आयुर्वेद की दृष्टि से तैल की उपयोगिता घृत से कुछ कम नहीं है जो शक्तिशाली पौष्टिक तत्त्व घृत में पाए जाते हैं अन्यून वे ही सब तेल में भी यथेष्ट मात्रा में मिलते हैं। यही नहीं किन्तु महर्षि चरक ने तो—'घृतादष्टगुणं तैलं मर्दने न तु भक्षणे'—लिख कर तैल में घृत से आठ गुणा ज्यादा शक्ति को स्वीकार किया है। अन्तर केवल यही है कि घृत, जहाँ खाया जाने के उपरान्त गुणकारी होता है वहाँ, तेल, मालिश करने से। आज के इस कंगाल युग में जबकि विशुद्ध घृत, दुग्धादि का सर्वथा अभाव है, चिकनाई (फैट्स) की इस कमी को यदि तेल मर्दन द्वारा दूर किया जाय तो लोगों का स्वास्थ्य पर्याप्त उन्नत दशा को प्राप्त कर सकता है और खुजली दाद फोड़े फुन्सी एक्जीमा आदि त्वचा सम्बन्धी बीमारियें—जो कि खुश्की और गर्मी के कारण उत्पन्न होती हैं—सर्वथा शान्त हो सकती हैं। तैलमर्दन का वास्तविक रहस्य तो त्वचा को कोमल, नसों को स्फूर्तियुक्त और रक्त को गतिशील बनाने में है। त्वचा के रोम जितने स्वच्छ होंगे वे उतनी ही तत्परता से वायु के आदान-प्रदान के कार्य को करने में समर्थ हो सकेंगे। यों तो सर्वदा ही वायु में प्राणशक्ति अन्तर्निहित है किन्तु प्रातःकाल की वायु में—सूर्योदय कालीन प्राणशक्ति और चन्द्रमा द्वारा बरसाया हुआ अमृत का अंश भी सम्मिश्रित होता है, इसलिए यदि उस समय नियमपूर्वक तेल मर्दन किया जाय तो शरीर के आरोग्य युक्त होने के अतिरिक्त मनुष्य का दीर्घजीवी होना भी स्वतः सिद्ध है, इसलिए महर्षि चरक ने लिखा है—
स्पर्शने चाधिको वायुः स्पर्शनं च त्वगाश्रितम्।
त्वच्यश्च परमोऽभ्यंगः तस्मात्तं शीलयेन्नरः॥
अर्थात्—चूँकि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए वायु की प्रमुख आवश्यकता है, वायु का ग्रहण त्वचा के ऊपर निर्भर है और त्वचा का दारोमदार मालिश पर है इसलिए प्रतिदिन तेल मर्दन अवश्य करना चाहिए।
मालिश के लिए अन्य तेलों की अपेक्षा विशुद्ध सरसों का तेल सबसे अधिक लाभप्रद है। प्रत्येक अंग पर तेल लगाकर उसे खूब मलना चाहिए। यदि शिर में प्रतिदिन अच्छी तरह तेल मर्दन किया जाय तो सिरदर्द, बालों का गिरना, मस्तिष्क की निर्बलता आदि सभी व्याधियें अपने आप शान्त हो जाती हैं। मालिश करते समय दूसरे तीसरे दिन कानों में भी तेल की बूँद टपका लेनी चाहिए। ऐसा करने से—
न कर्णरोगा वातोत्था न वात्या हनुसंग्रहाः।
नोच्चैःश्रुतिर्न बाधिर्यं स्यान्नित्यं कर्णतर्पणात्॥
अर्थात्—कानों में वातज रोग नहीं होते, फोड़े फुन्सी और जबड़ा संघातका भय नहीं रहता। ऊँचा सुनने और बहरेपनकी व्याधि नहीं होती। कानों के नीचे के हिस्से पर अंगूठे से धीरे धीरे मालिश करनी चाहिए, क्योंकि स्नायुवों का सन्धि स्थान होने के कारण इसके मर्दन का प्रभाव सारे वात संस्थान के ऊपर पड़ता है। पैरों के तलुओं के नीचे धीरे २ मालिश, पाँवों की बीमारियों के साथ २ नेत्र रोगों की भी अद्वितीय महौषध है। ऐसा करने वालों की दृष्टि कभी कमजोर नहीं होती।