विवाह की अवस्था के विषय में आज संसार में एक विचित्र हास्यास्पद स्थिति दिखलाई देती है। एक ओर हमें इस प्रकार के विवाह देखने को मिलते हैं जिनमें वर वधू की अवस्था इतनी छोटी होती है कि उन्हें उस विवाह में सिवाय चहल पहल, सुन्दर भोजन और कुतूहल-जनक तमाशे के अन्य कुछ ज्ञात नहीं होता। दूसरी ओर विलम्बित विवाह की प्रवृत्ति ज़ोरों पर है जिसके अनुसार लड़कियों को बीस-पच्चीस वर्ष की अवस्था तक बलात् कौमार्य में रक्खा जाता है और उनके अभिभावक आंखों पर ठीकरी रखकर समय की गतिविधि से बिल्कुल आंखें मूंदकर उन निष्पाप कन्याओं को दुराचरण के अन्धकूप में स्वयं धक्का दे देते हैं। हमारी नम्र सम्मति में यह दोनों ही प्रथाएँ शास्त्र-विरुद्ध होने के कारण समाज के लिए घातक ही नहीं सर्वथा विनाशकारी हैं। लेखक को जब अपने गांवों में अशिक्षित ग्रामीणों के यहाँ दुधमुंहे बच्चे-बच्चियों का विवाह देखने का अवसर पड़ता है, मुहावरे की रीति से 'दुधमुंहे' नहीं किन्तु वास्तव में ही चार-पांच साल की दुधमुंही कन्याओं को गोद में लेकर भांवरें पढ़ते, या इससे भी छोटी अवस्था की होने पर लड़की के स्थान पर गुड़ की भेली से ही वर को भांवरें लेते देखकर उसके हृदय में जो अपार क्षोभ होता है उसकी सीमा का उस समय कोई पारावार नहीं रहता जब उसे आधुनिक शिक्षित और सभ्य घरों में यूरोप के शीत-प्रधान देशों के अनुकरण पर बीस-पच्चीस वर्ष की कुमारी कन्याओं को देखने का अवसर पड़ता है, या जब उसे समाचार पत्रों में ऐसे विलम्बित विवाहोंसे उत्पन्न होने वाली दुराचारपूर्ण घटनाओं के सम्बन्ध में समाचार पढ़ने को मिलते हैं।

प्रथम-कोटि के विवाह जहां बचपन में अर्थात् समय से पूर्व ही बालकोंमें कामभावको उदय करके उन्हें तथा उनकी भावी संतान को निर्बल बनाने के कारण बनते हैं, वहां दूसरी प्रकार के विवाह भी लड़के-लड़कियों में समय पर कामभाव की प्राकृतिक प्रेरणाके उदय होने पर उसकी पूर्ति के वैध साधनाभाव में अवैध व्यभिचार को प्रोत्साहन देकर समाज को खोखला बनाने में कम सहायक नहीं सिद्ध होते। इसलिए यह आवश्यक है कि वैवाहिक अवस्था पर भी इस प्रघट्ट में कुछ प्रकाश डाला जाय।

हम पीछे कह आए हैं कि विवाह एक प्राकृतिक संस्कार है और स्त्रीत्व पुंस्त्व नामक दो तत्त्वों के समिश्रण से सृष्टि विस्तार ही इसका फल। इसलिये हमें विवाह काल के निर्णय में प्रकृति को ही प्रधानता देनी चाहिए। इस बात को दृष्टि में रखकर अगर हम विवाह काल पर विचार करें तो सर्व प्रथम हमें देखना होगा कि लोक में स्त्रीत्व या पुरुषत्व का विकाश किस अवस्था में पूर्णरूप से हो जाता है। भिन्न २ देशों के जलवायु एवं वातावरण के अध्ययन से पता चलता है कि इस विकास का काल सर्वत्र एक नहीं है। शीत प्रधान देशों में स्त्रीत्व विकाश १२ से १६ साल की अवस्था के अन्दर होता है तो उष्ण प्रधान देशों में १० से १४ साल की अवस्था में। प्रायः सभी व्यक्ति जानते हैं कि स्त्रीत्व के विकसित होने पर शरीर में लावण्य वृद्धि, स्तनों का प्रादुर्भाव, हावभावों का उदय, इत्यादि लक्षणों के अतिरिक्त रजोधर्म का भी प्रारम्भ हो जाता है। मुख्य रूप से यह उसके गर्भधारण सामर्थ्य का सूचक चिन्ह है और प्रकृति की ओर से होने वाला एक ऐसा विचित्र परिवर्तन है जो उसे बचपन के आनन्दपूर्ण निश्चिन्त जगत् में बरबस खेंचकर चिन्ता हर्ष शोक से परिपूर्ण यौवन के मधुर द्वार पर ला खड़ा कर देता है। इस समय उसकी स्त्रीत्व-भावात्मक चैतन्यशक्ति जागृत हो जाती है। सांसारिक विषयों के सम्बन्ध में उसके हृदय में ज्ञानोदय होने लगता है। मादक अभिलाषाएं धीरे २ उसके सामने एक रंगीन दुनिया का नक्शा खेंच देती हैं और तब स्त्री चाहती है एक ऐसे पुरुष का संसर्ग—जो उसकी अभिलाषाओं को साकार रूप प्रदान करे। कामशास्त्र में लिखा है—

रजस्वला च या नारी विशुद्धा पञ्चमे दिने।
पीड़िता कामबाणेन ततः पुरुषमीहते॥

अर्थात्—ऋतुस्नाता नारी पांचवें दिन काम पीड़ित होकर पुरुष सम्बन्ध को चाहती है।

यह तो हुई स्त्रीभाव के विकास की चर्चा। पुरुषत्व विकास १८ वर्ष से प्रारम्भ होता है और लगभग २५ वर्ष की अवस्था में पूर्ण होता है। किशोरावस्था की समाप्ति और यौवन के प्रारम्भ के तीन चार वर्षों में युवकवर्ग की वही स्थिति होती है जो नव-यौवना कन्याओं की। अवस्था का यह परिवर्तन जिसे हम कोई विशेष महत्त्व नहीं देते—बालकों के जीवन में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। नीतिकारों का कहना है कि इस समय बालकों का हृदय दूध की प्रथम उफानी अवस्था में से गुजरता है और जिस प्रकार उस उफनते हुए दूध को उस समय यदि सावधानी पूर्वक कोई न सम्भाले तो उसका बिखर जाना अस्वाभाविक न होगा, वैसे ही यदि उस समय बालकों के सदाचार पर कठोर नियन्त्रण न हो तो उनका उत्पथगामी बनकर किसी कुसंगति में फंस जाना आश्चर्यजनक न होगा।

स्त्रीत्व और पुंस्त्व विकास की इन अवस्थाओं को समझने के उपरान्त विचार का विषय यह है कि विवाह इस शारीरिक विकास के बाद किया जाय या पूर्व में ही।

गहराई से इस प्रश्न को देखने पर हमें ज्ञात होगा कि कन्याओं के लिए विवाह की अवस्था 'रजोदर्शन' से तुरन्त पूर्वकी ही समुचित है, न इससे बहुत पहिले की और न बहुत बाद की ही। पुरुष की आयु यथेच्छ युवा हो और ब्रह्मचर्य पूर्ण कर चुका हो। इस प्रकार के विवाह से जहां पति पत्नी में आयु भर प्रेम रहेगा वहां उनसे होने वाली सन्तान भी बलवान् हृष्ट पुष्ट और दीर्घजीवी होगी।

महर्षि सुश्रुत ने, जो कि शारीरिक विज्ञान के प्रमुख आचार्य हैं इस विषय का विचार करते हुए लिखा है—

अथास्मै पञ्चविंशतिवर्षाय द्वादशवर्षीयां पत्नीमावहेत्।
(सुश्रुत शारीरस्थान १०, सू० ५८)

अर्थात्—पच्चीस वर्ष के पुरुष को बारह वर्ष की कन्या के साथ विवाह करना चाहिये।

हमें यहां इस बात को भली भांति समझ लेना चाहिए कि विवाह और गर्भाधान दो पृथक् २ संस्कार हैं और पृथक् २ अवस्थाओं में ही किए जाते हैं। सुश्रुत आदि महर्षियों ने जहां विवाह के लिए कन्या की उपयुक्त आयु १२ वर्ष स्वीकार की है वहां गर्भाधान के लिए १६ वर्ष की। उपर्युक्त उद्धरण से अनुपद अगले ही सूत्र में महर्षि कहते हैं—

ऊनषोडशवर्षायामप्राप्तः पञ्चविंशतिम्।
यद्याधत्ते पुमान् गर्भं गर्भस्थः स विपद्यते॥
जातो वा न चिरञ्जीवेज्जीवेद्वा दुर्बलेन्द्रियः।
तस्मादत्यन्तबालायां गर्भाधानं न कारयेत्॥
(सुश्रुत शारीरस्थान, १०, ५९-६०)

अर्थात्—यदि पच्चीस वर्ष से कम आयु का पुरुष सोलह वर्ष से कम आयु की स्त्री में गर्भाधान करे तो वह गर्भ कोख में ही मर जाता है। यदि किसी प्रकार सन्तान उत्पन्न भी हो जाय तो वह देर तक जीवित नहीं रहती, यदि जीवित रह भी जाय तो वह सदा दुर्बल ही रहेगी। इसलिए इससे कम अवस्था की स्त्री में कभी गर्भाधान नहीं करना चाहिए।

आज लोग अज्ञान के कारण इस भेद को भूल गए हैं। उनके विचार में विवाह मानो इस ग्राम्य व्यवहार के लिए पूरी स्वतन्त्रता मिलने का ही दूसरा नाम है। जो आलोचक 'शीघ्र विवाह' के कारण स्मृति-प्रणेता महर्षियोंकी कटु आलोचना करते नहीं थकते उन्हें भी इस बात का पूरा ज्ञान नहीं कि महर्षियों को 'शीघ्र-विवाह' ही अभिमत है 'शीघ्र गर्भाधान' नहीं, यही एक रहस्य है कि जिस तक सर्वसाधारण की पहुँच नहीं। जरा विचार कीजिए कि क्यों सभी स्मृतिकार और सुश्रुत सरीखे शरीर शास्त्रके महान् ज्ञाता आचार्य, एक स्वर से विवाह के लिए दश बारह वर्ष की छोटी आयु का ही समर्थन करते हैं और गर्भाधान के लिये १६ वर्ष से अधिक अवस्था का ? क्या कारण है कि रजस्वला होने से पूर्व विवाह न करने की दशा में महर्षि ने—

प्राप्ते तु द्वादशे वर्षे यः कन्यां न प्रयच्छति।
मासि मासि रजस्तस्याः पिता पिबति शोणितम्॥
(यम संहिता)

—कहकर पिता को कन्या के रज पान जैसे घृणित पाप का भागी कहने में भी हिचकिचाहट नहीं अनुभव की और विवाह के अनन्तर गर्भाधान के लिये १६ वर्ष से पूर्व की आज्ञा भी नहीं दी !

वस्तुतः बात यह है कि ऋतु दर्शन होनेके बाद स्त्रीके हृदय में काम वासना का उन्मेष होने लगता है, उसका मन पुरुष समागम के लिये उत्कण्ठित हो उठता है। ऐसी दशा में आवश्यकता इस बात की है कि उसकी इन मानसिक प्रवृत्तियों को एक केन्द्र पर स्थिर किया जाय, वे इधर उधर न भटककर एक ही केन्द्र पर अवलम्बित रहें। यह तभी सम्भव है जब पहिले से उसका विवाह सम्पन्न हो चुके क्योंकि उस दशा में स्त्री के हृदय की सम्पूर्ण वासनाएं और आकांक्षाएं उसके पति पर ही आश्रित होंगी। उसकी प्राप्ति की आशा में ही वह अन्य चिन्तन छोड़ सकेगी। ऐसा न होने पर उसकी नैसर्गिक काम भावना एक अवलम्बन न पाकर जहांतहां भटककर उसके पातिव्रत्य में हानिकारक सिद्ध हो सकती है। यदि जीवन की उस प्रारम्भिक दशा में वह अपने मार्ग से च्युत होगई तो फिर सम्पूर्ण जन्म में उसका सुधार होना बड़ा कठिन है। यही सब सोच समझकर महर्षियों ने रजोदर्शन से तुरन्त पूर्व ही विवाह की आज्ञा दी है। विवाह के अनन्तर स्त्री अपने पिता के घर ही रहे और फिर उचित अवस्था आने पर उसे पति के घर भेज दिया जाय इसलिए द्विरागमन या गौने की प्रथा आज भी बहुत से देशों में प्रचलित है जो कि इस वैज्ञानिक दृष्टिकोण के सर्वथा उपयुक्त है।

आज जिस अवस्था में कुमारियों का विवाह किया जाता है उस अवस्था तक पहुंचते २ उनकी पातिव्रत्य की पवित्र मानसिक पृष्ठभूमि प्रायः मलिन हो चुकी होती है। उसपर न जाने कितने चित्र बन और बिगड़ चुके होते हैं ऐसी दशा में उनमें पातिव्रत्य की सम्भावना करना व्यर्थ ही है। जब किसी भवन की नींव ही डगमगा जावे तब उसपर खड़ा होनेवाला भवन—चाहे दृढ चट्टानों से ही क्यों न तैय्यार किया गया हो—अवश्य ही पतनोन्मुख रहेगा।

संसार के सभी विचारशील पुरुष फिर चाहे वे भारतीय हों या वैदेशिक, विवाह की इस अवस्था के विषय में एकमत हैं। भारतीय आचार्यों की सम्मति उद्धृत करने के बाद प्रकृत प्रसंग में कतिपय विदेशी विद्वानों की सम्मति उद्धृत करना अनुपयुक्त न होगा।

'It is not good for a man or woman to live alone. Our tendency of the times is the apparently increasing avoidance of marriage or its postponement until an age when the adaptation of one individual of the couple to the other is difficult. Because habits have became fixed so firmly that their adjustment is a difficult or at last, an annoying process. Obviously, therefore, it seems to me that early marriages should be encouraged.
(Thomas A. Edison)

श्री एडीसनमहोदय—जिनसे संसार 'ग्रामोफोन' मशीन के आविष्कारक के रूप में भली भांति परिचित है लिखते हैं—"स्त्री या पुरुष के लिए अकेला अर्थात् अविवाहित रहना अच्छा नहीं है। आज के समय में लोगों की प्रवृत्ति होती जा रही है कि विवाह बिल्कुल ही न किया जाय या देर में किया जाय—इतनी देर में कि वर-वधू की प्रकृति का सामञ्जस्य ही न हो सके। यह सब अनुचित है क्योंकि बड़ी अवस्थाओं में पहुंचने तक उनकी आदतें इतनी मजबूत हो जाती हैं कि बाद में उनमें परिवर्तन करना कठिन ही हो जाता है। इसलिए मुझे यही अच्छा मालूम होता है कि शीघ्र विवाह को प्रोत्साहन देना चाहिए।

इसी प्रकार मिस्टर लेकी साहब ने अपने 'यूरोपीय आचार का इतिहास' नामक पुस्तक में एक स्थान पर लिखा है—

The nearly universal practice of the custom of early marriages among the Irish peasantry has alone rendered possible that high standard of female chastity, that intense and jealous sensitiveness respecting female honour, for which among many failings and some vices, the Irish poor have long been pre-eminent in Europe.

अर्थात्—आयर्लैण्ड के गरीब किसानों में होने वाली 'शीघ्र-विवाह' प्रथा ने वहां की स्त्रियों में उच्चतम पातिव्रत्य और उसके प्रति आदरभाव को बना रक्खा है अनेक दोषयुक्त होने पर भी वे आयरिश लोग वर्षों तक यूरोप में सम्मान भाजन रहे हैं।'

इसी प्रकार अन्य भी बहुत से पाश्चात्य विचारकों ने विवाह की आयु के विषय में भारतीय शास्त्रकारों की दूरदर्शिता को स्वीकार किया है और माना है कि वास्तव में यदि गृहस्थजीवन में हम सच्चा प्रेम, सच्ची सुख शान्ति चाहते हैं तो हमें इसी प्रणाली का आश्रय लेना चाहिए।