जेल जाते समय तो बड़े २ कांग्रेसी लीडरों को—फिर चाहे वे मौलाना आजाद या स्वामी श्रद्धानन्द ही क्यों न हों—बड़ी सज-धज के साथ तिलक से विभूषित किया गया। महात्मा गांधी का एक लाल बिन्दी से विभूषित चित्र बाजार में सर्वत्र बिकता है। महामना मालवीय जी का तो शून्य मस्तक चित्र ढूँढना सर्वथा असम्भव ही है। क्या हम अपने राष्ट्र के कर्णधारों से पूछ सकते हैं कि यदि जेल के लिए प्रस्थान करते समय तिलक धारण गौरव की वस्तु है, तो फिर उसे यदि नित्य धारण किया जाय तो उसमें क्या आपत्ति है ? समाचार पत्रों वाले भी तिलक लगाने की जेलकालीन घटनाओं को तो मोटे २ शीर्षक देकर छापते थे, परन्तु अब माधवाचार्य को सतिलक देखकर 'चेमे गोइये' करने लगते हैं, इस 'दुरंगी' का क्या कारण है ?

तिलक केवल भिखमंगे कहे जाने वाले ब्राह्मणों का ही चिह्न नहीं है अपितु भारत में तब तक कोई महाराजा ही नहीं बन पाता था, जब तक कि कोई तिलकधारी पुरोहित राज्याभिषिक्त सम्राट् को तिलक न चढ़ादे। हिन्दू शास्त्रों में तो इस तिलक प्रथा को इतना महत्व दिया गया है, कि राज्याभिषेक समारोह का नाम ही 'राज्य तिलक' पड़ गया।

यवनकालीन विप्लव के समय जितने बलिदान शिखा सूत्र और तिलक की रक्षा के लिए हुए हैं, इतने अन्य किसी उद्देश्य के लिए नहीं। श्रीगुरु गोविन्द सिंह के पिता का अमर बलिदान तिलक यज्ञोपवीत की रक्षा के लिए ही हुआ था यह बात गुरु गोविन्दसिंह जी ने अपने 'विचित्र नाटक' नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ में स्वयं लिखी है। यथा—

तिलक जयूं राखा प्रभु ताका, कीन्हा बड़ा कलू में साका।

कहा जाता है कि अत्याचारी यवन लोग हिन्दुओं के जनेऊ को दाँतों से काट डालते थे और मस्तक पर लगा तिलक चाट लेते थे, इसकी रोक थाम के निमित्त करारा जवाब देने के लिए पंजाब में गुरु रामराय के समय में 'सुथरा' नामक सम्प्रदाय का प्रादुर्भाव हुआ। ये लोग सूवर की तांत का जनेऊ पहिनकर और विष्ठा का तिलक लगाकर यवनों के सामने उन्हें चिढ़ाने के लिए खूब घूमते थे। वे सूवर को अपने मजहब के अनुसार 'हराम' और 'बद' समझकर निकट नहीं आते थे इस प्रकार यवनों के अत्याचार को रोका गया।