भगवत्स्मरण सम्बन्धी कतिपय पद्यों के अतिरिक्त हिन्दुओं के दैनिक पाठ में शिष्टाञ्जलि नामक कुछ पद्यों का सन्निवेश और होता है जिसको कि प्रतिदिन प्रातःकाल नियमपूर्वक पढ़ा जाता है। इस अञ्जलि का अपना विशेष महत्व है। धार्मिक और राष्ट्रीय दोनों ही दृष्टि से इसका पठन प्रत्येक भारतीय के लिये अत्युपयोगी है। इस की सहायता से हम अपने इस पवित्र देश में उत्पन्न हुए, उन महापुरुषों की उज्ज्वल स्मृति को अक्षुण्ण रखते हैं जिन्होंने अपने शुभ कार्यों, अनथक प्रयत्नों और अनुपम बलिदानों द्वारा हमारे इस राष्ट्र को उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचाया, जिन महापुरुषों के चरित्र मानव-मात्र के लिये आदर्श रहे हैं और जिन पर आज भी हम गर्व कर सकते हैं। इस अञ्जलि में हमें अपने देश की उन पुण्य सरिताओं एवं स्थानों की आभारपूर्ण स्मृति मिलती है—जो धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बड़े महत्व पूर्ण हैं। यह स्थान प्राचीन समय में भारतीय राजनीति, सांस्कृतिक-विकास एवं धार्मिक परम्पराओं के केन्द्र रहे हैं, हमारा पूर्व का सम्पूर्ण इतिहास इन से सम्बद्ध है। पवित्र-सलिला गंगा यमुना आदि सरिताएँ—जहाँ वैज्ञानिक दृष्टि से अपना विशेष महत्व रखती हैं, वहाँ भारत वसुधा को लाखों वर्षों से आज तक—'सुजला सुफला शस्य-श्यामला' और समृद्ध बनाने में उन का कितना उपयोग हो रहा है यह किसी भी भारतीय से छिपा नहीं है।
भौगोलिक एवं ऐतिहासिक प्रेरणा भी इस अञ्जलि की अपनी विशेषता है। आज इतिहास एवं भूगोल, स्कूली विषय बन गए हैं पुस्तकों के शब्द-जाल में जकड़ कर इन रोचक विषयों को ऐसा दुरूह बना दिया है कि वे बच्चों के लिये हौव्वा बन गये हैं। इतिहास के पन्नों को रटते २ बेचारों का दिमाग खाली हो जाता है, इस पर तुर्रा यह है, कि आज के नव शिक्षित युवक से आप उस के पूर्वजों, ऋषि महर्षियों, पराक्रमी राजाओं और भारतीय इतिहास के अन्य प्रमुख पात्रों के विषय में कुछ पूछिये तो वह इन के ज्ञान से सर्वथा शून्य ही होगा। उसे इंगलैण्ड के इतिहास के हैनरी सेविन्थ, ऐलिजाबैथ आदि, भारतीय इतिहास के अकबर, जहाँगीर वगैरह का तो ज्ञान होगा किन्तु आदि-सम्राट् मनु, न्याय-परायण शिवि, भारत की नींव डालने वाले भरत आदि के नाम से वह सर्वथा अपरिचित होगा।
प्राचीन समय में इतिहास भूगोल घरेलू विषय होते थे। प्रातःकालीन इन वन्दनाओं से ले कर समय २ पर होने वाली कथा वार्ता प्रवचन आदि द्वारा अपढ़ से अपढ़ व्यक्ति को भी दुरूह ऐतिहासिक घटनाएँ चुटकियों में याद हो जाती थीं। इस 'अञ्जलि' में भारतीय इतिहास के जिन उज्ज्वल नर रत्नों और जिन ऐतिहासिक स्थानों नदियों आदि का वर्णन है—प्रतिदिन इन श्लोकों के पाठ करने वाले व्यक्ति का, इन के विषय में विशेष ज्ञान के लिये उत्कण्ठित होना स्वाभाविक है। प्रतिदिन 'पुण्यश्लोको नलो राजा' बोलने वाले व्यक्ति के हृदय में क्या यह भाव उत्पन्न न होगा कि आखिर यह नल राजा है कौन ? इसी जिज्ञासा पूर्ति के रूप में इतिहास का जन्म होता है। घर में रहने वाले बूढ़े बाबा, दादी, बालक को राजा नल और दमयन्ती की कथा सुना कर उसे बिस्तर पर पड़े २ इतिहास का पाठ पढ़ाते हैं। 'पुण्यश्लोको युधिष्ठिरः' के प्रश्न पर उसे महाभारत के इतिहास का पाठ पढ़ाया जाता है। 'अयोध्या मथुरा माया' पाठी बालक के 'दादा ! अयोध्या कहाँ है ?' जैसे भोले प्रश्न के उत्तर में दादा उसे अयोध्याका भौगोलिक परिचय देते हैं। इस प्रकार क्रान्तदर्शी महर्षियों ने खेल २ में ही बालकों के हृदय में भौगोलिक और ऐतिहासिक जिज्ञासा, उत्कण्ठा और रुचि उत्पन्न करने का यह कितना सुन्दर क्रम स्थिर किया था—इसे हम आज भूल गये हैं। इस प्रकार से हम अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं को अक्षुण्ण बनाये रखने में कितने सहायक होते हैं इस का भी विचार हम कभी नहीं करते।
इधर कुछ दिनों से राष्ट्रीय-स्वयं-सेवक संघ के संचालकों ने इस की महत्ता को अनुभव किया है और अपने कार्यक्रम में इस को स्थान देकर पुनर्जीवित करने का प्रयत्न किया—यह हर्ष का विषय है। यद्यपि इस में भाग लेने वाले स्वयं-सेवकों में संस्कृतानभिज्ञों की संख्या ही अधिक है और ऐसी दशा में इस अञ्जलि का अर्थ भी उन की समझ में न आएगा किन्तु यह निश्चित है कि निरन्तर किसी एक ही शब्द के उच्चारण से उस का अर्थबोध होने लगता है। इस लिये इस से सभी स्वयं सेवकों को महान् लाभ ही होगा इस में कोई सन्देह नहीं।
यह है इस 'शिष्टाञ्जलि' के नित्यपाठ की 'क्यों' का संक्षिप्त समाधान। आशा है इतने से ही एतद्विषयक जिज्ञासा की शान्ति हो सकेगी और हम नियम पूर्वक प्रातःकाल इसका पठन अवश्य करेंगे।
पुण्यश्लोको नलो राजा पुण्यश्लोको युधिष्ठिरः।
पुण्यश्लोका च वैदेही पुण्यश्लोको जनार्दनः॥
अहिल्या द्रौपदी सीता तारा मन्दोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम्॥
प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीक,-
व्यासाम्बरीषशुकशौनकभीष्मदाल्भ्यान्।
रुक्माङ्गदार्जुनवसिष्ठविभीषणादीन्,
पुण्यानिमान् परमभागवतान्नमामि॥
धर्मो विवर्धति युधिष्ठिरकीर्तनेन,
पापं प्रणश्यति वृकोदरकीर्तनेन।
शत्रुर्विनश्यति धनञ्जयकीर्तनेन,
माद्रीसुतौ कथयतां न भवन्ति रोगाः॥
अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका।
पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः॥
मनुं स्मराम्यादिगुरुं प्रजानाम्,
भागीरथं धीरमुदग्रयत्नम्।
भूपं हरिश्चन्द्रमभंगवाचम्,
श्रीरामचन्द्रं रघुवंशसूर्यम्॥
स्थानाभाव से हम यहाँ कतिपय पद्यों का ही समावेश कर सके हैं। आह्निकसूत्रावली आदि ग्रन्थों में इसे पूर्ण रूप से देखा जा सकता है।