वेदादि शास्त्रों में यात्रा कालीन मुहूर्त साधने का उल्लेख विद्यमान है। प्रत्येक मनुष्य को यात्रा करनी पड़ती है, इसलिए इस प्रसङ्ग में भी सर्व साधारण को उचित परामर्श देना हम अपना कर्तव्य समझते हैं।

शास्त्रीय स्वरूप

वेद कहता है कि—

(क) यानि नक्षत्राणि दिव्यन्तरिक्षे… ममैतानि शिवानि सन्तु।
(ख) स्वस्तितं मे सुप्रातः सुसायं सुदिवं सुमृगं सुशकुनं मे अस्तु। सुहवमग्ने स्वस्त्यमर्त्यं गत्वा पुनरायाभिनन्दन्।
(ग) अनुहवं परिहवं परिवादं परिक्षवम्। सर्वैर्मे रिक्तकुम्भान् परातान्त्सवितः सुव।
(अथर्व० १९।८।१-३)

(घ) उत्पाताः पार्थिवान्तरिक्षाः शन्नो दिविचरा ग्रहाः।
(ङ) नक्षत्रमुल्काभिहतं शमस्तु…।
(अथर्व० १९।९।७-९)

(च) शं नो भगः अर्यमा धाता… अग्निः इन्द्रः रुद्रः सोमः… शन्नो भवन्तु प्रदिशश्चतस्रः। अदितिः विष्णुः… पूषा… वायुः… सविता शन्नः पर्जन्यः।
(अथर्व० १९।१०।२-१०)

(छ) इन्द्रः… प्राच्याः दिशः पातु, धाता दक्षिणायाः, अदितिः प्रतीच्याः सोमः… उदीच्याः दिशः पातु।
(अथर्व १८।३।२५-२८)

(ज) ये ते पन्थानो बहवो जनायना, रथस्य वर्त्मानसश्च यातवे। यैस्सञ्चरन्ति उभये भद्रपापास्तं पन्थानं जयेमानमित्रमतस्करं यच्छिवं तेन नो मृड।
(अथर्व० १२।१।४७)

अर्थात्—[क] अन्तरिक्ष और द्यु स्थान में जो नक्षत्र विद्यमान हैं वे सब मेरे लिये शुभ हो [ख] प्रातःकाल, सायं, दिन शुभ हो ! सुन्दर मृगमाला नीलकण्ठ आदि पक्षी शकुन प्रद हों। हे अग्निदेव जाकर यात्रा से प्रसन्नता पूर्वक पुनः लौट आऊं [ग] पीछे से चारों ओर से रोक टोक का वचन, निन्दा क्लेश, छींक (सामने से आते हुए) खाली घड़े यात्रा के समय दूर हो [घ] पृथ्वी और अन्तरिक्ष सम्बन्धी (भूकम्प, अन्धड़, दुर्दिन, विद्युत्पात आदि) उत्पात दूर हो आकाशस्थ ग्रह मण्डल अनुकूल हो [ङ] तारे टूटना, उल्कापात शान्त हो,

[च] (पूर्वाफाल्गुनी नामक नक्षत्र का अधिष्ठाता) भग देवता, (उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र का अधिपति) अर्यमा, (रोहिणी का) धाता, (कृतिका का) अग्नि, (ज्येष्ठा का) इन्द्र (आर्द्रा का) रुद्र (मृगशीर्ष का) सोम (पुनर्वसु का) अदिति, (श्रवणका) विष्णु, (रेवती का) पूषा, (स्वाति का) वायु (हस्त का) सविता, (शतभिषज् का) वरुण=पर्जन्य, ये सब नक्षत्र देवता चारों दिशाओं में मेरे लिए शुभप्रद हो। (उक्त नक्षत्रों के स्वामियों का यह उल्लेख स्वामी दयानन्द सरस्वती आर्यसमाज प्रवर्तक द्वारा रचित 'संस्कार विधि' के नाम करण संस्कार से लिया गया है) [छ] इन्द्र पूर्व दिशा में, धाता दक्षिण में, अदिति पश्चिम, और सोम उत्तर दिशा में रक्षा करे। [ज] जो बहुत से मनुष्यों द्वारा चलने योग्य मार्ग हैं और जो रथ गाड़ी आदि के चलने योग्य रास्ते हैं, जिन मार्गों से भले बुरे सभी तरह के लोग यात्रा करते हैं वे सब रास्ते शत्रु और चोर डाकुओं से रहित एवं कल्याणकारी हों—हम, यह चाहते हैं।

उपर्युक्त प्रमाणोंमें किस प्रकार सुस्पष्ट रीति से यात्रा के समय ग्रह नक्षत्र, तिथि और तत्तत् दिशाओं के स्वामियों का उल्लेख करते हुए मुहूर्तचिन्तामणि आदि ग्रन्थों में लिखी मुहूर्त व्यवस्था का समर्थन किया है यह कोई भी हृदय रखने वाला व्यक्ति सम्यक् समझ सकता है। प्रसङ्गोपात्त मृगमाला, शकुनादि का, तथा टोक छींक, खाली घड़ा मिलने का भी सुस्पष्ट उल्लेख होने से इन सब शकुनों की प्रामाणिकता सिद्ध हो जाती है।


हम पीछे सिद्ध कर चुके हैं कि 'अण्ड-पिण्ड-वाद' सिद्धान्त के अनुसार तत्तत् ग्रह नक्षत्र पिण्डों का मानव पिण्ड पर किस प्रकार प्रभाव पड़ता है और यात्रा के समय भी उन सब की अनुकूलता सापेक्ष्य है। अपनी २ कक्षा में जिस प्रकार ग्रहों की अवस्थिति है, इसी प्रकार शनि कक्षा से ऊपर नक्षत्र कक्षा का स्थान है। ग्रहों की भांति नक्षत्रों में भी अनेक वैचित्र्य विद्यमान हैं जिन्हें 'देश वैचित्र्यवाद' और वस्तु वैचित्र्यवाद' के अनुसार भली भांति मनन किया जा सकता है, जो नक्षत्र जैसा विशेष गुण रखता है और मानव पिण्ड पर उसका जैसा प्रभाव पड़ता है तदनुसार ही उस २ नक्षत्रके देवता के नाम की कल्पना की गई है। यह कल्पना कोरी कल्पना नहीं बल्कि 'यथा नाम तथा गुणः' के अनुसार जिस देवता का जैसा नाम है वह वैसा ही फलदायक है। जैसे कृतिका नक्षत्र का अधिष्ठाता अग्नि है तो, उक्त नक्षत्रकी कक्षा आग्नेय परमाणुओं से व्याप्त रहती है। भरणी नक्षत्र का देवता यम=मृत्यु है तो आकाश का यह प्रदेश संहारक गैस से उपप्लुत रहता है। इसी प्रकार शतभिषज् का देवता वरुण=पर्जन्य है, तो उक्त नक्षत्र के चारों ओर जलीय परमाणुओं के सघन पटल सदैव परिव्याप्त रहते हैं।

हमने 'अण्डपिण्डवाद'में सिद्ध किया है कि मानव पिण्ड का सब कुछ उक्त ब्रह्माण्डवर्ती तत्तत् पिण्डों की ही देन है, हमारी अमुक शक्ति का मूल स्रोत उक्त ग्रह नक्षत्रात्मक पिण्ड ही हैं। जैसे 'पावर हाउस' की खराबी से समस्त नगर में अन्धेरा छा सकता है और 'वाटर वर्क्स' की खराबी से शहर भर प्यासा मर सकता है ठीक इसी प्रकार उक्त पिण्डों की अनुकूलता किंवा प्रतिकूलता से मानव पिण्ड परिपुष्ट और उपद्रुत हो सकता है।

जैसे लोक में प्रत्यक्ष है कि ग्रीष्म ऋतु में सामने का सूर्य यात्री को चकाचौंध करता है और शिरदर्द आदि अनेक व्याधियों का कारण बन जाता है इसी प्रकार अन्यान्य अमुक ग्रह और नक्षत्र भी अपने से सम्बद्ध तत्त्व पर बुरा या भला प्रभाव अवश्य डालता है। हम उसे सूक्ष्म होने के कारण चाहे सहसा अनुभव न कर पाते हों, परन्तु कोई भी सिद्धान्तवादी हमारी इस स्थापना=मान्यता से इन्कार नहीं कर सकता। अन्तर केवल इतना है कि सूर्य शारीरिक दृष्टि से दायें नेत्र पर प्रभाव डालेगा तो चांद बायें पर डालेगा, वह आत्मा को प्रभावित करेगा तो चांद मन को उद्वेलित करेगा। मंगल रक्त संचार='ब्लड प्रसर' को उत्तेजित करेगा, बुध बोलती बन्द कर देगा—कई बार प्रत्यक्ष देखने में आता है कि बड़े २ प्रगल्भ वक्ता अमुक समय मूक हो जाते हैं, समय पर उचित बात भी कहना भूल जाते हैं। अपनी इस अतर्कित मूकता के कारण वे कई प्रकार की हानि भी उठा लेते हैं, समय निकल जाने पर जब दूसरे लोग कहते हैं कि आज तुम चुप क्यों हो गए ? तब वक्ता स्वयं भी अपनी भूल पर बहुत पश्चात्ताप करता है, परन्तु—'समय चूकि पुनि का पछिताने' कहना न होगा कि उसकी इस प्रवृत्तिमें 'दैव' ही हेतु है। वैज्ञानिकोंकी दृष्टि में कोई भी कार्य निर्हेतुक नहीं होता हमारे महर्षि भी 'सति मूले तद् विपाकः' सिद्धान्त के पक्षपाती हैं। समस्त अज्ञात कारणों का ही एक समष्टिनाम 'दैव' है। आस्तिक समुदाय संक्षेपमें किसी भी अज्ञात हेतु को दैव कहकर संतोष करते हैं। परन्तु वैज्ञानिकदृष्टि से जब उस अनेकता का विश्लेषण किया जाता है तो वह एक ही 'दैव' अनेक नामों से सामने आता है। इसी व्यष्टि के अनेक नाम ग्रह, नक्षत्र, पञ्च महाभूत आदि कहे जा सकते हैं।


यहां एक आशङ्का यह भी की जा सकती है कि अहिन्दु लोग यात्रा मुहूर्त के बखेड़े में नहीं पड़ते, उन पर कुछ भी बुरा प्रभाव नहीं पड़ता। हम ऐसी आशङ्का करने वालोंसे पूछना चाहते हैं कि हमने 'अण्ड पिण्ड' व्यवस्था के अनुसार जिस सिद्धान्त की स्थापना की है तुम पहिले उसका खण्डन करो, और यह सिद्ध करो कि सूर्यादिका मानवपिण्ड पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता, तब हम तुम्हारी क्यों का उत्तर देने के लिए बाध्य हैं। यह बात कोई भी भौतिकविज्ञान-वेत्ता सात जन्म में सिद्ध नहीं कर सकता। फिर जब विवश हो कर यह स्वीकार कर लिया जाता है, कि मानव पिण्ड पर ब्रह्माण्ड की तत्तद् वस्तुओं का अनिवार्य प्रभाव पड़ता है तब अहिन्दू उस प्रभाव से कैसे बरी माने जा सकते हैं। अतः हम उच्चैस्तरां कहेंगे कि प्रभाव तो यवन म्लेच्छ नास्तिक और आस्तिक सभी पर समान रूप से पड़ता है, परन्तु मुसलमान उसे 'खुदा की मर्जी' कह कर, ईसाई 'आरडर आफ गाड' कह कर और नास्तिक इत्तिफाकिया=बाई चांस 'ऐक्सीडैण्ट' बता कर, सन्तोष कर लेते हैं। इनमें नास्तिकों का उत्तर एक दम 'अवैधानिक, अननेचरल और मूर्खतापूर्ण है अर्थात् उन्होंने बिना कारण ही कार्य की उत्पत्ति स्वीकार करते हुवे अपनी बुद्धिका स्वयं दिवाला पीट डाला है। ईसाई मुसलमान आदि ईश्वरवादी लोगों ने खुदाका नाम लेकर कुछ कारण तो बताने की चेष्टा की है, परन्तु वे यह जानने में असमर्थ हैं कि आखिर-'खुदा की मर्जी' भी बिना कारण ही किसी पर गजब कैसे ढहा सकती है। यदि इतना अन्धेर हो तो फिर खुदा की न्यायशीलता में अन्तर पड़ता है।

ऐसी स्थितिमें भारतीय ऋषियोंकी ईश्वरवादिता इस प्रकार की अन्याय मूलक नहीं, किन्तु वे तो यह मानते हैं कि ईश्वर 'कर्तुं अकर्तुं मन्यथाकर्तुं प्रभु' होते हुवे भी 'कर्म फल दाता' है। मुसलमान ईसाई आदि पुनर्जन्म में विश्वास न रखने वाले मतवादियों से जब भी हमारा 'पुनर्जन्म—जिसे वे मसला तनासुक' कहते हैं, शास्त्रार्थ=मनाजरा हुवा, तो हमारे यह प्रश्न करने पर कि अमुक बालक जन्म से ही अन्धा पैदा हुवा देखा गया, सनातनधर्म की रीति से तो उसकी यह अन्धता पूर्वजन्मकृत पाप का परिणाम है, परन्तु पुनर्जन्म न मानने वालोंके यहां केवल खुदाकी गल्ती या गैरइन्साफीके सिवा इसे और क्या कहा जा सकता है, बस ! यह सुनते ही बड़े २ मौलाना और पादरी बगलें झांकने लग जाते हैं। हमारे भारतीय वैदिक विज्ञान में ईश्वर की इच्छा भी हमारे कर्म के अनुसार ही होती है वह इत्तिफाकिया, और 'बाई चांस' नहीं होती। जैसे नास्तिक ने पहिले ही उत्तर में बुद्धि का दिवालियापन प्रकट कर दिया तो इन खुदा-परस्त मोमिनों ने भी जिरह करने पर दूसरे ही प्रश्न का उत्तर देते हुवे 'मूल कारण' अन्वेषण की अपनी अक्षमता स्वीकार करली। हम पुनः डंके की चोट उद्घोषित कर देना चाहते हैं कि यात्रा का मुहूर्त न साधने पर अमुक बुराईके शिकार तो सभी होते हैं, परन्तु अपनी अज्ञतावश उस बुराई को अकारण समझ लेना या असली मूल-कारण को छोड़ कर एक मात्र बेचारे ईश्वर पर सब भार लाद देना—यह बात दूसरी है। हम सिद्धान्त रूप से नक्षत्रों का प्रभाव मानने के लिये सब मतवालों को बाध्य कर सकते हैं। अस्तु ! हम कतिपय यात्राकालीन प्रसिद्ध बातों पर विशेष प्रकाश डालने का प्रयत्न करते हैं।