आधुनिक काल में प्रेम विवाह (Love Marriage) या मनु के शब्दों में 'गन्धर्व विवाह' का वर्णन किए बिना यह प्रकरण अधूरा ही समझा जाएगा। आज सम्पूर्ण नवशिक्षित समाज में यही 'गन्धर्व विवाह' लोकप्रियता को प्राप्त हो रहा है। अनेक प्रकार के उपन्यास कथा कहानी तथा ९० प्रतिशत चलचित्रों (Films) द्वारा इसकी महत्ता प्रदर्शित की जारही है और जनता को यह समझाने की कोशिश की जा रही है कि उचित या अनुचित किसी भी रीति से यदि किन्हीं स्त्री पुरुषों का आपस में प्रेम—वासनामय आसक्ति, हो जाय तो उनका परस्पर विवाह सम्बन्ध न होने देना सामाजिक अत्याचार है। इस आशय को प्रकट करने के लिए अनेक प्रकार की काल्पनिक रोमाञ्चकारी कथाओं द्वारा इस प्रेम विवाह का समर्थन किया जाता है। यही नहीं किन्तु आजके पढ़े लिखे लोगों की धारणा हो चली है कि विवाह से पूर्व ही भावी दम्पतियों का आपस प्रेम सम्बन्ध होना आवश्यक है और तभी उनका विवाह होना चाहिए जब वे एक दूसरे को प्रेम करने लगें। संक्षेप में आज के जड़ जगत् का यह वैवाहिक सूत्र बन गया है, 'चूंकि अमुक का अमुक से प्रेम होगया है फिर चाहे वह वासनामय और क्षणिक ही क्यों न हो—अतः उन दोनों का विवाह हो जाना चाहिए।' परन्तु आध्यात्म-प्रधान आर्य जाति का वैवाहिक सूत्र सदा से यह चलता आ रहा है—'क्योंकि अमुक कन्या का अमुक वर के साथ अनुभवी अभिभावकों की अनुमति से विवाह संबन्ध स्थिर हो गया है अतः अब इन दोनों को जीवन भर एक दूसरे से स्थायी प्रेम करना चाहिए।' संक्षेपतः विदेशी जिसे चाहते हैं उसे ब्याहते हैं जबकि भारतीय जिसे ब्याहते हैं उसे चाहते हैं।

'जहां प्रेम-वहां विवाह' धारणा नितान्त भ्रमपूर्ण है और बाह्य सौन्दर्य पर आश्रित होने के कारण स्थायी भी नहीं है। क्षणिक शारीरिक सौंदर्य या इसी प्रकार के अन्य गुणों की नींव पर खड़ा होने वाला यह गार्हस्थ्य रूपी प्रासाद स्थायी नहीं हो सकता। तथा परिस्थिति-वशात् उत्पन्न होनेवाला एक हल्का सा परिवर्तन ही इसे धूलिसात् करने के लिए बस है। जिन विदेशों के अन्धाधुन्ध अनुकरण पर आज प्रेम विवाह, उन्मुक्त प्रेम आदि समाज विरोधी-तत्त्वोंका प्रसार हो रहा है इनके कारण उन देशों का गृहस्थ जीवन कितना कष्टमय बन गया है इसे हम देखकर भी नहीं देख पाते। इस प्रकार के संयम तथा आदर्शहीन क्षणिक प्रेम सम्बन्धों ने वहां विवाहको एक खेल बना दिया है—गुड्डा गुड़िया का खेल, जो आज है कल नहीं। पतिदेव को बाहर काम पर जाने पर हर घड़ी यह सन्देह बना ही रहता है कि दफ्तर से लौटने पर बीवी मिलेगी भी या नहीं। इस प्रेमविवाह या उन्मुक्त प्रेम से जो भयङ्कर परिणाम निकलते हैं और समाज में जिस अव्यवस्था का प्रसार होता है उसका अनुमान करना भी कठिन है। इस प्रकार के पाशविक प्रेम के परिणामों पर प्रकाश डालते हुए मोलकुस (Molkus) महोदय ने 'लिटरेरी डाइजेस्ट' में एक लम्बा लेख लिखा है। वे रूस के विषय में लिखते हैं—

"यदि स्त्री पुरुष शादी करना चाहें तो बस 'इच्छा' ही कानून के लिए काफी है। वे चाहें तो उसे रजिस्टर में दर्ज करादें चाहे न कराएँ यह भी इच्छा पर निर्भर है। सोमवार को शादी होती है तो मंगल को तलाक। १९२६ में १,००,००० स्त्रियों को उनके पति छोड़ गए, ९०,००० स्त्रियोंके बच्चों को 'अपना' स्वीकार करनेवाला कोई नहीं मिला, १८,००० स्त्रियों ने अदालत में दरख्वास्त दी कि उन्हें अपने पतियों से बच्चों के भरण पोषण के लिए खर्चा दिलवाया जाय। इस प्रकार २,०८,००० स्त्रियों का कुछ ठिकाना नहीं मालूम पड़ता। ये अंक सरकारी कागजों के हैं और जो संख्या सरकारी कागजों में आने से रह गई है उसका हिसाब ही नहीं। दो लाख आठ हजार स्त्रियों की संतान का भरण पोषण कौन करेगा ? रूस में लावारिस बच्चे—जो इस प्रकार की सोमवार को शादी और मंगलवार के तलाक से पैदा हुए हैं, ४० लाख की संख्या में मौजूद हैं। (लिटरेरी डाइ० ६ अगस्त १९२७)

अभी हाल में ही रूस की एक युवती ने १ घंटे में दो बार विधवा होकर संसार के सामने एक नया रिकार्ड रक्खा है और भारतेतर देशों की गार्हस्थ्य जीवन की अवस्था को नग्न रूप में संसार के सामने उपस्थित कर दिया है। यथा—

एक घंटे में दो बार विधवा

'लेनिनग्राड १३ जनवरी ५०
यहां की एक युवती ने १ घंटे में दो बार विधवा होकर दुनियामें एक नया रिकार्ड कायम किया है। कहा जाता है उसका सैनिक पति बन्दीगृह में था। युवती को सूचना मिली, कि बन्दी सैनिक छोड़ दिये गए हैं और उसका पति घर लौट रहा है। वह स्टेशन जाने को तैय्यार थी, तभी तार मिला कि उसके पति की मृत्यु होगई है। उस युवती ने तुरन्त अपने दूसरे प्रेमी से शादी कर ली, तभी किसी से पता चला कि वह सकुशल वापिस लौट रहा है। युवती अपने नये प्रेमी को छोड़ उसे लेने स्टेशन पर गई जहां जाने पर उसने देखा कि वास्तव में उसका पति मर गया है और उसी नाम का दूसरा बन्दी सैनिक उन मुक्त बन्दियों में विद्यमान है। वह घर लौटी तो देखा कि उसके निराश प्रेमी ने फांसी द्वारा आत्महत्या कर ली है।
(दैनिक 'अमरभारत' दिल्ली १५-६-५०)

सभ्य राष्ट्रों की सामाजिक दशा के उपरोक्त दयनीय चित्र हमारी आंखें खोल देने के लिए पर्याप्त हैं। इनसे हमें शिक्षा लेनी चाहिए और विदेशी आदर्शों के अन्धाधुन्ध अनुकरण की दुष्प्रवृत्ति का परित्याग करना चाहिए। आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि इस प्रकार के विचारों को बढ़ावा देने वाले उपन्यास नाटकों और सिनेमा चित्रों को सर्वथा रोका जाय और सर्वत्र विवाह के ब्राह्मरूप का ही प्रचार होना चाहिए। आर्य जाति ने दाम्पत्य जीवन को सुखमय बनाने के लिए यह सिद्धान्त स्थिर किया है कि प्रेम मूलक विवाह न होकर विवाह मूलक प्रेम ही श्रेयस्कर है। महाभारत रामायणादि ग्रन्थ इस सिद्धान्त की पुष्टि करते हैं क्योंकि क्षत्रियों में प्रचलित स्वयम्वर प्रथा से होने वाले सभी विवाहों का परिणाम अन्तमे बुरा ही निकला। शकुन्तला दुष्यन्त, नल दमयन्ती की कौन कहे, सीता और द्रौपदी के स्वयम्वरों का परिणाम महायुद्ध के रूप में जन-संहारक ही सिद्ध हुआ। संयोगिता के स्वयंवर का कुपरिणाम तो जयचन्द और पृथ्वीराज के पारस्परिक विरोध की सीमा लांघकर समस्त भारत को अन्यून एक सहस्त्र वर्ष तक विदेशी दासता के अभिशाप रूपमें भोगना पड़ा।