अभ्यङ्गमाचरेन्नित्यं स जराश्रमवातहा।
दृष्टिप्रसादपुष्ट्यायुः स्वप्नसुत्वक्त्व-दार्ढ्यकृत्।
शिरःश्रवणपादेषु तं विशेषेण शीलयेत्।
(वाग्भट-सूत्र स्थान अध्याय २)

अर्थात्—प्रतिदिन तेल मालिश करनी चाहिये इससे बुढ़ापा थकावट और वातजन्य रोगों का नाश होता है। दृष्टि बढ़ती है शरीर पुष्ट होता है। आयु बढ़ती है नींद खूब आती है, त्वचा सुन्दर और दृढ़ हो जाती है। शिर कान और पाँवों की तली में विशेषतया मालिश करनी चाहिये।

यदि आप अणुवीक्षण यन्त्र (खुर्दबीन) की सहायता से अपने शरीर को देखें तो आपको यह जानकर बड़ा आश्चर्य होगा कि प्रकृति ने इसे जालीदार वस्त्र की तरह इतना झीना बुना है कि आप इसमें कठिनता से सुई की नोक के बराबर भी इतना स्थान नहीं प्राप्त कर सकते जहाँ छिद्र न हो। हमारे शरीर में असंख्य छिद्र हैं जिन्हें रोम कहा जाता है। यह एक प्रकार की छोटी-छोटी नालियाँ हैं जो प्रतिक्षण शरीर की दूषित वायु और मल को प्रस्वेद तथा गैस के रूप में बाहर फेंककर और विशुद्ध वायु को अन्दर पहुँचाकर शरीर को जीवित रखने में सहायक सिद्ध होती हैं।

शारीरिक विज्ञान में बतलाया गया है कि हमारे रक्त में (१) लाल (२) श्वेत और (३) सूक्ष्म, तीन प्रकार के रक्त कण या जीवित रक्त कीट होते हैं जिनके ऊपर हमारा जीवन निर्भर है। इन्हें जीवित रहने के लिये विशुद्ध जल वायु और उपयुक्त भोजन सामग्री की उतनी ही आवश्यकता है जितनी कि हमें। प्रकृति इस आवश्यकता की पूर्ति इन रोमों द्वारा करती है। नाक द्वारा हम इतना वायु अन्दर नहीं फेंक सकते जितना कि इन रक्त कीटों को जीवित रखने के लिये अपेक्षित है। यह कार्य इन रोमों द्वारा होता है। यदि किसी मनुष्य के शरीर पर तारकोल या राल आदि अन्य किसी ऐसी वस्तु का लेप कर दिया जाय जिससे यह रोम बन्द हो जायें तो आप देखेंगे वह व्यक्ति थोड़ी देर में छटपटाने लग जाएगा और यदि वह लेप न उतारा जाय तो उसका मर जाना भी असम्भव नहीं होगा।

अभ्यङ्ग अथवा तैल मर्दन त्वचा के इन्हीं रोमों को स्वच्छ एवं कार्यक्षम करने का ऐसा प्राकृतिक साधन है जिसका आविष्कार हजारों वर्ष पूर्व शारीरिक विज्ञान प्रणेता भारतीय महर्षियों ने किया और जन-स्वास्थ्य को दृष्टि में रखते हुए उसे दैनिक-चर्या का एक अङ्ग माना। स्वास्थ्य एवं सौन्दर्य के लिये तो अभ्यङ्ग का प्रयोग है ही किन्तु रोग चिकित्सा के तौर पर भी तैल मालिश के सफल प्रयोग हुए हैं और आज भी भारत के अपठित देहातों में, गुम चोट, विविध प्रकार के दर्दों, त्वचा के रोगों और सूजन आदि पर इसका अचूक प्रयोग किया जाता है। यूरोप के लिये अवश्य यह एक नई चीज है, आज से लगभग १०० वर्ष पूर्व हैनृकलिङ्ग (स्वीडन) तथा डा० मेजर (हालैंड) आदि चिकित्सकों के अनुसन्धान से ही वहाँ के निवासियों को इसकी महत्ता का पता चला और वे इस का प्रयोग करने लगे। अस्तु,