हमारी दिनचर्या नियमित है। प्रातः जागरण से लेकर शयन तक की समस्त क्रियाओं के लिए शास्त्रकारों ने अपने दीर्घकालीन अनुभव से ऐसे नियमों का निर्माण किया है जिनका अनुसरण करके मनुष्य अपने जीवन को सफल कर सकता है।

अन्यान्य मत मतान्तरों का केवल विचारों से ही सम्बन्ध है, आचार से नहीं। इसीलिये वे अपने सदस्यों के स्वेच्छाचार पर कोई नियन्त्रण नहीं रखते परन्तु विचार का थोड़ा-सा भी स्वातन्त्र्य इनके यहाँ अक्षम्य अपराध समझा जाता है। जैसे एक मुसलमान—स्त्री हत्या, बाल हत्या, सामूहिक हत्या, सुरापान, खुदा के नूर का सफाया आदि कुकृत्य करता हुआ भी—पक्का मोमिन कहला सकता है, बशर्ते कि वह पैगम्बर और कुरान पर यकीन रखता हो। उदाहरण के लिए नादिर, चंगेज, मुहम्मद बिन कासिम, औरङ्गजेब और अकबर आदि का नाम लिया जा सकता है। इतिहास साक्षी है कि इनमें से अकबर को छोड़कर बाकी पूर्वोक्त सभी लोग कितने अत्याचारी शासक हुए हैं। अकबर का दाढ़ी मुंडा चित्र इस्लाम के अपमान का जीता जागता प्रमाण है। यवन शासन में 'सुराही' और 'पैमाना' तो हुक्के की तरह बादशाहत का एक अनिवार्य अंग समझा जाता था, तभी तो मुगलिया खानदान के अधिकांश बादशाहों के तत्कालीन चित्रों में ये तीन वस्तुएँ प्रायः साथ २ अंकित रहती हैं। यह सब कुछ होते हुए भी मुस्लिम सम्प्रदाय में उक्त सभी लोग इस्लाम की नाक समझे जाते हैं, परन्तु परम विद्वान्, उपनिषदों को अर्बी फारसी में अनूदित कराने वाला दाराशिकोह, सदाचारी मुराद और वेदान्तनिष्ठ मस्त अबरेज आदि सज्जन स्वतन्त्र विचारों के कारण कत्ल करा दिये गये और इस्लामी इतिहासकारों की दृष्टि में वे आज तक 'काफिर' समझे जाते हैं।

यही बात न्यूनाधिक अन्यान्य सभी पन्थों में पाई जाती है, परन्तु सनातन धर्म में इसके सर्वथा विपरीत, विचारों पर इस प्रकार का कोई नियन्त्रण नहीं है। एकेश्वरवादी समाधिनिष्ठ योगी से लेकर—'भूतानि यान्ति भूतेज्या'—के अनुसार भूतपूजा में विश्वास रखने वाला व्यक्ति तक—सभी अपने अपने स्वतन्त्र विचार रखते हुए भी निर्विशेष सनातन धर्मी माने जाते हैं। परन्तु हम 'आचार स्वतन्त्र्य' अर्थात्—स्वेच्छाचार के लिए अपने सदस्य को कभी आज्ञा नहीं देते क्योंकि हमारा धर्म केवल विचारों से ही सम्बद्ध नहीं है किन्तु हमारा छोटा-बड़ा सभी प्रकार का आचार सर्वथा और सर्वदा धर्म से सुसम्बद्ध है। सीधे शब्दों में बल्कि यूँ कह सकते हैं कि 'आचारः प्रथमो धर्मः' अर्थात्—आचार ही मुख्य धर्म है। सो सनातन धर्म ऐसा कोई पदार्थ नहीं है जो कि केवल मृत्यु के बाद ही उपयोग में आता हो परन्तु सनातन धर्म तो वह तत्त्व है जिसका कि हमारे खान-पान रहन-सहन जीवन और मरण—गर्ज है कि प्रत्येक आचरण से साक्षात् सम्बन्ध है।

कुछ लोग हम पर आक्षेप करते हुए कहा करते हैं कि—'इन लोगों ने धर्म को ऐसा कच्चे सूत का धागा बना रक्खा है कि जिसके जरा-जरा सी बात पर टूट जाने का खतरा रहता है।' इन आक्षेपकर्ताओं की दृष्टि में मानो धर्म ऐसी फौलादी चट्टान है कि उस पर चाहे कुछ भी अनाप-शनाप दुराचार अनाचार अत्याचार और व्यभिचार किया जाय परन्तु वह तथैव दृढ़ बनी रहती है। शायद यह आक्षेप करते हुए वे भूल जाते हैं कि जङ्कशन स्टेशन पर रेलवे लाइन जब एक दूसरे से पृथक् होती हैं तो काँटा बदलने के स्थान पर पहिले पहल केवल सुई की नोक के बराबर ही अन्तर पड़ता है परन्तु अन्त में एक दूसरी से इतनी पृथक् हो जाती है, कि एक कलकत्ता पहुँचती है तो दूसरी पेशावर। गाजियाबाद रेलवे स्टेशन पर एक ही लाइन पर पूर्वाभिमुख खड़ी फ्राँटियर मेल और कलकत्ता मेल को देखकर यह दृष्टान्त खूब समझा जा सकता है। सो सनातन धर्म जहाँ तक आचार से सम्बन्ध है वह निःसन्देह कच्चे सूत के धागे से भी अत्यधिक नाजुक और शिरीष के पुष्प की पंखड़ियों के समान अतीव कोमलतम है। इसलिये अनाचार की वायु मात्र के स्पर्श से भी उसको ठेस पहुँचती है। उसके सर्वथा बिखर जाने का पूरा-पूरा खतरा है। बाली ने भगवान् राम को 'मारेउ मोहिं ब्याध की नाईं' कहते हुए केवल मुख से ही 'ब्याध' कहा था, परिणामस्वरूप पुनर्जन्म में स्वयं 'जरा' नामक व्याध ही बनना पड़ा था। इसलिये यह निश्चित हुआ कि सनातन धर्म की प्रत्येक क्रिया का धर्म से सम्बन्ध है, अर्थात्—हमारे यहाँ खाना-पीना सोना जागना, रोना धोना जीना और मरना आदि सभी बातों की इतिकर्तव्यता की विधि विद्यमान है। यदि अमुक काम उस विधि के अनुसार किया जाय तो वह 'धर्म' कहा जाता है और विधिविहीन मनमाने ढंग से किया जाय, तो उसे ही पाप कहा जाता है।