विवाह वह पुनीत और महत्वपूर्ण संस्कार है जिसने मानव-पशु को सच्चे अर्थों में 'मानव' बनानेमें महत्वपूर्ण भाग लिया है। विवाह संस्था अत्यन्त प्राचीन है और हम निर्विवाद रूप से कह सकते हैं कि सभ्यता और संस्कृति के प्रथमोदय काल में जब मानव वंशधरों ने सामाजिक जीवन का सूत्रपात किया तभी विवाह प्रणाली का प्रारम्भ हुआ होगा। यह प्रणाली जिस राष्ट्र में जितनी ही विकसित और उत्कृष्ट रूप में अपनाई गई, वह राष्ट्र उतना ही सभ्य सुसंस्कृत तथा उन्नत बनता गया। विवाह संस्था के अभाव में मनुष्य, पशु से भी बदतर होता, न उसकी कोई पत्नी होती न मां न बहिन न बेटी। अपनी भोगलिप्सा को पूरा करने के लिए वह कुत्तों की तरह स्त्री मात्र की तलाश में भटकता फिरता बलात्कार करता, छीना झपटी करता, गुर्राता, लड़ता और बुद्धिमान खूंखार जानवर से कहीं अधिक अपनी सारी बुद्धि का उपयोग विनाश के उपाय सोचने में करता। उसके इस प्रकार के व्यभिचार से उत्पन्न मानव-पिल्ले गली २ ठोकरें खाते फिरते न उनका घर होता न दर न स्कूल न कालेज ! शिक्षा, सभ्यता, संस्कृति, कला विज्ञान से सर्वथा शून्य एक पशु-राष्ट्र ही हमारे सामने होता ! यह विवाह ही तो है जिसने मनुष्य को परिवार दिया, घर बसानेकी प्रेरणा दी, परिवार के भरण पोषणार्थ विविध कार्यों व पेशों को जन्म दिया और आज का हमारा यह संसार बनपाया।
विवाह सुव्यवस्थित सामाजिक जीवन का अंगमात्र नहीं है किन्तु इसका उद्देश्य इससे भी कहीं अधिक महान् गहन और दिव्य भावपूर्ण है। उसकी इस महत्ता और गम्भीरता तक पाश्चात्य जगत् पहुंचे या न पहुंचे किन्तु आर्य महर्षियों और दार्शनिकों ने भारतीय जनता के सामने जो उद्देश्य रक्खे हैं उनकी प्रतिष्ठा सर्वथा लोकोत्तर आदर्शों पर की है।
विवाह के पांच उद्देश्य—
१—विवाह का प्रथम उद्देश्य सृष्टि विस्तार के लिए स्त्रीत्व और पुरुषत्व धारा का सम्मेलन है। हमने पीछे कहा है कि प्रकृति के अणु २ में उपरोक्त दोनों शक्तियें विद्यमान रहती हैं और सृष्टि विस्तार के लिए इन दोनों का सम्मेलन प्राकृतिक प्रेरणा से होता है। यह सम्मेलन ही सृष्टि का कारण है और प्रवाहरूप से संसार को अनन्तकाल तक जीवित रखता आया है।
२—चौरासी लाख पशु पक्षी कीट पतंगादि योनि भोगकर ही मानवदेह प्राप्त होती है। इस योनि में यद्यपि परमात्मा ने मनुष्य को दया करके सदसद्विवेकिनी बुद्धि प्रदान की है किन्तु अनेक योनियों में पड़ा हुआ पशु संस्कार उससे छूटता नहीं है, जिससे मनुष्य की प्रवृत्ति स्वच्छन्द आहार विहार की ओर स्वभावतया ही झुकी रहती है। प्रत्येक पुरुष के हृदय में संसार भर की स्त्रियों लिए और स्त्रियों में सभी पुरुषों के लिए भोग भावना प्राकृतिक रूप से विद्यमान रहती है। जब कभी उसे अवसर मिलता है वह अपनी इस पशु प्रवृत्ति को चरितार्थ करने में नहीं चूकता। इतिहास के पाठक जानते हैं कि यवन राजाओं ने अपने समय में सैंकड़ों की तादाद में सुन्दर स्त्रियों का अपहरण करके अपने हरमों को भर लिया था। अभी पिछले दिनों भारतीय गृह-विप्लव के समय कामान्ध नर-पशु ने स्त्री जाति पर बलात्कार अपहरण प्रधर्षणादि जो बर्बर अत्याचार किये हैं वे मानव-व्याप्त पशुता के नंगे उदाहरण हैं। नर नारियों की इस पशु सदृश स्वच्छन्द तथा निर्बाध काम भावना को एक स्त्री व एक पुरुष में बांध देना और अनेक प्रकार के शास्त्रीय नियमों द्वारा धीरे २ इसे निवृत्ति की ओर ले जाना ही विवाह का दूसरा उद्देश्य है।
३—विवाह का तीसरा उद्देश्य है प्रजोत्पत्ति द्वारा पितृऋण से मुक्ति तथा वंश रक्षा ! पीछे लिखा जा चुका है कि विवाह का उद्देश्य भोग विलास नहीं किन्तु—'प्रजायै गृहमेधिनाम्' के अनुसार सन्तानोत्पत्ति ही उसका प्रयोजन है, प्रारम्भ में दिये गए वैदिक उद्धरण में—'मया पत्या प्रजावती' कहकर वेद ने प्रजोत्पादन ही विवाह का लक्ष्य माना है। शास्त्रदृष्ट्या मनुष्य पर तीन ऋण होते हैं १ देवऋण २ ऋषिऋण ३ पितृऋण। इनमें से यज्ञ याग देवपूजनादि द्वारा देवऋण से, शास्त्रों एवं वेदों के स्वाध्याय से ऋषिऋण से मनुष्य मुक्त हो जाता है, शेष पितृऋण से मुक्ति प्रजोत्पादन द्वारा ही होती है। इसके अतिरिक्त चूंकि आत्मा सच्चिदानन्द प्रभु का ही अंग है इसलिए सत्चित् आनन्द रूप तीनों गुणों की ओर उसकी प्रवृत्ति स्वभावतः ही होती है। इनमें से सत् का ही प्रकृत विषय से सम्बन्ध है। सत् का अर्थ है सत्ता। मनुष्य अपनी सत्ता को सर्वदा अक्षुण्ण रखना चाहताहै उसकी इस अभिलाषा का फल ही सन्तान है जिसे उत्पन्न करके वह सन्तोष अनुभव करता है। पुत्र उसका अपना ही रूप है और उसकी उपस्थिति से वह अपनी 'सत्' भावना को सफल समझता है। यही प्रवृत्ति विवाहमूलक वंश परम्परा को जन्म देती है, जिसकी रक्षा के लिए—अनेक प्रकार के यज्ञानुष्ठानादि का आश्रय लेकर भी—मनुष्य सतत प्रयत्नशील रहता है।
४—मनुष्य स्वार्थी प्राणी है। अपने शरीर में उसकी जितनी मोह ममता होती है उतनी और किसी वस्तु में नहीं। विवाह द्वारा मनुष्य के इस ममत्व क्षेत्र को विस्तार मिलता है अब तक उसका जो प्रेम और मोह अपने शरीर मात्र में था, वह क्रमशः पत्नी पुत्र कन्या सगे सम्बन्धी आदि परिवार में विभक्त हो जाता है। इस प्रकार यह स्वार्थ परक प्रेम पहिले घर की चार दीवारी से प्रारम्भ होकर मुहल्ला, गली, नगर, प्रान्त, देश और समस्त विश्व में व्याप्त होकर 'वसुधैव कुटुम्बकम्' के पुनीत आदर्श का व्यावहारिक रूप धारण कर लेता है। विश्वप्रेम ममत्व की अन्तिम श्रेणी है और इस पर पहुँचकर मनुष्य—'यो माम् पश्यति सर्वत्र सर्वञ्च मयि पश्यति' के उच्च शिखर पर पहुँच जाता है। इसलिए स्वार्थ-परक प्रेम को विस्तृत कर उसका मुक्ति में पर्यवसान ही विवाह का चौथा उद्देश्य है।
५—त्याग क्षमा धैर्य सन्तोषादि गुणों का संग्रह तथा अभ्यास विवाह का पांचवां उद्देश्य है। गृहस्थ में रहते हुए दम्पती को एक दूसरे के हित के लिए स्वार्थत्याग, स्व-प्रतिकूल व्यवहार में क्षमा, अत्यन्त कष्ट में भी धैर्य आदि गुणों का प्रयोग करना अनिवार्य हो जाता है। यही गुण विकसित होकर मनुष्य को सामाजिक क्षेत्र में विशिष्ट व्यक्तित्व प्रदान करते हैं। गृहस्थ को इस पाठशाला में त्याग प्रेम आदि का पूर्ण अभ्यास कर जब दम्पती इनका प्रयोग ईश्वर प्राप्ति के अध्यात्म मार्ग में करते हैं तो वे भगवत्प्राप्ति के अत्यन्त सन्निकट पहुंच जाते हैं। यही उनके जीवन का लक्ष्य है।