स्वास्थ्य की दृष्टि से आज हमारा देश बहुत पिछड़ा हुआ है। उस भारत में जहाँ कि—'नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः'—का घन गम्भीर वेदघोष देशवासियों को शारीरिक तथा आत्मिक बल सम्पादन की प्रेरणा देता था, जिस देश में पुरुष, पूर्णायु प्राप्त करने से पहिले मृत्यु को नहीं प्राप्त होते थे और देश में मृत्यु, अज्ञात एवं अनिवार्य दैवीशक्ति न होकर ईश्वरीय नियम के अधीन उचित समय पर होने वाली घटनामात्र थी ! आज, धन्वन्तरि चरक और सुश्रुत के उस देश में ५० प्रतिशत नौनिहाल बालक जन्मते ही १० दिन के अन्दर प्रकाश में ही काल के गाल में समा जाते हैं। ५ वर्ष की अवस्था तक मरने वालों की संख्या ६० प्रतिशत है और शेष जो रहते हैं वह इतने निर्बल होते हैं कि उन्हें सदा डाक्टरों की शरण लेनी पड़ती है।

इस अभागे देश में प्रतिवर्ष १० लाख व्यक्ति क्षय के ग्रास बन जाते हैं और जीवित पुरुषों में भी ९० प्रतिशत स्त्री पुरुष, धातु सम्बन्धी रोगों में फँसे रहते हैं। 'जीवेम शरदः शतम्' की प्रार्थना करने वाले भारतीय की औसतन आयु, आज केवल २३ वर्ष की है। आज, उसे जवानी के प्रारम्भ में ही बुढ़ापा आ घेरता है, उसे ज्ञात भी नहीं होता कि कब यौवन आया और चला गया। २०, २५ वर्ष की अवस्था में, जब वह होश सँभालता है तो अपने को, जर्जर शरीर, गाल अन्दर को धँसे हुए, आँखों पर चश्मा चढ़ाये, शिर के श्वेत बालों से सुशोभित, थोड़े से ही परिश्रम से हाँफ जाने वाले 'वृद्ध' के रूप में ही पाता है।

हमारी स्वास्थ्य सम्बन्धी इस दुर्दशा में अन्य बहुत से कारण तो हैं ही, किन्तु व्यायाम का अभाव भी एक कारण है। यह क्या कम दुख का विषय है कि हमें दुनिया के अन्य सब कामों को करने का तो अवकाश है, किन्तु व्यायाम के लिये आध घण्टे का समय नहीं दे सकते। आज प्रत्येक व्यक्ति—चाहे वह बूढ़ा हो या जवान—के सम्मुख यह प्रश्न है कि दिनानुदिन ह्रास को प्राप्त होती हुई अपनी मानव पीढ़ी को क्या इसी प्रकार विनाश की ओर बढ़ने दिया जाय ? यदि भारतीय जनता दूसरा मार्ग अपनाना चाहती है तो उसे पीछे लौटना होगा। उसे एक बार फिर चरक की पाठशाला में बैठकर पढ़ना होगा—

धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्।

अर्थात्—आरोग्य—अच्छा स्वास्थ्य ही धर्म अर्थ काम मोक्ष इन चारों का मूल है।

हमें हर्ष है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के शुभ प्रयत्नों से भारतीय जनता में पुनर्जागरण की भावना उत्पन्न हो रही है। उसके सदस्य दैनिक चर्या के नियमानुसार प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर मातृ वन्दना पूर्वक सामूहिक व्यायाम में भाग लेते हैं और भारतीय व्यायाम पद्धति से व्यायाम करते हैं यह शुभ चिह्न है। लोगों को चाहिये यदि वे घर पर नियम पूर्वक व्यायाम नहीं कर सकते तो ऐसी संस्था में भाग लेकर ही अपनी स्वास्थ्य सम्पत्ति की रक्षा करें।