समस्त मतवालों की अभिवादन की प्रथाओं का निरूपण करने के अनन्तर अब हम क्रम प्राप्त सनातनधर्मी प्रथा और उससे होनेवाले वैज्ञानिक लाभों का दिग्दर्शन कराते हैं।
हम पीछे कह आए हैं कि मन्दिरों में देवप्रतिमाओं के सामने साष्टांग प्रणाम करने का विधान है। इससे सर्व प्रथम तो यह लाभ है कि मन्दिर में जानेवाले राजा, रङ्क सबका अहङ्कार समूल नष्ट हो जाएगा। क्योंकि जब तक हमें अपने किसी प्रकार के भी बड़प्पन का अभिमान बना रहता है तब तक साष्टांग प्रणाम करनेकी श्रद्धा ही नहीं होती ! साथ ही दर्शक लोग खास कर स्त्रिएं बड़ी सजधज के साथ वेषभूषा बनाकर मन्दिर में जाती हैं इससे सर्वसाधारण के मन में विकार उत्पन्न होता है। देव स्थानों और धार्मिक उत्सवों में जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को सीधे सादे किन्तु शुद्ध और स्वच्छ वस्त्र पहिन कर जाना चाहिए। यदि साष्टांग प्रणाम करनेकी परिपाटी को तत्परतापूर्वक प्रोत्साहन दिया जावे तो स्वभावतः ही तड़क-भड़क वाले चमकीले कीमती वस्त्रों के मलिन हो जाने के भय से भक्त लोग साधारण वस्त्र पहिनकर ही मन्दिरों में आने लगेंगे जिससे विकारमय वातावरण का मूल ही समाप्त हो जाएगा।
इससे एक लाभ और होगा, आज हम जिस समता या साम्यवाद के स्वप्न देख रहे हैं—परन्तु हमारी मनमानी कार्यप्रणालीके दोषसे समता के स्थान में अवाञ्छित 'एकाधिनायकत्व'=Dictatorship का बोलबाला होता जा रहा है—उस समता की उर्वरा प्रसव भूमि ये मन्दिर ही हैं। जिस भगवान् ने राजा रङ्क दोनों को ही समान मूत्र की नाली से उत्पन्न किया और अन्त में भी समान अग्नि जल मिट्टी में मिला देने की व्यवस्था की, उस समोऽहं सर्वभूतेषु' कहने वाले प्रभु के द्वार में भी स्व स्व अधिकारानुसार सबको समान रीति से ही साष्टांग प्रणाम करना चाहिये। साष्टांग प्रणाम में हमारे शरीर का प्रत्येक अङ्ग, दृष्टि और मन सब कुछ ही प्रभु के सामने सुतरां झुक जाता है, अर्थात्—हम सर्वात्मना आत्मनिवेदन कर देते हैं। कहना न होगा कि नवधा भक्ति का अन्तिम उज्ज्वल रूप 'आत्म-निवेदन' ही है, जिसकी प्राप्ति का उच्चतम ध्येय उक्त साष्टांग प्रणाम में निहित है।
हम पीछे सिद्ध कर आये हैं कि पार्थिव आकर्षण का मानव पिण्ड पर समधिक प्रभाव पड़ता है। जब हम साष्टांग प्रणाम करेंगे तो हमारा पिण्ड एकबारगी नीचे से ऊपर तक पृथ्वी पिण्ड से स्पृष्ट होने के कारण पार्थिव विद्युत् से भरपूर हो जाएगा। अब हम जब खड़े होकर प्रभु प्रतिमा को सस्पृह दृष्टि से देखेंगे तो वैज्ञानिक पूजाविधान के द्वारा प्रतिमा में व्याप्त हुए दैवी गुण हमारे पिंड में भी विकसित हो जाएंगे। हमारी इस स्थापना को यों समझना चाहिए कि जैसे सूर्य की किरणों में सर्वत्र व्याप्त अग्निस्फुलिङ्ग, सूर्यकान्त=आतशी शीशे के सान्निध्य से अपने निकटवर्ती द्रव्यों को भी प्रज्वलित कर देते हैं, ठीक इसी प्रकार सर्वव्यापक प्रभु की विश्व में परिव्याप्त अनन्त शक्तियें प्रतिमा पीठ के सान्निध्य से भक्तों के हृदयों को भी सशक्त बना देती हैं। परन्तु सूर्यकान्त के सम्पर्क में आने वाले वे ही पदार्थ प्रज्वलित हो पाते हैं जो कि स्वयं भी अग्निस्फुलिङ्ग ग्रहण कर सकने की योग्यता रखते हों। पाषाण, जल, लोह जैसे समधिक ठोस पदार्थों पर झटिति आतिशी शीशे की किरणों की अभिव्यक्ति नहीं हो सकेगी, किन्तु रुई, घास, फूस जैसे ज्वलनशील पदार्थों पर ही हो सकेगी। ठीक इसी प्रकार भक्तों को भी प्रतिमा के दैवी गुणों को अपने पिंड में प्रस्फुटित करने के लिए प्रथम तादृश योग्यता सम्पादन करने की आवश्यकता है। साष्टांग प्रणाम इस योग्यता सम्पादन का अन्यतम साधन है।
अब गुरुजनों की चरण स्पर्शपूर्वक की गई वन्दना का रहस्य समझिये। हमारे यहां प्रणाम करना अन्यान्य पन्थोंकी भांति एक निरर्थक व्यापार नहीं है। किन्तु मनु आदि महर्षियों ने इसके चार लाभ प्रकट किये हैं। यथा—प्रथम आयुवृद्धि। दूसरा—विद्यावृद्धि, तीसरा—यशोवृद्धि और चौथा—बलवृद्धि। ये चार पदार्थ कैसे मिलेंगे, इसका वैज्ञानिक हेतु हमारे प्रणाम करने की विधि में सुरक्षित है। हम 'अण्ड पिंड' सिद्धान्त में और विद्युत् आकर्षण प्रघट्ट में यह सिद्ध कर आये हैं कि प्रत्येक मानव पिंड में 'व्यक्ति वैचित्र्यवाद' के अनुसार विभिन्न प्रकार की शक्तियों का समावेश रहता है। वह वैद्युत् शक्ति ऋणात्मक और धनात्मक अर्थात् नैगिटिव और पौजिटिव नामसे दो प्रकार की है जिसका निरूपण भी पीछे हो चुका है। मानव-पिंड के बायें अङ्ग में नैगिटिव का आधिक्य और दायें अङ्ग में पौजिटिव का बाहुल्य पाया जाता है। यह बात सभी जानते हैं कि अर्धाङ्ग पक्षाघात रोग में मनुष्य का ऊपर से नीचे तकका बराबर आधा-आधा अङ्ग शिथिल हो जाता है। अर्थात् एक पांव, एक हाथ और एक आंख आदि २ सर्वथा जड़ प्राय हो जाते हैं, और दूसरी ओर के पांव हाथ नेत्र पूर्ववत् प्रगतिशील बने रहते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि मानव शरीर में आधो आध दो धाराएं विद्यमान हैं। जब हम किसी गुरुजन को प्रणाम करने चलें तो स्वभावतः सामने वाले व्यक्ति के दायें और बायें अङ्ग हमारे दायें और बायें अङ्गों से ठीक विपरीत होंगे, ऐसी स्थिति में हमारे ऋषियों ने हाथ घुमाकर दायें हाथ से दायें पांव का और बायें हाथ से बायें पांव का स्पर्श करने का विधान किया है। जिससे प्रणामकर्ता और प्रणम्य दोनों पिण्डों की नैगिटिव और पाजिटिव दोनों धाराएं समान रूप से सम्मिलित हो सकें।
गुरुजन—आयु, ज्ञान, यश और बल इन चारों गुणों से अथवा किसी एक या अधिक गुण से परिपूर्ण हैं, और प्रणाम करने वाला निश्चित ही आयु ज्ञान यश और बल की पूर्णता का सुपात्र इच्छुक है। जैसे विद्युत् उत्पादक यन्त्र=डैनुमा में सञ्चित विद्युत् अपने सम्पर्क में आने वाले सुस्पृष्ट दूसरे यन्त्र में प्रवाहित हो उठता है, अथवा 'पावर हाउस' से स्विच मिला देने पर हमारी बत्ती जल उठती है, पंखा चलने लगता है, ठीक इसी प्रकार प्रणम्य गुरुजन में जो भी विशिष्ट गुण होंगे वे चरण स्पर्श के कारण प्रणाम करने वाले में संक्रमण कर जाएंगे। उधर गुरु जन शास्त्र विधि के अनुसार प्रणाम करने वाले के मस्तक पर अपना दायां हाथ रखकर आशीर्वाद देंगे जिससे प्रणम्य और प्रणामकर्ता दोनों में अमुक गुणों से परिपूर्ण वैद्युत् प्रवाह एक आवर्त=सरकल के रूप में सञ्चालित हो उठेगा।
जैसे दीपक से जला दीपक पूर्व दीपकके प्रकाश आदि समस्त गुणों का आधार बन जाता है, परन्तु इससे पूर्वदीपक में कुछ न्यूनता नहीं पड़ती, ठीक इसी प्रकार गुरुजनों के समस्त गुण हमारी प्रणाम पद्धति के अनुसार प्रणामकर्ता में विकसित हो जाते हैं, और इससे प्रणम्य गुरुजनों की शक्ति में कोई न्यूनता नहीं पड़ती। हां ! वाचिक आशीर्वाद में शक्ति अवश्य व्ययित होती है इसीलिये शापानुग्रह करते हुए हमारे पूर्वज बहुत फूंक-फूंककर पांव रखते थे। अब भी शास्त्र-विश्वासी विद्वान् किसी को दीक्षित शिष्य बनाने में पात्रापात्र के विचार से आनाकानी अवश्य करते हैं।
दायें हाथके संस्पर्श से, स्पृष्ट मनुष्य के अनेक दोषों का मार्जन किया जा सकता है, और स्पर्श करने वाला व्यक्ति अपने ओज का उसमें आधान कर सकता है। यह वैदिक सिद्धान्त है और वर्तमान युग के शारीरिक विज्ञान निष्णात विद्वान् इसका सर्वात्मना समर्थन करते हैं यथा—
अयं मे हस्तः भगवानयं भगवत्तरः।
अयं मे विश्वभेषजोऽयं शिवाभिमर्शनः ॥
(अथर्व ४।१३।६)
अर्थात्—यह हाथ अधिक गुणकारी है, मेरा यह हाथ सब रोगों की दवा ही है, और यह मेरा हाथ स्पर्श से शुभ=आरोग्य करने वाला है।
आशा है पाठकगण तुलनात्मक दृष्टि से सभी पन्थों की अभिवादन पद्धतियों पर विचार करते हुवे गुण दोष विश्लेषणपूर्वक भारतीय वैदिक पद्धति की सार्थकता, वैज्ञानिकता और अवश्यकरणीयता का भली प्रकार मनन करेंगे। हमारी इस प्रणाम पद्धति की वैज्ञानिकता में यही एक प्रबल प्रमाण पर्याप्त है कि ऋषियों ने दायें हाथ से दायां पांव और बायें हाथ से बायां पांव छूने की जो व्यवस्था दी है वह अहेतुकी नहीं हो सकती !