जड़ी बूटियों एवं वनस्पतियों के गुणावगुणों की खूब छानबीन तथा उनका प्रयोगात्मक अध्ययन करके ही प्राचीन शास्त्रकारों ने दातुन के व्यवहार में आने योग्य वृक्षों का निर्धारण किया है। निम्नलिखित वनस्पतियें इसके लिये प्रशस्त समझी जाती हैं, यथा—

करञ्जोदुम्बरौ चूतः कदम्बो लोध्रचम्पकौ।
बदरीति द्रुमाश्चैते प्रशस्ता दन्तधावने॥

अर्थात्—करञ्ज, गूलर, आम, कदम्ब, चम्पक और बेर यह वृक्ष दन्तधावन के लिये प्रशस्त हैं। इनके अतिरिक्त कीकर, नीब आदि का प्रयोग सुलभ तथा लाभकारी भी है। खदिर (खैर) का तो नाम ही कोषकारों ने 'खदिरो दन्तधावन' कहकर दातुन के लिये उसकी उपयुक्तता का समर्थन किया है।

इनमें से किसी भी वृक्ष की दातुन प्रतिदिन नियम पूर्वक प्रातःकाल अवश्य करनी चाहिए। दन्तधावन के समय जल का पात्र समीप में होना चाहिये। यदि किसी नदी या तालाब का किनारा हो तो सबसे अच्छा किन्तु जल स्वच्छ तथा निर्मल हो। बीच २ में कुल्ला अवश्य करते रहना चाहिये जिससे दाँतों से उतरने वाला मल साफ होता रहे और अन्त में ठण्डे जल से मुख तथा नेत्रों को खूब धोना चाहिये। ऐसा करने से आँखों की गर्मी शान्त हो जाती है, दृष्टि मन्द नहीं होती और न कोई नेत्र रोग ही होता है। यदि साधारण जल की अपेक्षा आमले या भिल्ल से मिश्रित कषाय जल का उपयोग किया जाय तो वह और भी लाभकारी हो सकता है, जैसा कि 'चर्यामंजरी' में बतलाया गया है—

भिल्लोदककषायेण तथैवामलकस्य वा।
प्रक्षालयेन्मुखं नेत्रे स्वस्थं शीतोदकेन वा॥


विदेशी लोगों की देखा देखी आज भारत में भी टूथपेस्ट का अधिकाधिक प्रचार हो रहा है। ऐसा ज्ञात होता है, मानो विदेशी प्रभु अन्य बपौतियों के साथ २ यह घृणित वस्तु भी काले साहबों को उत्तराधिकार में सौंप गये हैं और इसकी रक्षा तथा प्रचार उनका परम कर्त्तव्य है। विशुद्ध हरी ताजी बनस्पति को छोड़कर एक ऐसी वस्तु को—जिसके विषय में हम कुछ भी नहीं जानते कि उसका निर्माण किन-किन वस्तुओं से और कब हुआ है—बिना सोचे समझे मुँह में डाल लेना कहाँ की बुद्धिमत्ता है ? फिर वह बुरुश जिससे रोज दाँत साफ किये जाते हैं, मैल को अपने अन्दर जज्ब करके इतना दूषित हो जाता है कि वह दाँतों को ऊपर से साफ करता हुआ भी उनके अन्दर पायरिया के जर्म्स छोड़ देता है और थोड़े ही समय में दाँतों की जड़ से सफाई हो जाती है। जहाँ, परिवार के सभी व्यक्ति उस एक बुरुश से ही दाँतों की सफाई करते हों, वहाँ तो समझिये उन लोगों के विनाश में अधिक समय नहीं। भिन्न-भिन्न प्रकृति के पाँच व्यक्ति—जिनमें कई शारीरिक व्याधि ग्रस्त भी हो सकते हैं, एक ही चीज को बारी २ से मुँह में डालने के बाद स्वास्थ्य की कामना करें तो इससे अधिक आश्चर्य की बात क्या हो सकती है ?

टूथपेस्ट जैसी अपवित्र और महँगी वस्तु का प्रयोग यूरोप अमेरिका जैसे धनी देशों में ही शोभा दे सकता है और उन ही व्यक्तियों के लिये लाभकारी भी हो सकता है जो हर सप्ताह के बाद बुरुश को बदल डालें। हमारे इस गरीब देश में ऐसी प्रथा का पनपना, देश का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है। जहाँ ७५ प्रतिशत जनता दोनों जून भरपेट भोजन भी न प्राप्त कर सकती हो वहाँ बिना मूल्य प्राप्त होने वाली वस्तु के स्थान में,—एक ऐसी वस्तु के प्रचलन का प्रचार करना—जिसके लिये कि कीमत चुकानी पड़े, कहाँ तक न्याय्य हो सकता है ?

यह कहा जा सकता है कि आज के संकुल देश काल में दातुन सब समय में सुलभ नहीं है और विशेषकर शहरों में रहने वाली जनता–जो कि करोड़ों की संख्या में है—यदि टूथपेस्ट या पाउडर का प्रयोग न करे तो काम नहीं चल सकता, परन्तु हमें यह भली-भाँति समझ लेना चाहिये कि ऐसी दशा में हमारे सामने दो ही मार्ग हैं—या तो हम स्वयं अपने हाथों से तैयार किये हुए मंजन पाउडर वगैरह का प्रयोग करें, या फिर नमक और तेल का प्रयोग किया जाय। चुटकी भर नमक में दो बूँद सरसों का तेल डालकर उससे दाँतों को साफ करना, सौ टूथपेस्ट या पाउडरों के मुकाबले में अधिक लाभप्रद सिद्ध हो सकता है। यह योग दाँतों की सभी खराबियों के लिये अनुभूत चिकित्सा के तौर पर सम्पूर्ण देश में प्रयोग किया जाता रहा है। टूथपेस्ट का प्रयोग करने वाले सज्जन इसे अपनाकर व्यर्थ व्यय से बच सकते हैं। नमक और तेल दोनों ही हमारे खाद्य हैं यदि उनका कुछ अंश अन्दर चला भी जाय तो कम से कम किसी हानि की सम्भावना तो नहीं है, जबकि टूथपेस्ट में पड़ने वाली वस्तुओं के विषय में ऐसी कोई गारन्टी नहीं दी जा सकती। पवित्रता तथा अपवित्रता के दृष्टिकोण से हमने इस प्रश्न को बिलकुल स्पर्श नहीं किया है, क्योंकि हम समझते हैं कि जिसने किसी वस्तु को असली रूप में जाने बिना ही उसे मुँह में डाल लिया है उसका पवित्रता सम्बन्धी विचार तो पहिले ही समाप्त हो चुका है इसलिये हमने स्थूल दृष्टिकोण से ही इस प्रश्न को परखा है।


दाँतों का सम्बन्ध चूँकि समस्त शरीर के साथ है इसलिये बहुत सी शारीरिक व्याधियों की दशा में दातुन नहीं करनी चाहिये। ऐसा करने से वह शारीरिक व्याधि बढ़ जाती है और करने वाले को लाभ की बजाय हानि उठानी पड़ती है। आयुर्वेद में बतलाया गया है कि—

मुखस्य पाके शोथे च कर्णरोगे नवज्वरे।
शिरोरुजार्दिते श्रान्ते नेत्ररोगे मदात्यये।
तृषिते चार्दिते कण्ठे रोगे ताल्वोष्ठजे गदे॥
जिह्वामये दन्तरोगे श्वासकासावमीषु च।
पानात्यये तथा जीर्णे मूर्च्छायां दुर्बले तथा।
हिक्कारोगार्दिते जन्तौ नेष्यते दन्तधावनम्॥

अर्थ—मुख में छाले पड़े हुए हों या सूजन हो, कानों में पीड़ा हो, नया बुखार, शिर दर्द, नेत्र रोग, प्यास आदि के समय, गला, तालु ओष्ठ जिह्वा आदि की बीमारी में, दन्त रोग में, खाँसी और अजीर्ण के समय, शारीरिक दुर्बलता में, मृगी में, और हिक्का रोग में मनुष्य को दातुन नहीं करनी चाहिये।