वैदिक्यो या मुहूर्ताद्या, नाना शास्त्रमताः क्रियाः।
हेतुवादैः परिष्कृत्य, प्रदर्श्यन्तेऽत्र सप्रमाः॥

विगत अध्यायों में वे सिद्धान्त—जो ध्रुव की भांति सदैव अटल हैं तथा प्रातःकाल से शयन पर्यन्त की समस्त शास्त्रीय विधियों का और गर्भाधान से लेकर और्ध्वदैहिक क्रिया पर्यन्त उसके समस्त संस्कारों का सप्रमाण और सयौक्तिक वर्णन किया जा चुका है। ध्यानपूर्वक मनन करने पर तत्तत् क्रियाओं की इति कर्तव्यता का सहेतुक 'क्यों' तत्त्व सम्यक् विदित हो जाएगा, सम्प्रति इस अध्याय में अवशिष्ट समस्त विशेष क्रियाओं पर प्रकाश डालने का प्रयत्न किया जायेगा। सो बहुत कुछ लिखने पर भी यह अध्याय अपूर्ण ही रहेगा, आशा है यह अपूर्णता भी महामहिम अनन्त भगवान् के मूर्तरूप सनातन धर्म की अनन्तता की ही परिचायक सिद्ध होगी। जिसे अनुभव करते हुवे विज्ञ पाठक भी हमारे साथ—'असितगिरिसम०' से आरम्भ करके 'तदपि तव गुणानामीश ! पारं न याति' तक के पुण्य पाठ में सहर्ष सम्मिलित होंगे।


वेदादि शास्त्रों में—सूत्र ग्रन्थों में और तदुपजीवी ज्योतिष शास्त्रों में प्रत्येक शुभाशुभ कर्म के लिए तदनुकूल काल साधन विज्ञानके आधार पर मुहूर्त साधन का विस्तृत विधान विद्यमान है तदनुसार प्रत्येक हिन्दू गर्भाधान आदि संस्कारों की कौन कहे—नूतन वस्त्र पहिनने जैसी छोटी २ क्रियाओं से लेकर मरण तक के लिए सर्व प्रथम बड़ी सावधानी से मुहूर्त सधाता है। आज के इस नास्तिकता पूर्ण वातावरण में भी मुहूर्त साधनेकी प्रवृत्ति पर्याप्त मात्रा में पाई जाती है। विवाह आदि का मुहूर्त न सधने पर, घर में सब सामग्री तैय्यार रहते भी—वह न हो सकेगा यह मर्यादा अभीतक भी यथाकथञ्चित् सुरक्षित है।


मुहूर्त साधने की भावना अन्यान्य मतों में भी पाई जाती है, वे भी अमुक दिनमें अमुकसमय में ही अमुक कार्य करने को महत्त्व देते हैं। ईसाई रविवार को पवित्र मानते हैं—बाईबिल के लेखानुसार छः दिन में खुदाने सृष्टि रचना कर डाली, सातवें दिन थककर विश्राम किया। उनका विश्वास है कि वह दिन रविवार यानी 'सन्डे' था। इसलिए ईसाई सम्प्रदाय में यह दिन, खेल कूद विश्राम, ईश्वर प्रार्थना और रङ्गरलियां मनाने का दिन ही समझा जाता है। गुड् फ्राइडे=शुभ शुक्रवार और ईस्टर के दिनों को भी पवित्र मानते हैं, पहिली अप्रैल को तो हमारी होली की भांति सधा सधाया मांगलिक दिन मानते हैं।

इसी प्रकार मुसलमानों में भी शुक्रवार को पवित्र दिन माना जाता है, इसकी पवित्रता की थ्यूरी भी ईसाइयों के समान ही है, परन्तु इनकी मान्यता में विश्राम का दिन (जुम्मा) अर्थात् शुक्रवार था। 'अकरम' के अढ़ाई दिनों में ये लोग नकाह, खतना आदि कोई शुभ संस्कार नहीं करते। हमने 'अकरम' के दिनों का अनुसन्धान करके देखा तो वे दिन हमारे गणित के अनुसार वृश्चिक राशि पर चन्द्रमा की स्थिति के दिन हैं। अर्थात्—विशाखा नक्षत्र का अन्तिम चरण तथा अनुराधा और ज्येष्ठानक्षत्र सम्पूर्ण यही 'अकरम' है। अकरम शब्द भी सीधा अकर्म्म का ही रूपान्तर है जो इबरानी भाषाओं की खरोष्ठी लिपि में हल अक्षर के उच्चारण की व्यवस्था न होने के कारण स्वाभाविक है। यहां यह भी जान लेना अनावश्यक न होगा कि मुसलमान चान्द्र सम्प्रदाय के अनुयायी हैं, इसीलिए इनका वर्ष, सब त्योहार चन्द्रमा पर अवलम्बित है, इसीलिए आधे चान्द का चिह्न इनका सर्वप्रिय 'मार्का' है। सो वृश्चिक का चन्द्रमा नीच राशि का चन्द्रमा होता है इसलिए वह वर्जित है। मौलाना साहिब के फरिस्ते भी चाहे अकरम के मनहूस होने का रहस्य न जानते हों परन्तु हम उन्हें भी इसका कारण बतला देते हैं। नीच उच्च क्या है ?—इसका तत्त्व यहां नहीं बतलाया जा सकता, यह ज्योतिष ग्रन्थों से जानना चाहिए। सो मुसलमान भी 'मुहूर्त'—जिसे वे 'स्यायत' कहते हैं—सुतरां मानते हैं।

आर्य्य समाज के स्वामी दयानन्द ने तो संस्कार विधि में प्रत्येक संस्कार के आरम्भ में अमुक नक्षत्र अमुक दिन होना आवश्यक स्वीकार किया है और उसके लिए सूत्र ग्रन्थों के अनेक प्रमाण भी उद्धृत किए हैं। हम स्वामी दयानन्द जी के ही शब्दों को यहां उद्धृत करते हैं—

(क) शुक्ल पक्ष में जिस दिन मूल आदि पुरुष नक्षत्रों से युक्त चन्द्रमा हो उसी दिन सीमन्तोन्नयन संस्कार करे।
(संस्कार विधि पृष्ठ ५०)

(ख) उत्तरायण शुक्ल पक्ष में जिस दिन आनन्दमङ्गल हो उस दिन यह (चूडाकर्म) संस्कार करे।
(सं० वि० ७३)

(ग) यज्ञोपवीत का समय—उत्तरायण सूर्य्य, ब्राह्मण का वसन्त क्षत्रिय का ग्रीष्म, वैश्य का शरद ऋतु में—
(सं० वि० पृ० ८०)

जैन बौद्ध तो मुहूर्तों में हमारी ही भांति आस्था रखते हैं। इससे सिद्ध होगया कि मुहूर्त साधने की परिपाटी न्यूनाधिक प्रायः सभी सम्प्रदायों में पाई जाती है। यद्यपि ऐसी स्थितिमें कोई भी मुहज्जब हमसे 'क्यों' पूछनेका मिजाज नहीं रखता, क्योंकि—'ययोरेव समो दोषः परिहारस्तयोः समः' इस न्याय के अनुसार इसका उत्तरदायित्व उन पर भी हमारी तरह ही आयद होता है। तथापि वे विचारे अपने कल्पित एवं अवैज्ञानिक मुहूर्तों का क्या रहस्य बतला सकते हैं ! अतः हम उपर्युक्त न्याय के बहाने से अपने पाठकों को निराश नहीं कर सकते सो 'शृणुध्वं मुनयः सर्वे'—

शास्त्रीय स्वरूप

वेद में नव ग्रहों और अट्ठाइस नक्षत्रों से शुभ होने की (नाम निर्देश पूर्वक) प्रार्थना की गई है। अथर्ववेद के [ १९वें काण्ड के ७, ८, ९, ] पूरे के पूरे सूक्त इस रहस्य से भरे हैं। हम दिङ्मात्र यहां दिखाते हैं यथा—

(क) सुहवमग्ने ! कृत्तिका रोहिणी चास्तु भद्रं मृगशिरः शमार्द्रा।… … …आ रेवती चाश्वयुजौ भगं म आ मे रयिं भरण्य आवहन्तु।
(अथर्व० १९।७।२-५)

(ख) शन्नो ग्रहाश्चान्द्रमसाः शमादित्यश्च राहुणा।
(अथर्व० १९।९।१०)

अर्थात्—(क) हे अग्निदेव ! कृत्तिका नक्षत्र हमारे लिए कल्याणकारक हो, तथा रोहिणी मृगशिरः आर्द्रा भी शुभ हो। (ख) चन्द्रमा और उससे सम्बद्ध समस्त ग्रह तथा राहु सहित सब सौर ग्रह कल्याणप्रद हो।