मलमूत्र त्याग और शुद्धि के सम्बन्ध में शास्त्र में कुछ विशेष नियम भी लिखे हैं आस्तिक जनता उन अतीव उपयोगी नियमों का पालन करके अपने स्वास्थ्य को सुस्थिर रख सके एतदर्थ हम उन्हें भी यहाँ लिखते हैं, तद्यथा—

(क) न सोपानत्को मूत्रपुरीषे कुर्य्यात् (आचारादर्श)
(ख) न गच्छन्नापि च स्थितः (मनु)
(ग) नानन्तवासा कुर्य्यात् (शंखलिखित)
(घ) यथासुखमुखः कुर्य्यात् (मनु)
(ङ) यावत्साध्विति मन्येत तावच्छौचं विधीयते।
प्रमाणं द्रव्यसंख्या वा न शिष्टैरुपदिश्यते।
(देवल)

अर्थात्—(क) जुर्राब, डोरे बन्धा फुल बूट, पहिनकर मलमूत्र का त्याग नहीं करना चाहिए। (ख) चलते चलते और गुदा के सहारे बैठकर या खड़े २ (ग) बहुत से कपड़ों से लदे हुए मलमूत्र का त्याग नहीं करना चाहिये। (घ) वायु की गति और स्थान की बनावट के कारण जिस दिशा की ओर मुख करके बैठने में सुविधा हो वैसे बैठकर मलमूत्र का त्याग करे (ङ) जब तक मन ठीक २ न माने तब तक जल मृत्तिका आदि के प्रयोग से शुद्धि करनी चाहिए। कितनी मिट्टी, कितना जल और कितनी बार ? यह नाप तोल शिष्ट सम्मत नहीं।

उपर्युक्त नियमों के लाभ स्वयं व्यक्त हैं, जुर्राब और सभ्य समाज में निरन्तर पहिने जाने योग्य जूते पहिने मलमूत्र का त्याग करने से अवश्य ही मलमूत्र और जल की छींटों से उनके सन जाने का अनिवार्य अवसर है इसलिए प्रायः घिसे टूटे पुराने छीतर केवल टट्टी के लिए नियत रहते हैं। चलते फिरते और खड़े होकर किंवा गुदा के बल बैठकर मलमूत्र का त्याग भली प्रकार हो ही नहीं सकता। योरपीन ढंग की ऊँची उठी टट्टियों (कमोड) का प्रसार और खड़े २ पेशाब छोड़ने की आदत मिस्टर कुतुबुद्दीन के चेले चाटों को ही शोभा देती है। बहुत से कपड़ों से लदे २ टट्टी में तशरीफ ले जाना निस्सन्देह मकड़ी की भाँति अपने तने जाल में स्वयं उलझे रहने के बराबर है। खुले जंगलों में वायु की प्रगति के विचार से अमुक दिशा की ओर मुख करने का नियम पालनीय और उपादेय है परन्तु शहरों की टट्टियों में अगत्या सुविधानुसार 'यथा-सुख-मुख' बैठना ही स्वाभाविक है। खोवा, खीर और मैदे के बने पदार्थ खाने से कभी २ कोष्ठबद्धता के कारण अपच मल, गुदा और हाथ से ऐसा संश्लिष्ट होता है कि जिसे दूर करने के लिए अधिक बार जल मिट्टी का प्रयोग करने की अनिवार्य आवश्यकता रहती है, सो शुद्ध हो जाने की कसौटी तुले नपे जल मिट्टी को उतनी बार लगाना नहीं—किन्तु (मनस्तोष) की अवधि ही नियत की जा सकती है।

(क) वसाशुक्रमसृङ् मज्जा मूत्रविट्कर्णविण्नखाः।
श्लेष्माश्रुदूषिकास्वेदा द्वादशैते मला नृणाम्॥

(ख) आददीत मृदोपश्च षट्सु पूर्वेषु शुद्धये।
उत्तरेषु च षट्स्वद्भिः केवलाभिर्विशुद्ध्यति
(बौधायन)

अर्थात्—(क) (१) चर्बी, (२) वीर्य, (३) रुधिर, (४) मज्जा, (५) मूत्र, (६) विष्ठा,—(७) कान का मैल, (८) नाखून, (९) कफ, (१०) आँसू (११) आँख की ढीढ और (१२) पसीना ये बारह मल मनुष्य के होते हैं। (ख) इनमें पहिले ६ मलों को साफ करने के लिए जल मिट्टी दोनों का प्रयोग आवश्यक है। अन्तिम छः मल केवल जल के द्वारा ही शुद्ध हो जाते हैं।

अरण्येऽनुदके रात्रौ चौरव्याघ्राकुले पथि।
कृत्वा मूत्रपुरीषं च द्रव्यहस्तो न दुष्यति
(बृहस्पति)

अर्थात्—जंगल में, जल रहित मरुभूमि में, रात्रि के समय चोर और बनेले हिंसक पशुओं के खतरे वाले मार्ग में, हाथ में सामान सँभाले २ मलमूत्र का त्याग करने पर किंवा बिना धुले हाथों उठाई हुई वस्तु अशुद्ध नहीं होती। ऐसे आपद्धर्म काल में केवल सूखी मिट्टी मलने से ही, हाथ शुद्ध समझने चाहिये और अपने स्थान पर पहुँचकर शुद्धि कर लेनी चाहिए।