वैदिक-स्वरूप

युवा सुवासाः परिवीत आगात्स उ श्रेयान् भवति जायमानः।
तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो मनसा देवयन्तः॥
(ऋ० ३।८।४)

जब पुरुष यज्ञोपवीत के अनन्तर पूर्ण ब्रह्मचर्य से युक्त होकर युवावस्था प्राप्त कर (समावर्तित हो जाने पर) सुन्दर वस्त्र धारण कर के गृहस्थाश्रम में आता है इस नवजन्म को प्राप्त करके वह कल्याणयुक्त हो जाता है और धैर्यशाली विद्वान् पुरुष उसे उन्नति की ओर ले जाते हैं।

गुरुगृह या शिक्षालय में रहते हुए यथाविधि पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करके शिक्षा सम्पूर्ण कर लेने पर शास्त्रकारों ने समावर्तन संस्कार का विधान किया है। यह आज भी किसी न किसी रूप में प्रचलित है जिसे कन्वोकेशन (Convocation) या दीक्षान्त समारोह के नाम से स्मरण किया जाता है, किन्तु इसके वैदिक और वर्तमान-कालिक रूप में आकाश पाताल का अन्तर है। आज इस अवसर पर दिये जाने वाले भाषणोंमें स्नातक युवकों के लिए न तो कोई संयमित जीवन की शिक्षा न आदर्श-जीवन का कोई चित्रण ही ! यही कारण है कि आधुनिक शिक्षणालयों—जिन्हें दूसरे शब्दों में विलासिता तथा व्यसनों का केन्द्र भी कहा जा सकता है—से निकलने वाला साक्षरवर्ग अपने चरित्र-दौर्बल्यके लिए काफी बदनाम है। आधुनिक शिक्षाके ये केन्द्र चरित्रगठन ब्रह्मचर्य आदि की शिक्षा के सर्वथा अभाव के कारण देश के लिए बलशाली नागरिक उत्पन्न करने में सर्वथा अक्षम हैं। इनसे निकलने वाले अधिकांश युवक युवावस्था में ही जर्जर तथा अस्थि पंजर मात्रावशिष्ट देह यष्टि को पतलून और कोट के आवरण में छिपाए देश में क्षयवृद्धि के कारण बन रहे हैं।

गम्भीर दृष्टि से देखा जाय तो क्षय का मूल कारण संस्कार परम्पराओं के लुप्त होने में ही है। ब्रह्मचर्य एवं तपोबल सम्पन्न महर्षियों के आश्रमों का स्थान आज स्कूल और कालेजों ने लिया हुआ है। इनमें शिक्षा देने वाले रसिक एवं सहृदय अध्यापक तथा प्रोफेसर महानुभाव ही जब स्वयं विषय वासनाओंके दास होते हैं और सिनेमा नाच गाने आदि मनोरंजक अवसरों पर बढ़ चढ़ कर अपनी रसिकता का परिचय देते हैं तब उनके शिष्यों में ब्रह्मचर्य की भावना के स्वप्न देखना निरी मूर्खता ही तो है। फलतः स्कूल एवं कालेजों के विषाक्त वातावरण में पले हुए वे युवक जब शिक्षा समाप्त कर बाहर आते हैं तब अबाधगति से विषय भोग में प्रवृत्त होकर क्षय को निमन्त्रण देते हैं। पुरातनकाल में समावर्तन संस्कार के अवसर पर जहां स्नातक को एक सभ्य नागरिक बनने के लिए उपयुक्त शिक्षायें दी जाती थीं वहां 'प्रजायै गृहमेधिनाम्' का अनुपम आदर्श उसके सामने रखकर उसे गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट होने की अनुमति देते हुए भी संयम का पुनीत पाठ सिखाया जाता था।

इस संस्कार के अवसर पर निम्नलिखित क्रियाओं का विधान शास्त्रकारों ने किया है यथा—गृहयज्ञ, ८ घटों द्वारा दीक्षान्तस्नान, वस्त्रालंकार धारण एवं दीक्षान्त उपदेश, यह सभी क्रियाएं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परिपूर्ण हैं और अत्यन्त महत्वशाली हैं।

ग्रह पूजनादि के विषय में हम पिछले अध्यायोंमें पर्याप्त वर्णन कर आए हैं और बतला आए हैं कि हमारे इस मानव जगत् से दूर रहते हुए भी सूर्य चन्द्रादि ग्रह किस प्रकार इस पर अपना प्रभाव डालते हैं आदि २।

आठ घटों द्वारा जलाभिषेक—

आठ घटों द्वारा जलाभिषेक इस संस्कार का मुख्य अंग है। यह आठों घट पूर्वादि आठों दिशाओं में क्रम से रख दिये जाते हैं और अभिमन्त्रित जल से समावर्तन कराने वाले ब्रह्मचारी को स्नान करना पड़ता है। वेदमन्त्रों से अभिमन्त्रित यह जल आध्यात्मिक शक्ति से पूरित होने के कारण स्नातक को शक्ति-सम्पन्न तो बनाता ही है साथ ही उसको भावि गृहस्थ जीवन में भी उन आठ मैथुनों से सावधान रहने की प्रेरणा देता है जो (अष्ट मैथुन) ब्रह्मचर्याश्रम में उसके लिए सर्वथा त्याज्य थे। यद्यपि इस अवसर पर स्नातक, अपनी ब्रह्मचर्यावस्था के सम्पूर्ण कठोर नियमों को समाप्त कर गृहस्थ में प्रवेश का अधिकारी बन रहा होता है, कोट कमीज, जूता, छतरी, अलंकार, सुगन्धित तैल पुष्पमाला आदि वे सभी वस्तुयें जो उसके लिए अभी तक सर्वथा त्याज्य थीं स्वयं गुरु द्वारा उसे धारण करवाई जा रही हैं किन्तु एतावता यह न समझ लेना चाहिये कि अब उसे सब बातों की खुली छुट्टी दी जारही है कि वह चाहे कुछ करे और अपने उस जीवन को 'सद्गृहस्थ' बनाने में लगाने की बजाय विषय-लम्पट और आवारा बनाने में लगादे। गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने पर भी उसे पर-स्त्री ध्यान, कथा, स्पर्श, क्रीड़ा, दर्शन आलिंगन, एकान्त वास और समागम रूप आठ मैथुनों से सर्वदा इसी प्रकार बचना चाहिए, जैसे कि वह ब्रह्मचर्यावस्था में बचता रहा है। इस महत्वपूर्ण शिक्षा को हृदयगम्य कराने के लिए ही शास्त्र ने ८ घटों के जल से स्नान करने का विधान किया है जिससे ८ की संख्या हृदय में सर्वदा स्मरण रहे और युवकवर्ग उससे बचता हुआ अपने गृहस्थ को सुखमय बना सके।

इस महत्त्वपूर्ण शिक्षा से बेखबर रह जाने के कारण आधुनिक युवकों का गृहस्थ जीवन दुःखमय बन जाता है। विवाह के बाद घर में आनेवाली भोली भाली पत्नी को जब मालूम पड़ता है कि पतिदेव को तो कालेज की जिन्दगी से ही 'ताक-झांक' का चस्का है और उसके घर में होने पर भी न जाने किसके विरह के गीत गुनगुनाते रहते हैं तो उसके हृदय पर वज्रपात हो जाता है। इससे ऊपर की यदि किसी घटना का उसे भान हो जाय तो फिर उसका हृदय इस गृहस्थी से फट जाता है घर में क्लेश रहने लगता है और अन्त में 'तू तू मैं मैं' होने के बाद तलाक की नौबत आती है।

इस शिक्षा पर समुचित ध्यान न देने का दूसरा परिणाम यह होता है कि स्त्रियों के निरन्तर चिन्तन कथा सम्भाषण दर्शनादि विकारों से युवकवर्ग का चारित्रिक पतन हो जाता है और वह तरह २ की बीमारियों का ग्रास बन जाता है इसलिए इस आठ की संख्या पर सर्वदा ध्यान रहे यही इस क्रिया का उद्देश्य है।

वस्त्रालङ्कार-धारण

मानव जीवन में वस्त्र अलङ्कारादि का उत्कृष्ट स्थान है। गर्मी वर्षा आदि से शरीर को बचाकर यह उसके विकास में ही सहायक नहीं होते अपितु उसके सौन्दर्य की अभिवृद्धि में भी सहायक सिद्ध होते हैं। उत्तम-वस्त्र उत्तम जीवन स्तर के सूचक समझे जाते हैं और उनमें मनुष्य के विचारों, उसकी आर्थिक स्थिति आदि की पर्याप्त झलक देखने को मिल जाती है यह सुन्दर भाव किसी कवि ने—

'वासः प्रधानं खलु योग्यतायाः'

आदि प्रसिद्ध पद्य में व्यक्त किया है कि वस्त्रों से मनुष्य की परिस्थिति तथा योग्यता को पहिचाना जाता है और उसी से मनुष्य का आदर होता है। समुद्रने भगवान् विष्णु को तो सुन्दर पीताम्बरधारी देखकर अपनी पुत्री लक्ष्मी समर्पित की और भगवान् शंकर को दिगम्बरत्व (वस्त्ररहित) के कारण हलाहल विष !

उपरोक्त सूक्ति में कवि ने उत्प्रेक्षा द्वारा वस्त्रालंकारादि के महत्त्व पर पर्याप्त प्रकाश डाल दिया है। ब्रह्मचर्यावस्था के दश बारह वर्षों में स्नातक को धोती कौपीन गाती आदि साधारण वस्त्रों में ही रखा गया है। पुष्पमाला, अलंकार, तेल, साबुन, अंजन, दर्पण आदि वस्तुओं से उसका सख्त परहेज था। बारह वर्ष के दीर्घकालिक अभ्यासवश यदि स्नातक इन वस्तुओं के प्रति उपेक्षा तथा अरुचि का भाव रखने लग जाए तो यह कोई आश्चर्य नहीं होगा। किन्तु जिस जीवन में अब वह पदार्पण कर रहा है उस जीवन में ये वस्तुएँ उसके लिए हेय नहीं किन्तु ग्राह्य हैं। इनके बिना एक सीमा तक अब वह अपने समस्तर समाज में आदर का अधिकारी नहीं बन सकता, साथ ही उनके प्रयोग से होने वाले लाभ से वंचित रहकर वह अपने शरीर की सुरक्षा को भी खतरे में डाल देता है इसलिए उस संस्कार के अवसर पर आचार्य स्नातक को विधिवत् मन्त्र पाठपूर्वक वस्त्रादि धारण करवा मानो अपने शिष्य को भावि गार्हस्थ्य जीवन में इन वस्तुओं के प्रति अरुचि न रखने की शिक्षा दे रहा है।

इस अवसर पर पढ़े जाने वाले सभी मन्त्रों में अमुक अमुक वस्तुओं के गुणों का पर्याप्त वर्णन मिलता है जिससे उनके महत्त्व को भली प्रकार समझा जा सके।

दीक्षान्त उपदेश—

यों तो आचार्य निरन्तर ही शिष्य को उपदेश देते रहे हैं किन्तु इस अवसर का उनका उपदेश अत्यधिक महत्वपूर्ण और गम्भीर है। उनके एक एक वाक्य में समस्त जीवन के अनुभव का निचोड़ निहित है और उनके द्वारा दिया गया उपदेश चाहे हमें साधारण सी बातें मालूम पड़ें किन्तु इन साधारण सी शिक्षाओं में मनुष्य जीवन को बनाने और बिगाड़ने की अतुल शक्ति विद्यमान है। आचार्य का यह सदुपदेश जो कि शिक्षा के रूप में शायद अन्तिम बार दिया जा रहा है केवल इसी अभिप्राय से दिया जाता है कि स्नातक के हृदय में सर्वदा स्मरण रहे और जीवन में वह उसका उपयोग करे।

हम ग्रन्थ विस्तार भयात् इस उपदेश को उद्धृत करना उचित नहीं समझते, पाठक संस्कार पद्धतियों में इसे देख सकते हैं।