यों कह सकते हैं कि यज्ञोपवीत इसलिए किया जाता है कि उपनीत व्यक्ति को यज्ञ और वेदाध्ययन का अधिकार प्राप्त हो सके। यज्ञोपवीत और ब्रह्मसूत्र इन दोनों शब्दों से स्वयं ही यह अर्थ ध्वनित हो रहा है। इसी प्रकार यज्ञ और ब्रह्म=वेद की सार्थकता भी यज्ञोपवीत से ही है। बिना यज्ञोपवीत के न यज्ञ किया जा सकता है न वेद-पाठ। किम्बहुना, यज्ञोपवीत, यज्ञ और वेद यह तीनों परस्पर समाश्लिष्ट हैं और एक-दूसरे के लिये सापेक्ष्य भी। इसलिए इनमें से एक वस्तु का भी विधान तीनों का विधान है और एक का निषेध तीनों का निषेध। इसलिये अधोलिखित निषेध वचनों में किसी एक का विधान या निषेध देखने पर इस प्रकार का संशय व्यर्थ है कि अन्यों का तो विधान या निषेध है ही नहीं।

निषेध परक प्रमाण

(क) स्तुता मया वेदमाता प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम्।
(अथर्व० १९।७१।१)

(ख) सावित्रीं प्रणवं यजुर्लक्ष्मीं स्त्रीशूद्राय नेच्छन्ति सावित्रीं लक्ष्मीं यजुः प्रणवं यदि जानीयात् स्त्रीशूद्रः स मृतोऽधो गच्छति, तस्मात्सर्वथा नाचष्टे स आचार्यस्तेनैव स मृतोऽधो गच्छति।
(अथर्व०, नृसिंह पू० ता० १।३)

(ग) स्त्रीणां शूद्रांधपंगूनां बधिराः पतिताश्च ये।
क्लीबानां नैव काणानां वेदविद्याधिकारिता॥
(अस्यवामीय सूक्त आत्मानन्द भाष्य)

(घ) आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्तः।
(अथर्व० ११।५।३)

(ङ) ब्रह्मचारी एति समिधासमिद्धः कार्ष्णं वसानो दीक्षितो दीर्घश्मश्रुः।
(अथर्व० ११।५।६)

(च) वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः।
पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया॥
(मनु० १।६७)

(छ) न वै देवाः सर्वेणैव संवदन्ते ब्राह्मणेनैव राजन्येन वा वैश्येन वा ते हि यज्ञीयाः।

(ज) नैव कन्या न युवतिर्नाल्पविद्यो न बालिशः।
होता स्यादग्निहोत्रस्य नार्तो नासंस्कृतस्तथा॥
(मनु० ११।३६)

(झ) तूष्णीमेताः क्रियाः स्त्रीणां विवाहस्तु समन्त्रकः।
(याज्ञ० शिक्षा १।२।१३)

(ञ) तस्या यावदुक्तमाशीर्ब्रह्मचर्यमतुल्यत्वात्।
(मीमांसादर्शन ६।१।२४)

(ट) सामर्थ्यमपि न लौकिकं केवलमधिकारकारणं भवति, शास्त्रीयेऽर्थे शास्त्रीयस्य सामर्थ्यस्य अपेक्षितत्वात्। शास्त्रीयस्य च सामर्थ्यस्य अध्ययननिराकरणेन कृतत्वात्।
(१।३।३४)

(ठ) अयं स होता यो द्विजन्मा।
(ऋ० १।१४९।५)

(ड) तस्मात् शूद्रो यज्ञेऽनवक्लृप्तः।
(ऋ० १।१४९।५)

(ढ) 'अपि तत्रभवान् वृषलं याजयति' अहो अन्याय्यमेतत्। 'कथं नाम तत्रभवान् वृषलं याजयेत्। यच्च यत्र वा तत्रभवान् वृषलं याजयेद्, गर्हामहे अन्याय्यमेतत्।
(स्वा० दयानन्द लकारार्थ प्रक्रि० पृ० २६२, ६३, ६४)

(ण) स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा।
(श्रीमद्भा०)

(त) ब्राह्मण क्षत्रिय वा वैश्य के घर से अग्नि ला…
(संस्कार विधि पृ० २३७)

अर्थात्—(क) द्विज=ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य को पवित्र करने वाली वेदरूपी माता मेरे द्वारा स्तुत होकर मुझे (ज्ञान की) प्रेरणा करे। (ख) गायत्री मन्त्र, ॐकार, यजुर्वेदोपलक्षित यज्ञादि का अधिकार स्त्री शूद्र के लिए अभीष्ट नहीं, यदि वे हठात् इनको ग्रहण करें तो मरने पर नरक को प्राप्त होते हैं। यदि आचार्य उन्हें इनका उपदेश दे तो वह भी नरक को प्राप्त हो। (ग) स्त्री शूद्र, अंधा, लंगड़ा, बहरा, पतित, नपुंसक और काणा—इन्हें वेद का अधिकार नहीं। (घ) आचार्य ब्रह्मचारी को (ब्रह्मचारिणी को नहीं) उपनीत करके तीन रात्रिपर्यन्त अपने पास रखता है और फिर वह जब ज्ञानी बनकर बाहर आता है तब देवता भी उसके दर्शन के लिए लालायित होते हैं। (ङ) मृगचर्म मेखलाधारी दीर्घ श्मश्रुवाला ब्रह्मचारी (क्या स्त्री मेखला कौपीन धारण पूर्वक ब्रह्मचर्य धारण करती है और मूंछ दाढ़ी वाली होती है ?) यज्ञ के लिए समिधा लेकर आता है। (च) स्त्रियों का विवाह ही उनके यज्ञोपवीत संस्कार के समान है, पति-सेवा गुरुगृहवास स्थानीय है, और घर का काम-काज-भोजनादि बनाना ही अग्न्याधान है। (छ) देवता सभी से हवि ग्रहण नहीं करते, वे तो ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य से दी हुई ही ग्रहण करते हैं, क्योंकि इनका ही यज्ञ में अधिकार है। (ज) कन्या, युवति स्त्री, थोड़ा पढ़ा हुआ, मूर्ख, बीमार, संस्कारहीन को अग्निहोत्र में 'होता' नहीं बनाया जा सकता। (झ) विवाह को छोड़कर स्त्रियों के शेष सभी संस्कार बिना मन्त्र के ही होते हैं। (ञ) स्त्री, पुरुष के तुल्य नहीं हो सकती क्योंकि वह ब्रह्मचर्य आदि कई बातों में उससे भिन्न है। (ट) केवल 'उसमें ऐसा करने की ताकत है' इतनेमात्र से किसी को अधिकार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि शास्त्रीय विषय में तो शास्त्रीय शक्ति की ही आवश्यकता है। स्त्रियों की शास्त्रीय सामर्थ्य तो यज्ञोपवीत के न होने से ही उनमें न रही फिर उनका यज्ञ में अधिकार कैसा ? (ठ) जो, द्विज माता-पिता से उत्पन्न है वही 'होता' हो सकता है। (ड) इसलिए शूद्र का यज्ञ में अधिकार नहीं। (ढ) क्या तुम शूद्र को यज्ञ करवाते हो, यह तो बड़ा अन्याय है। आप शूद्रों को यज्ञ कैसे करवाओगे। आप जहाँ कहीं शूद्रों को यज्ञ करायेंगे हम उसकी निन्दा करेंगे, यह बड़ा अन्याय है। (ण) स्त्री शूद्र और पतित द्विजों को वेदत्रयी का अधिकार नहीं।

श्रुति स्मृति पुराण प्रतिपादित शतशः प्रमाणों में से उद्धृत इन कतिपय प्रमाणों को देखकर पाठक स्वयं सत्यासत्य का निर्णय कर सकते हैं, कि स्त्री शूद्रों का वेदानध्ययन तथा उपनयनाभाव रूढ़िमात्र पर अवलम्बित है या शास्त्रीय प्रमाणों पर ? इन डेढ़ दर्जन प्रमाणों की उपस्थिति में इस प्रकार की उक्तियें बालविजृम्भित ही नहीं किन्तु आर्ष साहित्य के प्रति अपनी अज्ञता का स्पष्ट प्रदर्शन भी है।

इन प्रमाणों के अतिरिक्त इस सम्बन्ध में कुछ और भी बातें विचारणीय हैं जिनसे इस दिशा में काफी प्रकाश पड़ता है।

(१) जैसा कि हम पीछे कह आये हैं उपनयन काल के संबंध में श्रुति की व्यवस्था है कि—'वसन्ते ब्राह्मणमुपनयेत्, ग्रीष्मे राजन्यम्, शरदि वैश्यम्'। भगवान् कृष्ण ने—'ऋतूनां कुसुमाकरः' कहकर वसन्त को अपनी विभूति बतलाया है, अतः दैव सम्पत्तियुक्त ब्राह्मण बालक के उपनयन के लिए वसन्त ऋतु का, निदाघ के उत्तप्त सूर्य के सदृश प्रखर तेजस्वी क्षत्रिय बालक के लिए ग्रीष्म का और शरद् ऋतु की पोषक शक्ति के अनुरूप वैश्य पुत्र के लिये शरद् ऋतु का विधान तो शास्त्रकारों ने कर दिया किन्तु शूद्र के लिये उन्हें अनुकूल ऋतु ही नहीं मिली इसलिए उसके लिए कोई विधान नहीं किया गया। यदि आज उनका यज्ञोपवीत कियाजाय तो वह किस ऋतु में हो और क्यों ? श्री स्वामी दयानन्दजी महाराज भी—जिन्होंने शायद स्त्री शूद्रों के उपवीत के लिए प्रथम वकालत की है उनके लिए किसी ऋतु का निर्धारण नहीं कर सके हैं और संस्कार विधि में—

'ब्राह्मण पदाधिकारी बालकका वसन्त, क्षत्रिय पदाधिकारी का ग्रीष्म, और वैश्य पदाधिकारी बालक का शरद् ऋतु में यज्ञोपवीत करे।' (सं० वि० पृष्ठ ३३४)

—केवल ब्राह्मणादि तीनों वर्णों का ही यज्ञोपवीत कहकर रह गये हैं।

(२) इसी प्रकार—'अष्टमेऽब्दे ब्राह्मणम्, गर्भैकादशे राजन्यम्, गर्भाद् द्वादशे वैश्यम्' इस श्रुति द्वारा ब्राह्मणादि तीनों वर्णों की उपनयन कालिक अवस्था का विधान है, जिस पर स्वामी दयानन्द जी भी एकमत हैं। इसमें भी शूद्र बालक की अवस्था की कोई चर्चा नहीं, तब यदि उसका यज्ञोपवीत हो तो किस अवस्था में हो और उसी में क्यों ? यह प्रश्न भी असमाधेय ही है।

(३) श्रुति के आदेशानुसार उपवीत होने वाले व्यक्ति को मुण्डन कराकर गुरु के सन्मुख यज्ञवेदी पर उपस्थित होना पड़ता है जहाँ आचार्य उसे ब्रह्मसूत्र पहिनाता है। उसके पुराने वस्त्रों को उतारकर उसे कौपीन दण्ड मेखला आदि ब्रह्मचर्याश्रम के चिन्ह धारण करने को दिये जाते हैं। तब आचार्य उसे अपने सान्निध्य में ले लेता है और शास्त्रादेशानुसार ब्रह्मचर्य समाप्ति पर्यन्त उसे गुरुगृहमे रहकर विद्याध्ययन करना पड़ता है। श्रीस्वा० दयानन्द जी ने भी इसका समर्थन करते हुए लिखा है—जिस दिन उपनयन करना हो उस दिन प्रातःकाल बालक को स्नानादि कराके … आसन पर पूर्वाभिमुख बिठाये"। अब यहाँ प्रश्न होता है कि क्या श्रुति प्रतिपादित एवं स्वामी दयानन्द जी से समर्थित यह क्षौर-मुण्डनादि कन्याओं का भी कराया जायगा। वे भी कौपीन मेखला दण्ड आदि धारण कर गुरुगृह में रहेंगी या उन्हें इस नियम से मुक्त कर दिया जायगा। यदि प्रथम वस्तु हो तो वह कहाँ तक सम्भव है। यदि दूसरी रीति का अवलम्बन करें तो उसके ग्रहण करने का शास्त्रीय वचन भी तो चाहिए। कदाचित् कहा जा सकता है कि—इन अंगभूत कर्मों के अनुष्ठान किये बिना भी यज्ञोपवीत पहिनाया जा सकता है—किन्तु किसी प्रमाणभूत शास्त्रीय वचन के अभाव में ऐसी व्यवस्था जहाँ कपोलकल्पित होने के नाते अमान्य है वहाँ साथ ही कर्म-वैगुण्य सम्पादक भी हो सकती है। ऐसी दशा में किया हुआ कर्म फिर उपनयन नहीं रहा वह तो उपनयन का नाटक मात्र ही हुआ और विधिहीन होने के कारण तामस् ही कहा जायगा।

(४) लौकिक दृष्टि से देखने पर भी स्त्रियों के उपनयन और वेदाध्ययन का अनौचित्य स्पष्ट प्रतीत हो जाता है, क्योंकि स्त्री का स्त्रीत्व उन्हें प्रायः अपवित्र दशा में रहने को बाध्य करता है जिससे यज्ञोपवीत के नियमों का पालन उसके लिए कठिन बन जाता है। प्रतिमास रजस्वला होने पर, प्रसवकाल में, तथा बालकों के मलमूत्र आदि में ही स्त्री का समय व्यतीत होता है। स्त्री के जिस वक्ष स्थल पर ब्रह्मसूत्र लटकाना चाहते हैं वह तो धूलि धूसरित मलमूत्र दिग्धाङ्ग नवजात शिशु का दिन रात स्तनपान के समय क्रीड़ा स्थल बना रहेगा। क्यों न वह उस डोरी के साथ कुतूहल से कल्लोल करेगा ? तब—'यज्ञोपवीतं परमं पवित्रम्' कहाँ रहा ?

(५) प्रकृति ने स्त्री को अबला बनाया है। उसका कारण यह है, कि पिता के थोड़े शुक्र तथा माता के अधिक रज से कन्या का शरीर बनता है। शुक्र सप्तम धातु होती है और रज तृतीय। पहला सौम्य है दूसरा आग्नेय, अतः शुक्र की अपेक्षा रज सर्वदा निर्बल होता है। शुक्र से अस्थि आदि कठोर तथा शरीर को सबल बनाने वाली वस्तुएँ बनती हैं कन्या के शरीर में अस्थि आदि कठोर वस्तुओं की गौणता होती है और रजोमूलक कोमल वस्तुओं की अधिकता। अतः स्त्री प्रकृति से ही पुरुष की अपेक्षा निर्बल है। उसका शरीर अत्यन्त परिश्रम साध्य वेदाध्ययन और २५ वर्षपर्यन्त कठिन ब्रह्मचर्य के सर्वथा अनुपयुक्त है। ब्रह्मचर्य का अर्थ है-शुक्र निरोध। कन्याओं में शुक्र स्थानीय रज होता है किन्तु उसका निरोध स्त्री के वश की बात नहीं। वह तो १२ वर्ष के बाद प्रतिमास प्राकृतिक नियमानुसार अवश्य क्षरित होता है। जब वह मुख्यार्थ में ब्रह्मचारी भी नहीं हुई, ऐसी दशा में ब्रह्मचर्याश्रम मूलक उपनयन तथा वेद में भी उसका अधिकार कदापि नहीं हो सकता। रज को पुष्प कहा जाता है, उसके प्रकट होने का तात्पर्य प्रकृति के इस इंगित की ओर है कि उसे अब फलवती होना चाहिये। प्रकृति का इंगित उसके विवाह में है, १२ वर्ष के बाद विद्याध्ययनार्थ गुरुकुल भेजने से नहीं। यदि हठात् स्त्री को वेदाध्ययन में प्रवृत्त किया भी जाय तो उस परिश्रम से उसके वे शारीरिक मज्जातन्तु—जिनकी सहायता से वह सन्तान प्रसव करती है निर्बल पड़ जाते हैं, जिसका परिणाम भावी सन्तान को भुगतना पड़ता है।

स्मृतिकारों ने जैसे अन्तिम वर्ण के अधिकार में सेवा का काम सौंपा था तथा उसे वेदाध्ययन और यज्ञोपवीत रूप कठोर व्रत से मुक्त कर दिया था। वैसे ही स्त्री को भी पति, उसके परिवार एवं सन्तति की सेवा का भार सौंपकर इस कर्तव्य पालन से ही उसे यज्ञोपवीत तथा वेदाध्ययनजन्य फलप्राप्ति का अधिकार दे दिया था, इसी सेवा से वह परलोक सुधार के साथ सामाजिक सुधार भी करती थी।

(६) उदात्त अनुदात्त स्वरित आदि भेद से मन्त्रों का ठीक-ठीक उच्चारण शारीरिक तथा कण्ठ सम्पूर्णता बिना सम्भव नहीं। वेदाध्ययनाधिकार में इस तथ्य का पूर्ण ध्यान रक्खा गया है—'स्त्रीणां शूद्रान्धपङ्गूनां'—इत्यादि वचनानुसार जिनमें यह सम्पूर्णता जरा भी व्याहत दिखलाई पड़ी उन्हें वेदाधिकार से वञ्चित रखा गया है। श्रुति में उच्चारण शुद्धता का पूर्ण ध्यान रखना अत्यावश्यक है अन्यथा—'स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति' इस महाभाष्योक्ति के अनुसार उसका जरा-सा भी अशुद्ध उच्चारण लाभप्रद होने की बजाय प्रत्यवायजनक बन जाता है। असंख्य पीढ़ियों से वेदोच्चारण में अभ्यस्त द्विज बालकों के कण्ठ में जो सम्पूर्णता विद्यमान है वह शूद्र बालकों के कण्ठ में नहीं। हिन्दी पढ़े-लिखे अंग्रेज हिन्दी का पर्याप्त अभ्यास करने पर भी दन्त्य अक्षरों का उच्चारण नहीं कर पाते। उनका—'बोलते हो' के स्थान में—'बोलटे हो' उच्चारण प्रायः प्रसिद्ध है। यही बात अन्य भाषाओं के विषय में भी है। अंग्रेजी और अरबी का जितना शुद्ध निर्विकार उच्चारण एक अंग्रेज और अरब कर सकता है उतना हम लोगों से सम्भव नहीं। फलतः शूद्र बालकों में विशुद्ध और निर्विकार वेदोच्चारण की आशा करना शशशृङ्गायित है।

उच्चौ निषादगान्धारौ नीचावृषभधैवतौ।
स्वरितप्रभवाः शेषाः षड्जमध्यमपञ्चमाः॥

अर्थात्—उदात्त में निषाद गान्धार स्वर आते हैं, अनुदात्त में ऋषभ धैवत और शेष षड्ज मध्यम पञ्चम—ये तीन स्वरित के अन्तर्गत होते हैं। ऐसी दशा में कोकिलकण्ठी नारियों से ऋषभ धैवत स्वर कैसे निकलेंगे और असंस्कृत शूद्र इनका कैसे प्रयोग कर सकता है ? इसलिए दूरदर्शी महर्षियों ने उनके लिये वैदिकी व्यवस्था न कर पौराणिकी व्यवस्था ही की है, अतः यह उनकी वंचना नहीं, किन्तु महती कृपा ही समझनी चाहिए।

इस विषय पर इतना अधिक लिखा जा सकता है कि एक स्वतन्त्र ग्रन्थ तैय्यार हो जाय किन्तु विषय विस्तार भयात् हम अत्यन्त संक्षिप्त रूप से ही इस पर विचार करने के लिए विवश हैं। इस प्रकार प्रामाण्य और बुद्धिवाद द्वारा इस विषय पर विचार करने के अनन्तर हम उन प्रमाणों, नहीं नहीं प्रमाणाभासों का भी परीक्षण करना चाहते हैं जिनको वेदवेत्ता होने का झूठा दावा करने वाले आधुनिक ज्ञान-लव-दुर्विदग्ध पाश्चात्य-शिक्षा-प्रभावित भारतीय आलोचक जनता के समक्ष उपस्थित करके उसे पथभ्रष्ट करने का प्रयत्न किया करते हैं। आश्चर्य यह है कि इस प्रकार के बुद्धिवादी, प्रामाण्यवाद में कोई विश्वास न रखते हुए अपना मतलब सिद्ध करने के लिए जहाँ वेद, पुराणादि ग्रन्थों के अनेक प्रमाण उपस्थित करते हैं वहाँ उन ही प्रामाण्य ग्रन्थों को 'प्रक्षिप्त' 'बीसवीं सदी के अयोग्य' आदि-आदि अनेकों सर्टिफिकेट देने में भी देर नहीं लगाते। श्री पं० दीनानाथ जी शास्त्री के शब्दों में 'अपना पक्ष सिद्ध करने के लिए ये लोग कभी किसी अप्रसिद्ध ग्रन्थ की टीका तक भी मान लिया करते हैं तो कभी प्रसिद्ध तथा प्रामाणिक मूल ग्रन्थ को भी मानने से इन्कार कर दिया करते हैं। यदि ऋग्विधान, भूत-प्रेतादि का वर्णन कर दे तो इनके मत में वह अप्रमाण हो जाता है और यदि कहीं स्त्री को जप-विशेष लिख दे प्रमाण हो जाता है', अस्तु अब पाठक उन प्रमाणाभासों का परीक्षण करें।

प्रमाणाभास-निरास

(क) यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः।
ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय चारणाय च॥
(यजु २६।२)

(दयानन्द भाष्यानुसारी अर्थ) हे मनुष्यो ! जैसे मैं ईश्वर, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अपने स्त्री सेवकादि और उत्तम लक्षण युक्त अन्त्यजादि के लिए भी संसार में प्रकट की हुई चार वेदरूप वाणी का उपदेश करता हूँ वैसे आप लोग भी अच्छे प्रकार का उपदेश करें।

दयानन्द सरस्वती कृत उपरोक्त अर्थ को जब हम आलोचना की कसौटी पर कसते हैं तो हमें ज्ञात होता है कि या तो वे अपनी वेदानभिज्ञता के कारण इस अर्थ के करने में पर्वतायमान भूल कर गये हैं या उन्होंने वेदों का 'मुताअला' करने वाले अंग्रेजीदा बाबुओं को बहकाने के लिये जान-बूझकर अर्थ का अनर्थ कर डाला है। यह अर्थ न केवल उनके उर्वर (?) मस्तिष्क की नवीन कल्पनामात्र ही है किन्तु विरुद्धार्थता असम्भवता, पुनरुक्ति, वदतोव्याघात, आदि समस्त दोषों का एकत्र संग्रह भी इसमें बखूबी देखा जा सकता है। वेद जैसे प्रामाणिक ग्रन्थ का भाष्य करते हुए भी वे उसमें अपनी ओर से नये पद जोड़कर अर्थ विकृत करने में नहीं चूके। इस मन्त्र में 'हे मनुष्यो !' 'मैं ईश्वर' 'स्त्री सेवकादि' 'उत्तम लक्षण युक्त अन्त्यजादि' 'इस संसार में प्रकट की हुई चार वेदरूपी वाणी को' 'वैसे आप लोग भी अच्छे प्रकार उपदेश करें' यह सभी शब्द स्वामी जी के अपने ही हैं, इन अर्थों को बतलाने वाले शब्द प्रकृत मन्त्र में कोई भी नहीं है। इस विषय में सबसे मजे की बात यह है कि स्त्री शूद्रों के वेदाध्ययन के समर्थन में उपस्थित किया जाने वाला यह मन्त्र आधा है। पूरा मन्त्र उपस्थित करने पर कहीं इस अर्थ की कलई न खुल जाय इसलिए इसे इतना ही उपस्थित किया जाया करता है। पूरा मन्त्र इस प्रकार है—

यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च। प्रियो देवानां दक्षिणायै दातुरिह भूयासम्। अयं मे कामः समृध्यताम्। उपमा अदो नमतु। (यजु २६।२)

पूरे मन्त्र का अनुशीलन करने पर पता चलता है कि न तो इस मन्त्र का वक्ता ईश्वर है और नाही इसमें सबको वेद का समान अधिकार देने की गन्ध ही। किसी मन्त्र के वास्तविक अर्थ को समझने की कसौटी है, उस मन्त्र के ऋषि देवता और विनियोग का ज्ञान। इन तीनों वस्तुओं को जाने बिना मन्त्र का वास्तविक अर्थ नहीं जाना जा सकता। प्रकृत मन्त्र का देवतादि निर्णय करते हुए स्वामीजीने अपने भाष्य में लिखा है—'यथेमा इत्यस्य लौगाक्षी ऋषि ईश्वरो देवता।' इससे हमें पता चला कि इस मन्त्र का साक्षात्कार करने वाला ऋषि लौगाक्षी है और देवता ईश्वर। देवता का क्या अर्थ होता है यह भी समझ लेना चाहिये। "या उच्यते सा देवता" या "यत्काम ऋषिर्यस्यां देवतायामार्थपत्यमिच्छन् स्तुतिं प्रयुङ्क्ते तद्दैवतः स मन्त्रो भवति"—इस निरुक्त वचनानुसार वेद मन्त्र में प्रतिपाद्य विषय अथवा स्तोतव्य या सम्बोध्यमान देव का नाम ही देवता होगा। जो प्रतिपादक अथवा सम्बोधयिता होगा वह ऋषि होगा। सीधे शब्दों में वर्णन करने वाला ऋषि और जिसका वर्णन हो वह देवता।

जब 'यथेमां' मन्त्र का देवता 'ईश्वर' है तो वह प्रतिपाद्य होगा प्रतिपादक नहीं, ऋषि से स्तोतव्य होगा स्वयं स्तोता नहीं, ऋषि द्वारा उक्त होगा स्वयं वक्ता नहीं। जब वह वक्ता नहीं तब—'मनुष्यो ! जैसे मैं ईश्वर…' इत्यादि स्वामी दयानन्द कृत अर्थ कैसे संघटित हुआ। ऐसा अर्थ करने से तो ईश्वर इस मन्त्र का वक्ता अर्थात् ऋषि बन गया, देवता कहाँ रहा ? और फिर मन्त्र के उत्तरार्ध में विद्यमान—'प्रियो देवानां भूयासम्'—देवताओं का प्यारा बनूं, 'अयं मे कामः समृध्यताम्'—यह मेरी कामना पूरी हो, 'माम् अद उपनमतु'—वह फल मुझे प्राप्त हो यह सब कामनाएं क्या आप्तकाम ईश्वर करता है ? और किस के प्रति ? कितना आश्चर्य है कि यह मामूली बात भी स्वामीजी और उनके अनुयायियों की विशाल बुद्धि में न समा सकी।

इस बात का स्पष्टीकरण इससे अगले मन्त्र से और भी अच्छी तरह हो जाता है। 'यथेमां वाचं' यह यजु के २६वें अध्याय का दूसरा मन्त्र है। इससे अगला मन्त्र है-'बृहस्पते अतियदर्यो … तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्' (यजुः २६।३) इस मन्त्र का भी देवता स्वामीजी ने ईश्वर को ही माना है। इसलिए दोनों मन्त्रों से समान रूप से या तो ईश्वर वाच्य होना चाहिए या वक्ता। यह कदापि सम्भव नहीं, कि एक मन्त्र में तो ईश्वर स्वयं वक्ता हो और अगले में वर्ण्य या स्तुत्य हो। इस मन्त्र में स्पष्ट ही ईश्वर से ऋषि प्रार्थना कर रहा है कि 'हे बृहस्पते मुझे धन दे।' क्या कोई इसका यह अर्थ करने का साहस कर सकता है कि 'हे बृहस्पति ! मैं ईश्वर तुझ से धन की याचना करता हूँ'—जैसा कि पूर्व मन्त्र में किया है।

तात्पर्य यह है कि 'यथेमां वाचं' मन्त्र के वक्ता चूंकि स्वामी जी के मतानुसार लौगाक्षी ऋषि हैं इसलिए इस मन्त्र में पठित आवदानि=कहूँ-क्रिया के कर्ता भी वही हैं। इस 'आवदानि' क्रिया का कर्म 'वाचं=वाणी' है। फलतः वह लौगाक्षी कर्तृक वाणी हुई न कि ईश्वर कर्तृक चारों वेद रूपी वाणी। जब इस मन्त्र में वेद रूपी वाणी की चर्चा ही नहीं रही तब इससे सबको वेदाधिकार मिलने का स्वप्न देखना कितना अविचारपूर्ण है, इसे सहज ही समझा जा सकता है। इस मन्त्र का अर्थ करने की धुन में स्वामीजी ऐसे भूले हैं कि उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि वे तो ईश्वर को निराकार मानते हैं फिर उसके स्त्री सेवक नौकर चाकर आदि कहाँ से आयेंगे जो कि इस मन्त्र के भाष्य में उन्होंने लिख मारे हैं।

संक्षेप में—यह मन्त्र न ईश्वर प्रोक्त है और न सबके लिए वेदाध्ययन का ज्ञापक ही। वेद वाणी का तो यहां कोई प्रसंग ही नहीं, न ही अधिकारी अनधिकारी चर्चा का यह स्थल है क्योंकि ग्रन्थ के मध्य में इस चर्चा का क्या प्रसंग ? यहां तो ऋषि की ओर से परमात्मा के प्रति प्रार्थना की गई है कि जिस प्रकार मैं 'दीयताम्, भुज्यताम्' यह जनहितकारिणी वाणी, ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य, शूद्र आदि को कहूं अर्थात्—'लीजिये खाइए' आदि कहने के योग्य बन सकूं (ऐसी आप कृपा करें)। आशा है इन कतिपय पंक्तियों से इस मन्त्र से वेदाधिकार सिद्ध करने वालों का समाधान हो जायेगा।

(२)-(क) यज्ञं दधे सरस्वती।

(ख) सरस्वतीं देवयन्तो हवन्ते सरस्वतीमध्वरे तायमाने।
सरस्वतीं सुकृतोऽह्वयन्त सरस्वती दाशुषे वीर्यं धात्॥
(ऋग् १०।१७।७)

उपरोक्त दोनों मन्त्रों में पठित सरस्वती शब्द का अर्थ सामान्य मानुषी स्त्री करके इस मन्त्र से उन्हें यज्ञ में बुलाना सिद्ध की जाने की चेष्टा की जाती है किन्तु यहां पठित सरस्वती शब्द 'वागधिष्ठात्री' देवता का अपर पर्याय है और उनका ही आवाहन विवक्षित है, मानुषी स्त्री का नहीं। वही यजमान के लिए वीर्य=पराक्रम देने वाली है।

३—तं पत्नीभिरनुगच्छेम देवाः पुत्रैर्भ्रात्रैरुत वा हिरण्यैः।

इस मन्त्र में पत्नी के साथ यज्ञ में जाने का विधान किया गया है जो सर्वथैव मान्य है। अवश्य ही उसे साथ लेकर यज्ञ करना चाहिए किन्तु इसमें वेदाध्ययन का तो कोई प्रसंग ही नहीं। मन्त्र में तो सोना पासे आदि भी पठित हैं क्या वे भी वेद पढ़ते हैं।

४—अयज्ञो वा एष योऽपत्नीकः

का समाधान भी पूर्ववत् है और सनातन धर्म की दृष्टि से पत्नीशून्य यज्ञ अयज्ञ ही है। तभी श्री रामचन्द्र जी ने स्वर्ण की प्रतिमा सीता को पत्नी की प्रतिनिधि बनाकर यज्ञ को पूरा किया था।

५—प्रावृतां यज्ञोपवीतिनीम्
(गोभिल २।१।१)

कहा जाता है गोभिल के इस सूत्र में स्त्री को यज्ञोपवीत वाली बताया गया है जिससे उसका यज्ञोपवीत सिद्ध होता है, किन्तु वस्तुतः इसका अर्थ है 'वस्त्र को यज्ञोपवीतकी भांति पहिनी हुई।' यह विवाह का प्रसंग है। वर ने कन्या को एक वस्त्र दिया है जिसे उसे यज्ञोपवीत की तरह डाल लेना चाहिए। तभी श्री स्वामीजी ने इस की व्याख्या में लिखा है—'ॐ या अकृतन् अवयत्' इस मन्त्र को बोलकर वधू को वर उपवस्त्र देवे, वह (वधू) उस वस्त्र को यज्ञोपवीतवत् धारण करे।' यहां वास्तविक यज्ञोपवीत की कोई कथा नहीं है।

६—निर्मन्त्रास्तु क्रियाः सर्वा विवाहस्तु समन्त्रकः।
(मनु)

कहा जाता है इस श्लोकमे स्त्रियों के विवाह के समय मन्त्र पाठ पूर्वक संस्कृत होने का विधान है। वादी के इस कथन से हम सहमत हैं परन्तु कतिपय मन्त्र विशेष के बोल लेने मात्र से उसे सम्पूर्ण वेद का अधिकारी समझ लेना भूल है। इस प्रकार के मन्त्र तो यज्ञोपवीत हुए बिना यदि किसी बालक का पिता मर जाय तो उससे भी प्रेत कर्म में बुलवाने का विधान है। क्या एतावता यह मान लें कि यज्ञोपवीत के बिना भी वेद पढ़ा जा सकता है ?

७—स होत्रं स्म पुरा नारी समनं वावगच्छति।

कहा जाता है इस मन्त्र में स्त्रियों को पुरुषों के समान यज्ञ में जाने का विधान किया गया है, परन्तु वास्तव में यह मन्त्र इन्द्राणी के विषय में है। नारी का अर्थ यहां इन्द्राणी से ही है, यह बात इसके उत्तरार्ध को पढ़ने से स्पष्ट हो जाती है, यथा—'वेधा ऋतस्य वीरिणी इन्द्रपत्नी महीयते विश्वस्माद् इन्द्र उत्तरः' स्पष्ट ही इस मन्त्र में इन्द्र और उसकी पत्नी का वर्णन है।

८—अधः पश्यस्व मोपरि संतरां पादकौ हर।
आनेकशप्लकौ दृशन् स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ॥
(ऋ० ८।३३।१९)

तथाकथित सुधारक अर्थ—जो स्त्रियां विद्याभ्यास करके उद्धृत नहीं होतीं जो अपने घुटने को ढककर चलती हैं और अपने पैर ऊंचा नीचा देखकर रखती हैं… वे योग्य आचरण वाली ब्रह्मा तक बन सकती हैं' यह अर्थ कितना संगत है इसे साधारण लघुकौमुदी पढ़ा लिखा छात्र भी समझ सकता है। 'पश्यस्व' का अर्थ 'देखती है' किस व्याकरण के अनुसार शुद्ध हो सकता है यह वे ही जानें। यह अर्थ कपोल कल्पित है और 'तरुतारम्' से तार विद्या सिद्ध करने के समान है। इसका वास्तविक अर्थ है—'तू नीचे देख, ऊपर न देख, पैरों को ठीक रख, तेरे अंग न दीखें, आत्मा ही तुझ में स्त्री रूप में प्रकट हुआ है।' यह स्त्री को शिक्षा दी जा रही है न कि उसे ब्रह्मा बनाया जा रहा है।

९—भीमा जाया ब्राह्मणस्योपनीता
(ऋ० १०।१०९।४)

यहां जाया और उपनीता इन दो शब्दों को देख लोग भ्रम में पड़ जाते हैं, वे नहीं सोचते कि यहां जाया शब्द के साथ 'भीमा' अर्थात् भयङ्कर विशेषण भी तो है उसकी क्या संगति होगी ? 'यज्ञोपवीत धारण करके ब्राह्मण की पत्नी भयङ्कर सबला बन जाती है' इस अनर्थ से तो उपवीत बड़ी विचित्र वस्तु ठहरी जिसे धारण करते ही सौम्य भी पत्नी भयंकर बन गई और परमात्मा का शुकर करो कि यह तो ब्राह्मण की पत्नी थी जो उपवीत की करामात से भयंकर ही बनकर रह गई, यदि क्षत्रिय और वैश्य की होती तो शायद राक्षसी बन जाती ! बलिहारी ऐसे अर्थ की !!

१०—ततः शैलवरः सोऽपि प्रीत्या दुर्गोपवीतकम्।
कारयामास सोत्साहं वेदमन्त्रैः शिवस्य च॥
(शि० पु०)

कहा जाता कि यह श्लोक प्रमाणित करता है कि शिव और पार्वती का यज्ञोपवीत हुआ था।

यह श्लोक पार्वती के विवाह प्रसंग का है तो क्या उनका विवाह में यज्ञोपवीत हुआ था। यज्ञोपवीत विवाह में हुआ करता है या ब्रह्मचर्याश्रम में ? यदि विवाह में, तो वह स्त्री घरके काम करेगी या गुरुकुल में पढ़ेगी ? इसलिए यह समझ लेना चाहिए कि दुर्गोपवीत नामक एक कर्म विशेष है जो शिव का हुआ था पार्वती का नहीं।

११—यज्ञोपवीतमार्गेण छिन्ना तेन तपस्विनी।
सा पृथिव्यां पृथुश्रोणी पपात प्रियदर्शिनी॥
(वा० रा० ६।८१)

वाल्मीकि रामायण के उपर्युक्त श्लोक में श्री रामचन्द्र जी के सामने रावण द्वारा मायामयी सीता का वध करने का उल्लेख है। वादीका कथन है 'उस समय सीता को यज्ञोपवीत के समीपसे काट दिया' किन्तु वास्तव में सीता के गले में यज्ञोपवीत की कोई चर्चा नहीं। इसका तात्पर्य है कि मायावी रावण ने सीता के शरीर को बायें कंधे से लेकर दाहिनी कोख तक अर्थात् जैसे यज्ञोपवीत पहिना जाता है उस ढंग से अपने खड्ग से दो टुकड़े कर दिया। यहां सीताके सूत्रमय यज्ञोपवीत आदि का कोई प्रसंग नहीं।

१२—सन्ध्याकालमनाः श्यामा ध्रुवमेष्यति जानकी।
नदीं चेमां शुभजलां सन्ध्यार्थे वरवर्णिनी॥
(वा० रा०)

इस श्लोक की व्याख्या करते हुए सभी टीकाकारों ने सीता को सन्ध्याकाल के समय किए जाने वाले कृत्य—स्नान भगवद्ध्यान आदि के लिए ही उस सुन्दर नदी पर आने की सम्भावना परक अर्थ किया है। यह प्रातःकाल के समय की बात है। सीतान्वेषण रत हनुमान जी सुन्दर जलवाली नदी को देखकर विचार कर रहे हैं, कि अगर सीता लंका में है तो अवश्य ही स्नानादिके लिए इस सरिता पर आएगी ही। सन्ध्या शब्द यौगिक है जिस का सीधा अर्थ है भगवान् की सम्यक् प्रकार से ध्यान करने की कोई भी पद्धति। सो इससे सीता का वेदाध्ययन कैसे सिद्ध किया जा सकता है ?

१३—अग्निं जुहोतिस्म तदा मन्त्रवत्कृतमङ्गला।
(वा० रा०)

इस श्लोक में 'जुहोतिस्म-हवन करती थी' इस पद को देखकर कुछ लोगों में बड़ा भ्रम हो जाता है। श्री वाल्मीकि जी महाराज ने मूलमे ही इस भ्रमका निराकरण कर दिया है जिसका ज्ञान पूर्वापर प्रसंग देखने से भली भांति हो जाता है। यह प्रसंग श्री रामचन्द्रजी के राज्याभिषेक समारम्भ समय का है जिसकी निर्विघ्न परिसमाप्ति के लिए कौशल्या ने ऋत्विजों को बुलाकर हवन कराया। इस श्लोक में कहा गया है कि 'जब श्री रामचन्द्रजी माता के पास पहुँचे तो उन्होंने उसे हवन करवाती हुई देखा' जैसा कि अगले श्लोक के 'हावयन्तीं हुताशनम्' से महर्षि ने स्पष्ट कर दिया है। प्रकृत श्लोक में भी अन्तर्भावितण्यर्थ 'हु' धातु का प्रयोग समझना चाहिए तब भ्रम का कोई कारण नहीं रह जाता।

१४—कुछ लोग गार्गी मैत्रेयी आदि ब्रह्मवादिनी एवं वेदों का साक्षात्कार करने वाली ऋषिकाओं के उदाहरण देकर अपने इस पक्ष की पुष्टि करना चाहा करते हैं किन्तु इस प्रकार के अपवादों से सामान्य नियम का सर्वथा विनाश नहीं हो सकता। अपनी पूर्वजन्मोपार्जित अलौकिक प्रतिभा एवं मेधा के कारण यदि किन्हीं स्त्रियों के हृदय में वेद का साक्षात्कार होगया हो तो एतावता क्या उनका गुरु सम्प्रदाय द्वारा विधिवत् वेदपाठ स्वीकार कर लिया जाय ? जहां तक मन्त्र साक्षात्कार का प्रश्न है तो अनेकों ऋचाओं का साक्षात्कार कबूतर कुत्ती आदि को भी हुआ है। वेदमे 'कपोत सूक्त' 'सरमा सूक्त' आदि ऐसे ही सूक्त हैं, क्या इनसे हम समझलें कि कबूतर और देवताओं की कुत्ती 'सरमा' ने गुरु चरणों में विधिवत् बैठकर वेद का स्वाध्याय किया था ऐसा कहना महाभूल होगी। यह तो पूर्वजन्मार्जित अलौकिक मेधा के परिस्फुरण का ही प्रभाव था कि उनके हृदय में भी मन्त्रों का साक्षात्कार हो सका। यह सर्वत्र सम्भव नहीं, इसलिए ऐसे उदाहरणों द्वारा स्त्री सामान्य को वेदाधिकारिणी ठहरा देना कहां तक संगत है इसे पाठक सहज ही समझ सकते हैं।

इस प्रकार हम यज्ञोपवीत तथा वेदाध्ययन के विषय में सांगोपांग विवेचन करने के अनन्तर इस प्रकरण को यहीं समाप्त करते हैं।