विवाह विधि पर विचार करते हुए भगवान् मनु ने भिन्न २ जातियों एवं देशों में होने वाले विवाहों को अष्टविध विवाहों के अन्तर्गत परिगणित किया है। उनके नाम क्रम से ये हैं—

ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः।
गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः॥
(मनु ३।२१)

अर्थात्—ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच ये आठ प्रकार के विवाह हैं।

उपरोक्त आठों विवाहों में ब्राह्मादि पहिले चार विवाह—जिनमें कि सदाचारी गुणसम्पन्न वर को आदरपूर्वक बुलाकर गृहस्थ-धर्म पालन के लिए कन्या प्रदान की जाती है—श्रेष्ठ माने गए हैं। इसके अतिरिक्त आसुर आदि चार विवाह सर्वथा लोकनिन्दित और निकृष्ट ही हैं।

खेद का विषय है, कि भारतेतर अन्य देशों की भांति आज भारत में भी असुरादि अन्तिम चार प्रकार के विवाहों का प्रचार दिनानुदिन बढ़ता जा रहा है। मनु के—

ज्ञातिभ्यो द्रविणं दत्वा कन्यायै चैव शक्तितः।
कन्याप्रदानं स्वाच्छन्द्यादासुरो धर्म उच्यते॥

—के अनुसार पंजाबादि कुछ प्रान्तों में जहां एक ओर वर पक्ष वालों से हजारों रुपयों की रकम ऐंठकर—'कन्या विक्रय' द्वारा इस आसुर विवाह को पर्याप्त प्रोत्साहन मिल रहा है, वहां बंगाल बिहार आदि दूसरे प्रान्तों में टीके और दहेज के रूप में अच्छीखासी रकम कन्यापक्ष वालों से ऐंठने का उद्योग करके 'पुत्र-विक्रय' की एक नई सामाजिक कुप्रथा को पनपने दिया जा रहा है। यह बुराई धीरे २ सम्पूर्ण देश में फैल रही है। और अन्य स्थानों पर भी लोग देखा देखी ऐसा करने लगे हैं। परिणाम स्पष्ट है, आये दिन न जाने कितनी मूक कन्याएं इस टीके और दहेज की वेदी पर बलि हो जाती हैं। इस सौदेबाजी का दूसरा परिणाम यह है कि एक ओर योग्य किन्तु गरीब युवक पांच हजार की रकम न होने के कारण सुशिक्षित और सभ्य पत्नी नहीं प्राप्त कर पाते, दूसरी ओर सुशिक्षित कुलीन एवं गुण सम्पन्न कन्याएं भी पांच हजार की रकम का टीका न दे सकने के कारण अयोग्य पात्रों को सौंप दी जाती हैं, जहां वे जीवन्मृत दशा में चार २ आंसू रो रोकर इस आसुरी सामाजिक कुप्रथा के कारण हिन्दू समाज को कोसती हुई अपना जीवन पूरा करती हैं। आज के समय की सबसे बड़ी पुकार है, कि, न केवल भारतमें ही किन्तु सम्पूर्ण संसार में ही ब्राह्म विवाह का प्रचलन होना चाहिए जिसके लिए मनु के अनुसार न किसी विशेष रुपए पैसे की आवश्यकता है, न किसी अन्य आडम्बर की। चाहिए केवल एक विशुद्ध खद्दर का वस्त्र, तथा वन से अनायास ही प्राप्त हो सकने वाली पुष्प जल गन्ध आदि पूजन सामग्री। वर को मांगलिक वस्त्र पहिनाकर उसका विधिवत् पूजन सम्मान हो और उसे कन्यादान दे दिया जाए। यथा—

आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतिशीलवते स्वयम्।
आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्मः प्रकीर्तितः॥
(मनु०)

यह है भारतीय विवाह का आदर्श और एक ऐसी प्रणाली जिसे अमीर और गरीब सब भली प्रकार निभा सकते हैं।