इस पद्य में मातृभूमि के उन सब गुणों का—जो कि एक माता में होने चाहिये—वर्णन बड़े ही सुन्दर ढंग से किया गया है। ३२ अक्षर के छोटे से अनुष्टुब् वृत्त में इतनी सरलता से इतने गम्भीर अर्थों का समावेश ही इस वन्दना की विशेषता है। प्रथम पाद में भारतमाँ को 'समुद्र वसने' कहा गया है। इसका तात्पर्य जहाँ भारतवर्ष की भौगोलिक सीमा—समुद्र से घिरी हुई–निर्देश करना है, वहाँ भारत माँ की लज्जा-शीलता को भी बतलाना है। सभी पुत्र अपनी माता को बहुमूल्य वस्त्राभरणों से अलंकृत देखकर प्रसन्नता अनुभव करते हैं, यह भी हम सब की हार्दिक कामना होती है कि जननी जैसे गौरवपूर्ण पद पर प्रतिष्ठित कोई भी स्त्री सभी आदर्श गुणों से युक्त होनी चाहिए। उसमें स्त्री सुलभ शालीनता अवश्य हो। वस्त्रों की चर्चा करते हुए कवि ने इस वन्दना में लक्षणा द्वारा भारत माँ की शालीनता को भली प्रकार प्रकट कर दिया है। भारतवर्ष में दूर-दूर तक फैले हुए हरे-भरे वनों उपवनों को वस्त्र न कहकर 'समुद्र' को ही भारत माँ के वस्त्र से उपमित करना भी रहस्य से खाली नहीं है। बहुत प्राचीन समय से ही समुद्र, विदेशी व्यापार की कुञ्जी रहा है। आज भी जिन राष्ट्रों का समुद्र पर अधिकार है वे थैलीशाह बने बैठे हैं। इस 'वन्दना' की रचना के समय, समुद्र, भारत के अधिकार में थे, समुद्रों से होने वाले व्यापार पर उसका पूर्ण अधिकार था, फलतः भारत माँ इन समुद्रों का उपयोग उतने ही प्रेम, सावधानी और चाव से करती थी जितना कि आज भी स्त्रियें अपने बहुमूल्य वस्त्रों का करती हैं। इन वस्त्रों से उसकी लोकोत्तर शोभा होती थी जिसको देखकर विदेशी ईर्ष्या किया करते थे। हम अभागे भारतीयों ने माँ के इन बहुमूल्य वस्त्रों का मूल्य न समझा जिसका परिणाम हमें भोगना पड़ा।
'समुद्र वसने' सम्बोधन से भारत माता को जहाँ सम्भ्रान्त महिला की भान्ति लज्जा गुण से युक्त प्रकट किया गया है वहाँ राष्ट्रीय दृष्टि कोण से, रत्नाकर महोदधि आदि–आज भी 'इण्डियन ओसन' या हिन्द महा सागर नाम से पुकारे जाने वाले–महा समुद्रों को भारत माता के सुतरां संरक्षणीय उपकरण प्रकट किया गया है। आज से अन्यून नौ लाख वर्ष पूर्व विदेशी रावण ने सीता माता की साड़ी को छू डाला था जिसका बदला चुकाने के लिये मानव समाज की कौन कहे, भारत के अर्ध-सभ्य कहे जाने वाले रीछ, बानर और गीध जैसे पशु पक्षियों में तहलका मच गया था, शतयोजन समुद्र का पुल बाँधकर सोने की लंका धूल में मिलादी गई थी, इसी प्रकार पाँच सहस्र वर्ष पूर्व दुर्मार्गी दुःशासन ने द्रौपदी की साड़ी को छूने का दुःसाहस कर डाला था फलस्वरूप कुरुक्षेत्र के मैदान में छत्तीस लाख योधाओं के मुंड कट गए थे।
काश ! दो सौ वर्ष पूर्व, जब विदेशी लुटेरे भारत माँ को समुद्र रूपी साड़ी को अपने स्टीमरों से रौंदते हुए इस देश में घुस आए थे, तब यदि उसके लाडले बेटे जान पाते कि–'उनकी माता की लाज खतरे में है ! विदेशी उसे नग्न करना चाहता है !'—तो उन्हें इतने दिन पराधीनता न भोगनी पड़ती।
श्लोक का दूसरा चरण 'पर्वत-स्तनमण्डले' है। माता, चाहे कितनी भी लज्जाशीला तथा कुलीना हो, किन्तु यदि वह अपने बालक का पोषण नहीं कर सकती, यदि उसके स्तनों में बालक के पोषण के लिए पर्याप्त दुग्ध न हो, तो पुत्र के लिये उस माता का होना न होना बराबर है ! वह पुत्र प्रथम तो जीवित ही नहीं रह सकता, कदाचित् रह भी जाय तो सदा निर्बल ही रहेगा। इस पाद में बतलाया गया है कि भारत माता जहाँ लज्जाशीला है, वहाँ हिमालयादि पर्वत-रूपी उन सुन्दर स्तनों वाली है जिन स्तनों से निकलने वाली गंगा यमुना गोदावरी आदि सहस्रों क्षीर-धारायें देश के चवालीस करोड़ बालकों का पालन पोषण कर रही हैं। इसके बालक, जीवन निर्वाह के लिये अन्य राष्ट्रों की तरह किसी दूसरी धाय की खुराक पर निर्भर नहीं। सभी वस्तुओं में वे स्वाश्रित हैं। यद्यपि विदेशी शासकों की कृपा से पिछले कुछ वर्षों से भारत को विदेशों से अन्न मंगाकर अपनी आवश्यकता को पूरा करना पड़ रहा है, किन्तु इसका कारण, लाखों वर्ग मील कृषि योग्य भूमि का बञ्जर पड़ा रहना है, जिसे दूर करने के लिये देश की जनता सतत प्रयत्न शील है। आशा है इस कमी के दूर होते ही अन्न के लिए भी हम पर-निर्भर न रहेंगे।
इसके अतिरिक्त उक्त विशेषण द्वारा यहाँ यह भी व्यक्त किया गया है कि यदि कभी संसार व्यापी महा-युद्ध के समय शत्रु देशों द्वारा नाका बन्दी का नाजुक अवसर आ पड़े तो अन्यान्य देशों की तुलना में भारत ही एक मात्र ऐसा देश है जो अपने देशवासियों की सभी आवश्यकताओं को पूर्ण कर सकता है। अमेरिका में रुई, कनाडा और आस्ट्रेलिया में गेहूँ, मिश्र और बरमा में मिट्टी का तेल आदि एक दो पदार्थ चाहे कितनी ही मात्रा में क्यों न उत्पन्न होते हों, परन्तु अन्यान्य वस्तुओं के लिये उन्हें दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता है। भारत ही एक मात्र ऐसा देश है जो सब ऋतुओं के अस्तित्व के कारण अपने देशवासियों को खाने को अन्न, पहिरने को वस्त्र और जीवनोपयोगी अन्यान्य सभी पदार्थ प्रभूत-मात्रा में प्रदान कर सकता है। आलंकारिक शब्दों में भारत माता के हिमालय, गौरी शिखर, कंचन जंघा, धवल गिरी, कैलाश आदि ऊँचे स्तन रूप पर्वतों से बहने वाली गंगा, यमुना, सिन्ध और ब्रह्मपुत्र जैसी समुद्र गामिनी पयस्विनी धारायें प्रिय पुत्रों के पोषण करने में सर्वथा समर्थ हैं।
श्लोक के तृतीय चरण में भारत माँ को 'विष्णुपत्नि' शब्द से सम्बोधित किया गया है। भारत-माता का जो काल्पनिक चित्र आज हमारे सामने उपस्थित किया गया है यदि गहन दृष्टि से देखा जाय तो वह अधूरा है। आज हम, सभी राष्ट्रीय कार्यों के प्रारम्भ में—
वन्दे मातरम्।
सुजलां सुफलां शस्यश्यामलाम्॥
आदि गीत द्वारा भारत माता की वन्दना तो करते हैं, किन्तु इस बात को कभी स्मरण नहीं करते कि 'हमारा पिता कौन है ?' आखिर जब हमारी माता है तो कोई पिता भी तो होना ही चाहिए। पश्चिम के नास्तिक देशों में चूँकि 'अनीश्वरवाद' की प्रधानता है इसलिए वे, शूकर कूकरादि पशुओं की भाँति माता मात्र का ही परिचय रखते हैं। संसार में मनुष्य का सब व्यवहार पिता के नाम के साथ ही होता है। स्कूल, कचहरी, नौकरी, चाकरी, गर्ज है—कि जन्म कालीन उल्लेख से लेकर मृत्यु-कालीन खाते पर्यन्त सर्वत्र पिता का नाम ही अनिवार्य रूप से लिखा जाता है। केवल नाने के घर में मातामह की गोद में बैठे बालक को देखकर किसी के यह पूछने पर कि यह बालक किसका है ?, नाना महाशय अपनी लड़की का नाम लेते हुए बालक का परिचय दिया करते हैं। तो क्या परमपिता ईश्वर से पराङ्मुख भारत माता के पुत्र होने का दम भरने वाले ये आधुनिक छोकरे भारतको अपना पितृगृह नहीं समझते हैं ? क्या वे अपने आपको नाना के घर का मेहमान मानते हैं ?
उस दिन विद्यालय में प्रविष्ट होने वाले सभी कुलीन छात्रों ने अपना प्रवेश-पत्र भरते हुए बड़े गर्व के साथ पितृ-नाम का उल्लेख किया, परन्तु जब मुन्नीजान के लड़के से पूछा गया तो वह लज्जानम्रमुख होकर पृथ्वी ताकने लगा। आखिर बाजारु औरत का लड़का पिता का परिचय दे ही क्या सकता है ?
यही हाल मातृ-भूमि के उन लाडले पुजारियों का है, जो पिता को नजरन्दाज करते हुए माँ के ही गुण गा २ कर दुनिया की नजरों में सपूत बनना चाहते हैं। पिता के विषय में अनजान होना बालक की मूर्खता का द्योतक तो है ही, किन्तु माँ के चरित्र पर एक अपरिमार्जनीय लाञ्छन भी है। विदेशी छाया से तैयार हुई हमारी इस काल्पनिक मातृ-वन्दना में भी, न केवल भारत अपितु समस्त विश्व के पिता—ईश्वर—का कोई ध्यान नहीं रक्खा गया है। इस लिये 'वन्दे मातरम्' का यह गान नितान्त अधूरा है।
इसके विपरीत उपर्युक्त पद्य में 'विष्णु-पत्नि !' कहकर जहाँ भारत माता को सौभाग्यवती बनाकर वन्दना की गई है, वहाँ आध्यात्मिक दृष्टि से हमारा, ईश्वर के साथ कितना घनिष्ठ सम्बन्ध है—यह भी भली भाँति दर्शाया गया है। इसके अतिरिक्त वन्दना पूर्वक भूमि स्पर्श करते हुए हम एक सत्पुत्र की भाँति अपने हृदय में विद्यमान मातृ-प्रेम को प्रकट करके अपने कर्त्तव्य का पालन भी करते हैं। इसलिये प्रत्येक भारतीय को, जो कि भारत भू को हृदय से मातृभूमि समझता है, अवश्य ही वन्दना करनी चाहिए।