शौचानन्तर विशुद्ध मिट्टी द्वारा हाथ तथा पात्र को माँजकर शुद्ध करना चाहिए। स्मृतिकारों ने लिखा है—
द्वे लिङ्गे मृत्तिके देये गुदे पञ्च करे दश।
उभयोः सप्त दातव्या विट्शौचे मृत्तिकाः स्मृताः॥
अर्थात्—शौच के अनन्तर, २ बार लिंग पर, ५ बार गुदा पर दस बार बायें हाथ में दोनों हाथों में सात बार मिट्टी लगानी चाहिए।
शारीरिक शुद्धि में मिट्टी का उपयोग, भारतीय ऋषियों की गौरव पूर्ण देन है जो सर्वसुलभ होते हुए भी अत्यन्त गुणकारी है। बिना कानी कौड़ी खर्च किये प्राप्त होने वाली इस साधारण सी वस्तु में इतने उपयोगी गुण हो सकते हैं इसका हम विचार भी नहीं कर सक्ते। क्षार की विद्यमानता के कारण मिट्टी सब प्रकार के मल को दूर करने में समर्थ तो है ही, किन्तु वानस्पतिक तत्त्वों के सम्मिश्रण से उसमें रोगों को दूर करने की जो अद्भुत क्षमता है वह अन्यत्र दुर्लभ है। इसी गुण के कारण उसे प्राकृतिक चिकित्सा में मुख्य स्थान प्राप्त हुआ है और अनेक प्रकार के प्रयोगानुभव करके चिकित्सकों द्वारा 'मिट्टी' पर लिखी हुई बहुत सी पुस्तकें प्रकाश में आ चुकी हैं। विश्ववन्द्य महात्मा गांधी तो इसकी खूबियों के इतने कायल थे कि वह प्रायः सभी प्रकार के रोगों में मिट्टी की पट्टी तथा उसके लेप का प्रयोग किया करते थे। ऐसी दशा में जब कि आभ्यन्तरिक शुद्धि के लिए मिट्टी का सफल प्रयोग सिद्ध हो चुका है तब बाह्य शारीरिक शुद्धि के लिए उससे अधिक उपयुक्त अन्य कोई वस्तु हो सकती है—यह कहना नितान्त कठिन है।
आज हम काम काज की जल्दी में, या शास्त्रीय वचनों पर अश्रद्धा के कारण स्मृतिकारों की उपर्युक्त व्यवस्था पर ध्यान नहीं देते। मिट्टी द्वारा लिंग गुदा शोधन की तो कौन कहे, हाथों पर भी जैसे तैसे एक दो बार मिट्टी लगाई, दो चार कुल्ले किये कि छूमन्तर में ही शुद्धि हो गई। देहात में रहने वाले अनपढ़ भाइयों की तो बात छोड़ दीजिए, वे तो शारीरिक सफाई के महत्त्व से नितांत अपरिचित ठहरे, शहर में रहने वाले उन पढ़े लिखे बाबुओं का—जिन्होंने कि स्कूल में न जाने सफाई के बारे में कितनी पुस्तकें पढ़ २ कर फाड़ डाली हैं और न जाने कितने 'सफाई सप्ताह' मनाये हैं—भी यही हाल है।
सुजाक गर्मी बवासीर भगन्दर आदि भयङ्कर बीमारियों में कराहना, डाक्टरों की जेब भरना और अन्त में अकाल में ही कालग्रसित हो जाना तो लोग अच्छा समझते हैं किन्तु स्मृतिकारों का यह लिंग गुदा हस्त आदि का शोधन विधान उनके लिये सिरदर्द बन जाता है। यदि वे प्रति दिन दो चार मिनट के लिए इस ओर ध्यान दे लिया करें तो शारीरिक यन्त्र के इन पुर्जों की समुचित सफाई हो जाने से उपरोक्त बीमारियों का कोई डर ही न रहे। हाथों की सफाई के प्रोग्राम में तो पाँच-सात मिनट का समय अवश्य दिया जाना चाहिए, क्योंकि सभी लोग इस बात से अच्छी तरह परिचित हैं कि वही हाथ शौचालय की परिधि से बाहर निकल कर कुछ देर बाद सभी खाद्य वस्तुओं को स्पर्श करते हैं। दुर्भाग्य से यदि उनकी भलीभाँति सफाई न हो तो वह मल, उस खाद्यसामग्री के साथ हमारे शरीर में जाकर, कितने ही रोगों की उत्पत्ति का कारण बन सकता है।
इस विषय में हमें प्रत्यक्षवाद का ही आश्रय नहीं लेना चाहिये क्योंकि प्रत्यक्ष में तो, यदि बिना मिट्टी के साधारण जल से हाथ धो लिए जाएँ, तो भी वे उतने ही साफ दिखाई देंगे जितने मिट्टी से साफ करने पर। मल के उन दूषित कीटाणुओं को, हम सूक्ष्म दर्शक यन्त्र (दुरबीन) की सहायता से ही भलीभाँति देख सकते हैं, अन्यथा नहीं। तब उनके अस्तित्व के प्रमाणित होने की दशा में, क्या हमारा यह कर्तव्य नहीं कि उनसे बचने के लिए हम भारतीय शारीरिक वैज्ञानिकों द्वारा निर्धारित नियमों का आदर के साथ पालन करें।
इधर कुछ दिनों से धार्मिक विधानों के विरुद्ध पश्चिम की ओर से जो क्रांति की प्रबल बाढ़ आई है, उसमें अन्य वस्तुओं के साथ बेचारी मिट्टी भी बह गई और उसके स्थान में बाबू लोगों के हाथों में साबुन नजर आने लगी है। अब तक तो उसका प्रयोग नहाने कपड़े धोने वगैरह के काम में होता था अब शौच के हाथ धोने में भी उसका प्रयोग होने लगा है। नव प्रयोग की इस दौड़ में सबसे आगे वे लोग हैं जो भारत भूमि से अनन्य प्रेम रखने का दावा करते हैं किन्तु जिन्हें यहाँ की प्रायः प्रत्येक वस्तु से—यहाँ तक की मिट्टी से भी–सख्त नफरत है। वे मिट्टी से हाथ धोना शान और सभ्यता के प्रतिकूल समझते हैं। इसे हम उन लोगों की भूल के सिवाय और क्या कह सकते हैं ?
विशुद्धि करण के विषय में यदि साबुन और मिट्टी की तुलना की जाय तो आप देखेंगे कि सर्व सुलभ तथा सूक्ष्मातिसूक्ष्म मलीय अंश का शोधन करने में समर्थ होने के कारण मिट्टी का जो महत्त्व हो सकता है वह साबुन का नहीं। मिट्टी, क्षार और रूक्ष होती है, साबुन क्षार और स्निग्ध। विशुद्धि करण में सर्वदा विजातीय पदार्थ का ही प्रयोग लाभप्रद होता है। पित्त की प्रधानता के कारण मल के अन्दर एक प्रकार का लेस=चिकनाई का अंश होता है। पानी द्वारा हाथ धो लेने पर भी उस चिकनाई का सूक्ष्मांश हाथ में लगा ही रह जाता है। उस लेस को दूर करने के लिये मिट्टी जैसी क्षार और रूक्ष तत्त्व वाली वस्तु का ही प्रयोग होना चाहिए। साबुन में क्षार=मैल को उखाड़ने की सामर्थ्य—तो है किन्तु वह, तेल आदि चिकनी वस्तुओं के साथ मिला हुआ है। फलतः वह सजातीय होने के कारण हाथ में लगे हुए स्निग्ध मलांश को साफ करने में कैसे समर्थ हो सकता है ? आपने देखा होगा कि यदि कपड़े पर तेल का दाग पड़ जाता है तो वह साबुन से नहीं उतरता किन्तु छानस वगैरह से साफ किया जाता है। इसलिए मिट्टी से परहेज करने वाले साबुन से हाथ धोयें और शौक से धोयें, परन्तु वह इस भुलैय्या में न रहें कि आज के कथित उन्नत युग ने मिट्टी के मुकाबले में वस्तुशोधन के लिए कोई नवीन आविष्कार किया है !
मिट्टी का प्रयोग करने वाले सज्जन भी इतना ध्यान अवश्य रक्खें कि वह मिट्टी कहाँ से ली जाय। सभी स्थानों की मिट्टी शोधनकारक हो, ऐसी बात नहीं है। अपवित्र और गन्दे स्थान की मिट्टी लाभ पहुँचाने की अपेक्षा हानिकारक होती है। भला जो मिट्टी सूखे हुए मल से ही बनी हो वह हाथों को क्या पवित्र करेगी ? इसलिये महर्षियों ने इसकी भी व्यवस्था की है, यथा-
अन्तर्जलाद् देवगृहाद्वाल्मीकान्मूषकगृहात्।
कृतशौचस्थलाच्चैव न ग्राह्याः पञ्चमृत्तिकाः॥
अर्थात्—जल के अन्दर से, मन्दिर में से, बाबी एवं चूहे के बिल में से और शौच लघुशङ्का आदि के अपवित्र स्थान से मिट्टी न लेनी चाहिये।
यह सभी व्यवस्था साभिप्राय है। पानी में पत्थर कंकर काँटा आदि न जाने क्या २ पड़ा रहता है, विविध प्रकार के कीटादि भी होते हैं इसलिए वहाँ से मिट्टी निकालना खतरे से खाली नहीं। सभी दर्शनार्थी यदि मन्दिर में से ही मिट्टी खोद २ कर उससे पात्र स्वच्छ करके शिवजी पर जल चढ़ाने लग जाय तो समझ लीजिए वह शिवालय तो चन्द दिनों में खण्डहर ही बन जाएगा। पहिले मिट्टी जायगी, फिर ईंटें उखड़ेंगी और अन्त में ...... । बाबियों और बिलों में प्रायः सर्पादि भयङ्कर जन्तु रहा करते हैं सो वहाँ से मिट्टी लेना कभी बहुत महँगा पड़ सकता है, मिट्टी लेते हुए यदि एक बार भी अंगुली में नाग देवता ने फूँक मारदी तो फिर आप भी मिट्टी ही बन जाएँगे। शौचस्थलादि के बारे में तो ऊपर पर्याप्त लिखा जा चुका है। आशा है इतने से इस सम्बन्ध की शङ्काओं का यथेष्ट समाधान हो सकेगा और हम शास्त्रनिर्दिष्ट विधि के पालन द्वारा स्वास्थ्य लाभ कर सकेंगे।