शास्त्रों में तिलक धारण भी एक आवश्यक धार्मिक कृत्य माना गया है यथा—

शास्त्रीय स्वरूप

(क) ऊर्ध्वपुण्ड्रं मृदा धार्य्यं, भस्मना तु त्रिपुण्ड्रकम्।
उभयं चन्दनेनैव, ह्यभ्यङ्गोत्सवरात्रिषु॥

(ख) शतं चैका च हृदयस्य नाड्य-
स्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका।
तयोर्ध्वमायन् न मृतत्वमेति,
विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति॥
(कठोपनिषत् २।६।१६)

(ग) स्नानं दानं तपो होमो देवतापितृकर्म्म च।
तत्सर्वं निष्फलं याति ललाटे तिलकं विना॥
ब्राह्मणस्तिलकं कृत्वा कुर्य्यात्संध्याञ्च तर्पणम्॥
(ब्रह्मवैवर्तपुराण ब्रह्मा २६)

अर्थात्—(क) ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक मृत्तिका से धारण करना चाहिये, भस्म का त्रिपुण्ड्र और चन्दन का दोनों प्रकार का तिलक, अभ्यंग और उत्सव रात्री में धारण करना चाहिये। (ख) हृदय की एक सौ एक नाड़ी हैं उनमें से सुषुम्णा नाम की नाड़ी मस्तक प्रदेश के सामने से निकलती है, उसके द्वारा ऊँचे को प्रस्थान करने वाला मोक्ष को प्राप्त करता है, शेष सबका प्राणोत्सर्ग के समय चारों ओर से उपयोग होता है। (ग) स्नान, दान, तप, होम, देव और पितृकर्म्म सब निष्फल होता है यदि मस्तक में तिलक धारण न किया हो। ब्राह्मण को चाहिए कि वह तिलक धारण करके पश्चात् सन्ध्या तर्पण आदि कृत्य करे।

वैज्ञानिक-विवेचन

यद्यपि चन्दन, गोपी चन्दन, सिन्दूर, कुंकुम और भस्म आदि द्रव्यों का भी तिलक लगाया जाता है परन्तु मुख्य तिलक तीर्थों की पवित्र मृत्तिका को स्वच्छ करके जो तैयार किया जाता है—वह सात्विक और अनेक वैज्ञानिक लाभों से परिपूर्ण है, इसीलिए उपर्युक्त शास्त्र प्रमाण में भी उसे ही सर्व प्राथम्य दिया गया है। शुद्ध मृत्तिका में सर्वविध संक्रामक कीटाणुओं के विनाश की अद्भुत शक्ति सभी भौतिक विज्ञानवादी स्वीकार करते हैं, तत्तत् पदार्थों की पूतिगन्ध नामक सड़ाद को दूर करने का एक मात्र साधन='गन्ध गुण' केवल पृथ्वी में ही विद्यमान है।

साबुन, इतर, फिनैल आदि पदार्थ-अपनी उग्रगन्ध के कारण तत्तत् वस्तुओं में क्षणिक स्वच्छता का आभास चाहे प्रकट कर दे, परन्तु वास्तव में यदि सूक्ष्मवीक्षण यन्त्र की सहायता से उन पदार्थों का निरीक्षण किया जाए तो वे मलिन-कीटाणुओं से तथैव क्लिन्न रहते हैं। इसलिए अब तो बहुत से पाश्चात्य विचारक भी यह घोषित करने लगे हैं, कि 'काच और चीनी का प्याला यदि एक बार भी ओठों से 'टच' हो तो मनुष्य के थूक से सहस्रों कीटाणु उस पर जम जाते हैं' पानी से धोने पर या साबुन का प्रयोग करने पर भी वे नहीं मरते, मिट्टी और राख ही उनका समूल नाश करने के लिये सबसे सस्ता और सुलभ पदार्थ है। सो मृत्तिका के अधिक गुण वर्णन न करके हम इतना ही कहना पर्याप्त समझते हैं, कि लेपन द्रव्यों में यह सर्वोत्तम द्रव्य है, फिर यदि वह तीर्थस्थानों की हो तब तो कहना ही क्या ? 'देश वैचित्र्यवाद' के अनुसार तत्तत् तीर्थों की मृत्तिका का सम्मिलित पिण्ड मानो अनेकविध शुचितामय परमाणुओं का पुञ्जीभूत संघात है। उसे विशाल भाल में धारण करने का अर्थ है—मानो हम अपने मस्तिष्क को पुनीत रखने के लिये एक सुदृढ़ प्राचीर तैयार कर रहे हैं। उपनिषद् के पूर्वोक्त प्रमाण में लिखा है कि सुषुम्णा नाड़ी हृदय से सीधी मस्तक के सामने ब्रह्मरन्ध्र में पहुँचती है, ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक मानो ऊर्ध्वगति का संकेत चिह्न है।

यहाँ यह कहने की आवश्यकता नहीं, कि हमारे मन में जो संकल्प उठता है, वह सर्वप्रथम मस्तिष्क की धमनियों में ही प्रकम्पन करता है। मस्तिष्क के प्रकम्पन के अनन्तर ही वह तत्तत् इन्द्रियों को कार्यानुकूल होने को सज्जित करता है। सो हमारा मस्तिष्क जितना विकाररहित होगा, उतना ही हम प्रत्येक बात की वास्तविकता का शुद्ध परिशीलन कर पायेंगे। हमारे ज्ञान-तन्तुओं का विचारक केन्द्र भृकुटी और ललाट का मध्यभाग है। यह प्रायः सभी ने कई बार अनुभव किया होगा, कि जब कभी आवश्यकता से अधिक विचार करने का अवसर पड़ता है तो इसी केन्द्र में वेदना अनुभव होने लगती है। अतः हमारे महर्षियों ने ज्ञान तन्तुओं के केन्द्र-स्थान में ही तिलक धारण करने का विधान किया है। तिलक की महिमा के अविश्वासी लोग भी जब मस्तिष्क वेदना से पीड़ित होते हैं तब वे भी चन्दन उशीर आदि शीतल द्रव्यों का कलल मत्थे पर पोतने के लिये विवश होते हैं। यहाँ यह भी समझ लेना चाहिए कि यों तो शुक्र नामक धातु समस्त शरीर में ही परिव्याप्त है परन्तु उसका उरोज और मस्तक के स्थान से विशेष सम्बन्ध है। इसीलिये युवापन को प्राप्त होने वाले बालकों के स्तनों में ग्रन्थी और मुखमण्डल पर विस्फोटक फुनसियें नवयौवन की प्रथम निशानी समझी जाती है। सो वीर्यसंरक्षा के निमित्त भी भाल-प्रदेशमें शुचितम मृत्तिकाको धारण करना परमावश्यक है।

जयहिन्द

सौभाग्यवश आज 'वन्दे मातरम्' और 'जयहिन्द' का पवित्र घोष आबाल वृद्ध भारतीय की जिह्वा पर विद्यमान है, परन्तु अभी तक भारत के कुछ सपूतों को यह ज्ञान नहीं है, कि जिस भारत या हिन्द की हम वन्दना और जय मना रहे हैं, वह भारत माता एक निर्विशेष मृण्मय पिण्ड ही तो है। फिर यदि हम नित्य उस माता की पवित्र रज अपने भाल पर धारण करके उसके गौरव के सामने नतमस्तक हो तो हमारा यह कृत्य मातृपूजा का ही तो एक सफल प्रदर्शन होगा ! खेद का विषय है कि आज के स्कूल और कालिजों के विद्यार्थी एक ओर तो 'वन्दे मातरम्' और 'जयहिन्द' का घोष करते हैं और दूसरी ओर उसी भारत माता की रज को सम्मान देने वाले व्यक्तियों को देखते ही 'ओल्डफैशन' कहकर नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं। हमें प्रसन्नता है कि मद्रास प्रान्त के सज्जन बड़े-से-बड़े पदों पर अधिष्ठित होते हुये भी बड़े गौरव के साथ तिलक धारण करके केन्द्रीय धारा सभा के अधिवेशनों में जाते हैं, इससे उनका गौरव बढ़ता ही है। क्या हम आशा करें कि अन्य प्रान्त के सज्जन भी मद्रास के इन संस्कृति संरक्षकों का अनुकरण करके भारत के गौरव को चार चाँद लगायेंगे।

मृत्तिका के बाद दूसरा स्थान यज्ञ भस्म का है, कुछ लोग जैसी-तैसी भस्म ही पोत लेते हैं—यह ठीक नहीं, क्योंकि स्मृतिग्रन्थों में ऐसे अनेक प्रमाण विद्यमान हैं जो कि सर्वसाधारण भस्म को निन्द्य सिद्ध करते हैं। अतः यज्ञ भस्म ही लगानी चाहिए।

चन्दन के गुण तो हकीम साहिब से ही पूछ लीजिए ! सरदर्द में वे आपको सन्दल के लेप करने का ही परामर्श देंगे। यह ठीक है, कि सन्दल का घिसना भी सरदर्द ही है परन्तु 'विषस्य विषमौषधम्'—सरदर्दी को दूर करने के लिए डबल सरदर्दी और खरीद लीजिए, सरदर्द शर्तिया दूर हो जायगा।

कुंकुम, हल्दी का ही चूर्ण होता है—जो नीबू के रस में भावित करने से लाल हो जाता है। हल्दी, संयोजक और त्वाच शोधन के लिए सर्वोत्तम पदार्थ है। आयुर्वेद में इसके अनेक गुण लिखे हैं। दाल-साग में इसे इसलिये नहीं डाला जाता, कि अमुक भक्ष्य भोज्य पीले रङ्ग का बन जाए, क्योंकि दूध, रबड़ी, खीर, घेवर, बर्फी, पेड़ा आदि अनेक भक्ष्य भोज्य श्वेत रङ्ग के ही उपयोग में आते हैं। सब्जी आदि में हल्दी का उपयोग उसके संयोजक गुण के कारण ही होता है। अतएव तिलक में कुंकुम के उपयोग से त्वचा शुद्धि और मस्तिष्क स्नायुवों का संयोजन नैसर्गिक कहा जा सकता है।


जेल जाते समय तो बड़े २ कांग्रेसी लीडरों को—फिर चाहे वे मौलाना आजाद या स्वामी श्रद्धानन्द ही क्यों न हों—बड़ी सज-धज के साथ तिलक से विभूषित किया गया। महात्मा गांधी का एक लाल बिन्दी से विभूषित चित्र बाजार में सर्वत्र बिकता है। महामना मालवीय जी का तो शून्य मस्तक चित्र ढूँढना सर्वथा असम्भव ही है। क्या हम अपने राष्ट्र के कर्णधारों से पूछ सकते हैं कि यदि जेल के लिए प्रस्थान करते समय तिलक धारण गौरव की वस्तु है, तो फिर उसे यदि नित्य धारण किया जाय तो उसमें क्या आपत्ति है ? समाचार पत्रों वाले भी तिलक लगाने की जेलकालीन घटनाओं को तो मोटे २ शीर्षक देकर छापते थे, परन्तु अब माधवाचार्य को सतिलक देखकर 'चेमे गोइये' करने लगते हैं, इस 'दुरंगी' का क्या कारण है ?

तिलक केवल भिखमंगे कहे जाने वाले ब्राह्मणों का ही चिह्न नहीं है अपितु भारत में तब तक कोई महाराजा ही नहीं बन पाता था, जब तक कि कोई तिलकधारी पुरोहित राज्याभिषिक्त सम्राट् को तिलक न चढ़ादे। हिन्दू शास्त्रों में तो इस तिलक प्रथा को इतना महत्व दिया गया है, कि राज्याभिषेक समारोह का नाम ही 'राज्य तिलक' पड़ गया।

यवनकालीन विप्लव के समय जितने बलिदान शिखा सूत्र और तिलक की रक्षा के लिए हुए हैं, इतने अन्य किसी उद्देश्य के लिए नहीं। श्रीगुरु गोविन्द सिंह के पिता का अमर बलिदान तिलक यज्ञोपवीत की रक्षा के लिए ही हुआ था यह बात गुरु गोविन्दसिंह जी ने अपने 'विचित्र नाटक' नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ में स्वयं लिखी है। यथा—

तिलक जयूं राखा प्रभु ताका, कीन्हा बड़ा कलू में साका।

कहा जाता है कि अत्याचारी यवन लोग हिन्दुओं के जनेऊ को दाँतों से काट डालते थे और मस्तक पर लगा तिलक चाट लेते थे, इसकी रोक थाम के निमित्त करारा जवाब देने के लिए पंजाब में गुरु रामराय के समय में 'सुथरा' नामक सम्प्रदाय का प्रादुर्भाव हुआ। ये लोग सूवर की तांत का जनेऊ पहिनकर और विष्ठा का तिलक लगाकर यवनों के सामने उन्हें चिढ़ाने के लिए खूब घूमते थे। वे सूवर को अपने मजहब के अनुसार 'हराम' और 'बद' समझकर निकट नहीं आते थे इस प्रकार यवनों के अत्याचार को रोका गया।