उपर्युक्त श्लोक में कितने सरल और संक्षिप्त शब्दों में रूपक द्वारा मातृ-भूमि का चित्र प्रस्तुत किया गया है—यह सहज ही जाना जा सकता है। कुछ लोगों का विचार है कि देश-प्रेम तथा मातृ-भूमि-प्रेम आदि भावनायें पश्चिम की देन हैं और विदेशी सम्पर्क से ही भारत में इनका प्रचार एवं प्रसार हुआ है। उनका कहना है कि काँग्रेस द्वारा, पराधीनता के विरुद्ध उठाए गए जन-आन्दोलन से पूर्व, मातृभूमि या भारत माता की कोई कल्पना भारतीयों के सामने थी ही नहीं, यह बात सत्य से कोसों दूर तो है ही, किन्तु विदेशी प्रभुओं द्वारा प्रसारित उस शरारत पूर्ण घृणित प्रचार का भी अच्छा खासा नमूना है जो वे लोग भारतीय संस्कृति को बदनाम करने के लिए समय २ पर किया करते थे। वन्देमातरम् का राग आलापने वाले आधुनिक देशभक्त तो खास-खास समारोहों पर भारत माता की वन्दना करके फूले नहीं समाते, किन्तु देश में करोड़ों की संख्या में बसने वाले और प्रतिदिन प्रातःकाल नियमपूर्वक भारत माता की वन्दना करने वाले भारत माँ के सच्चे भक्तों की मूक भावना को कितने व्यक्ति जान पाते हैं ? सहस्रों वर्ष पूर्व प्रचलित, सनातनधर्मियों के धार्मिक नित्य कृत्यों में भारतमाता वन्दना का यह विधान, उन लोगों के लिए एक खुली चुनौती है जो मातृभूमि प्रेम को आधुनिक युग की देन बतलाते हैं।