तिष्ठन् न मूत्रपुरीषे कुर्यात् (पारस्कर गृह्य सूत्र)
अर्थात्—खड़े २ मूत्र पुरीषोत्सर्ग न करे।
डर्विन साहब की पशु से मनुष्य बन जाने की विकासवाद की थ्यूरी में अगर कोई सचाई हो सकती है तो वह यही की आज भी मनुष्य अपनी आदतों और हरकतों में पशुओं के समान है। इतना ही नहीं, शिक्षा सभ्यता सम्पन्न आज के—बीसवीं सदी के—मानव को देखकर तो यह भ्रम होने लगता है कि कहीं अब वह विकासवाद अपनी पूर्णता की सीमा पर पहुँचकर पुनः प्रत्यावर्तन के चक्कर में तो नहीं पड़ गया है और दो हाथ, दो पाँव मन मस्तिष्क बुद्धि वाला मानव, कहीं फिर सींग पूँछ वाला पशु बनने तो नहीं जा रहा है ?
पशुओं को भी मात करने वाले आज के मानव के मर्यादा-शून्य भक्ष्या-भक्ष्य के विषय में हम आगे के पृष्ठों में प्रकाश डालेंगे, यहाँ उसकी मलमूत्रोत्सर्ग की हास्यापद, पशु चेष्टाओं का दिग्दर्शन कराना चाहते हैं। आज स्कूलों में प्रविष्ट होते ही मानो विद्यार्थी को पहिला पाठ यह पढ़ाया जाता है कि वह गधे, घोड़े, बैल आदि पशुओं की भाँति खड़े खड़े ही पेशाब किया करे, यही कारण है कि आज छोटे छोटे बच्चों में भी इस बुरी आदत का सूत्रपात हो गया है और अपने शिक्षित (?) माता पिताओं तथा आचार्यों के इस स्वभाव के अनुकरण में वे कभी पीछे नहीं रहते ऐसा करते हुए भले ही उनके वस्त्र तथा पाँवों पर छींटें पड़ें परन्तु इसके विपरीत करके वे अपनी स्कूली शिक्षा का अपमान नहीं कर सकते ! यह बुरी आदत, शास्त्रीय नियमों की प्रत्यक्ष अवहेलना तो है ही, किन्तु सभ्यता के भी नितान्त प्रतिकूल है। रास्ते बरास्ते की कोई चिन्ता न करते हुए 'या बेशर्मी तेरा आसरा' का सहारा लेकर ऐसे मार्गों पर—जहाँ से दो चार भले आदमी, सम्भ्रान्त महिलाएँ गुजरती हों खड़े खड़े पेशाब करने लग जाना न सभ्यतानुकूल है और न मानवोचित ही।
एक दूसरा इससे भी बढ़ा चढ़ा सम्प्रदाय है, जो शौच जाकर पानी लेने की आवश्यकता ही महसूस नहीं करता। वह तो टुडे-स्मृति के—
द्वित्रिभिः कर्गलैः पश्चाद् गुदं संशोधयेद् बुधः।
न करेण स्पृशेन्नीरं यदीच्छेच्छुभमात्मनः॥
—शुद्धि विधानानुसार दो तीन कागज के टुकड़ों द्वारा गुदा को पोंछ डालना मात्र ही आवश्यक समझता है। जिस मल शोधन के लिए भारतीय चिकित्सा-शास्त्रियों ने गुदा को मिट्टी और पानी द्वारा साफ करने का विधान किया हो, उसको कागज के दो छोटे २ टुकड़े कितना साफ कर पाते होंगे यह तो वही जानें ! यह सब पशुता के लक्षण नहीं तो क्या है ? अभी तक तो सभ्यता तथा शिक्षा की डींग हाँकने वाले यूरोपियनों को ही हम कहते थे कि आज के समुन्नत युग में भी वे बिलकुल जंगली हैं। पेशाब और टट्टी जाने का सलीका भी उन्हें नहीं आता। जानवरों की तरह खड़े २ पेशाब टट्टी किया करते हैं। हाथ धोने की तो उन्हें कतई तमीज ही नहीं, अन्न का उपयोग भी नहीं जानते, किसी तरह कच्चा-पक्का माँस खाकर अपना पेट पालते हैं आदि २ किन्तु आज यहाँ क्या हो रहा है। अच्छे खासे बने बनाये मनुष्य फिर पशु बनते जा रहे हैं–यह कम शोक की बात नहीं है। भगवान् ऐसे लोगों को सुबुद्धि दे कि वे यदि मनुष्य से उन्नति करके देवता नहीं बन सकते तो कम से कम मनुष्य तो बने रहें !