द्विजाति मात्र को प्रतिदिन संध्या करनी चाहिए। स्त्री शूद्र आदि अन्यान्य सभी मनुष्यों को भी अपने २ अधिकार के अनुसार भगवदुपासना करनी चाहिए। वेदादि शास्त्रों में संध्या को नित्य कर्म माना है इसलिए उसके न करने पर प्रत्यवाय होना स्वाभाविक है। शास्त्र कहता है—
(क) अहरहः सन्ध्यामुपासीत (वेद)
(ख) नोपतिष्ठति यः पूर्वां नोपास्ते यश्च पश्चिमाम्।
स शूद्रवद् बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्म्मणः॥
(मनुः २।१०६)
(ग) उत्तमा तारकोपेता मध्यमा लुप्ततारका।
कनिष्ठा सूर्यसहिता प्रातःसंध्या त्रिधा स्मृता॥
(घ) उत्तमा सूर्यसहिता मध्यमा लुप्तभास्करा।
कनिष्ठा तारकोपेता सायंसंध्या त्रिधा स्मृता॥
अर्थात्—(क) प्रतिदिन सन्ध्योपासन करना चाहिये। (ख) जो द्विज प्रातः और सायं सन्ध्योपासन नहीं करता वह शूद्र की भाँति समस्त द्विज कर्मों से बहिष्कार करने योग्य है। (ग) प्रातःकाल की सन्ध्या तारागण के अस्त होने से पूर्व की जाए तो उत्तम है, सूर्य निकलते समय मध्यम और सूर्य के चढ़ जाने पर कनिष्ठ मानी जाती है। (घ) सायं सन्ध्या सूर्य रहते २ की जाए तो उत्तम सूर्य डूबने पर मध्यम और तारे निकल आने पर कनिष्ठ समझनी चाहिये।
सन्ध्या से श्वास क्रिया का नियमन
सन्ध्या हमारी अहोरात्रचर्या का मुख्य अंग है। 'विप्रो वृक्षस्तस्य मूलञ्च सन्ध्या' कहते हुये शास्त्रकारों ने उसे द्विजाति के लिए 'जीवन का मूल' स्वीकार किया है। उसमें लौकिक और पारमार्थिक श्रेय की ऐसी प्रक्रियाओं का सम्मिश्रण है कि यदि उसे स्वास्थ्य, शक्ति, मेधा और दीर्घ जीवन की कुञ्जी कह दें तो अनुपयुक्त न होगा। इससे भी अधिक सन्ध्या का प्रमुख उद्देश्य हमारी उस श्वास प्रक्रिया का नियमन है जो हमारे जीवन का वास्तविक मूल है।
शास्त्र में जैसे भोजनादि की विधि लिखी है, वैसे ही श्वास लेने का भी विधान अंकित है। भगवान् ने सर्वाङ्गपूर्ण मानवपिण्ड में न तो अनावश्यक कोई अंग अधिक लगाया है और नाही न्यून होने दिया है। जिस प्रकार घड़ी की प्रत्येक कील परमावश्यक है, इसी प्रकार मानव-पिण्ड का एक-एक रोम भी परमावश्यक है। यही कारण है कि एक रोम के भी समूल नष्ट हो जाने पर बालतोड़ जैसी भयंकर व्याधि उत्पन्न हो जाती है। ऐसी दशा में विचारणीय होगा कि मनुष्य की नाक में दो छेद क्यों हैं ? अर्थात्—नासिका के मध्य में दीवार सी खड़ी करके उसे दो भागों में क्यों बांटा गया है ? क्या एक ही छेद रहने की हालत में श्वास वायु का गमनागमन सम्भव नहीं था ? कहना न होगा कि इसमें कुछ रहस्य अवश्य है।
प्राकृतिक रीति से मनुष्य को एक अहोरात्र में २१६०० श्वास लेने चाहिये, और वे भी गरमी और सरदी की ऋतु के अनुसार दाएँ वा बाएँ अमुक छेद से अमुक-अमुक व्यवस्था के अनुसार। शास्त्र में लिखा है कि—
षट्शतानि दिवारात्रौ सहस्राण्येकविंशतिः।
एतत्संख्यात्मकं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा॥
(योग चूड़ामणि उपनिषद् ३४।९३)
अर्थात्—एक अहोरात्र में जीव इक्कीस हजार छः सौ बार 'सोऽहम्' मन्त्र का जाप करता है।
स्वरशास्त्र में नाक के दायें छेद का नाम सूर्य और बायें छेद का नाम 'चन्द्रमा' कहा गया है। ये दोनों छेद 'यथा नाम तथा गुण' के अनुसार क्रमशः गर्मी और ठण्डक पहुँचाने के साधन हैं। आज के मानव समाज को यह मालूम भी नहीं कि कब किस नासाछिद्र से श्वास लेना चाहिए। परन्तु हमारे पूर्वज दिन-रात में तीन बार श्वास प्रश्वास क्रिया को ठीक किया करते थे। श्वास प्रश्वास प्रक्रिया की साधना का ही धार्मिक नाम 'सन्ध्या' है। यद्यपि सन्ध्या में आचमन सूर्योपस्थान भगवत्स्मरण आदि आदि अन्यान्य भी कई लाभप्रद अनुष्ठान किये जाते हैं परन्तु सन्ध्या का मुख्य तत्त्व प्राणायाम है। अन्यान्य सब विधियें इसी एक मुख्य तत्त्व की पोषक विधियें हैं।
सन्ध्या से आयुष्य वृद्धि
शास्त्रों में यह बात डिण्डिम घोष के साथ व्यक्त की गई है कि
'ऋषयो दीर्घसन्ध्यत्वाद् दीर्घमायुरवाप्नुयुः' (मनु)
अर्थात्—दीर्घकाल तक सन्ध्या=प्राणायाम के अनुष्ठान से ऋषि लोगों ने दीर्घ आयु को प्राप्त किया।
हम पीछे कह चुके हैं, कि एक स्वस्थ मनुष्य को अहोरात्र में इक्कीस हजार छः सौ श्वास आने चाहिएँ। यदि कोई इससे अधिक श्वास लेता है तो समझो उसी आधिक्य के अनुमान से वह अपनी आयु को क्षीण कर रहा है। किन २ चेष्टाओं से श्वासों की मात्रा अधिक होती है ? अनुभवी योगियों ने इसका भी एक मापदण्ड निश्चित किया है।
स्थितस्य द्वादशश्वासाश्चलतोऽष्टादशः स्मृताः।
चतुर्विंशति सुप्तस्य, त्रिंशद् ग्राम्य-रतस्य च॥
अर्थात्—बैठे बारह, चलत अठारह, सोते जाएँ चौबीस।
मद्य मांस मैथुन सेवन में, श्वास निकलते तीस॥
यहाँ सभी सज्जनों को यह जिज्ञासा हो सकती है, कि कोई भी मनुष्य सर्वथा और सर्वदा बैठा ही रहे यह बात कभी सम्भव नहीं—अन्य रोजगार धन्धे के लिये न सही, कम से कम शरीर यात्रा के लिए आवश्यक-शौच स्नानादि के निमित्त तो दौड़धूप करनी ही होगी, ऐसी दशा में आयुः क्षीण हो जाने के भय से पाषाण प्रतिमा की भाँति निरे निठल्ले पड़े रहने से तो कार्य करते मर जाना कहीं अच्छा है। कहना न होगा कि शास्त्रों ने इस समस्या पर भी पूरा २ विचार किया है। अवश्य ही मनुष्य को शरीर यात्रा के लिए आवश्यक दौड़-धूप करनी चाहिये और नियमानुसार सोना तथा विधिवत् सन्तान भी उत्पन्न करनी चाहिए। निश्चित ही यह सब काम करते हुये श्वासों की मात्रा अधिक होगी परंतु सर्वसाधारण के लिए यह सब अनिवार्य है। ऐसी दशा में श्वासों के आधिक्य के कारण होने वाली आयुष्य की उस क्षति को पूरा करने का अमोघ उपाय महर्षियों ने सन्ध्या=प्राणायाम ढूँढ निकाला था। शरीर यात्रा के निमित्त की जाने वाली अनिवार्य दौड़-धूप जन्य आयुः-क्षीणता की पूर्ति मनुष्य सन्ध्या द्वारा कर सकता है। अर्थात्—अनिवार्य लोकयात्रा में जितने अधिक श्वास प्रश्वास चलेंगे उतने ही त्रिकाल सन्ध्या में प्राणों का नियमन करने के कारण पूरे हो जायेंगे—इस तरह साधारण जीवन बिताने वाले व्यक्ति का भी का आयुःस्तर सौ वर्ष से कम न हो सकेगा। जो व्यक्ति अष्टाङ्गयोग=समाधि का अभ्यास करेंगे वे तो अपने परिश्रम के अनुसार सहस्रायु किंवा यथेच्छ चिरञ्जीवी, स्वच्छन्दमृत्यु अथ च अजर अमर तक हो सकेंगे। जैसा कि हमने अपने अन्य ग्रंथ 'पुराण दिग्दर्शन' के आयुनिर्णय प्रकरण में सिद्ध किया है। इसलिये सन्ध्योपासन दीर्घायुष्य प्राप्ति का प्रथम सोपान है।
सन्ध्या से पारलौकिक लाभ
पूर्वोक्त विवेचना के अनुसार सन्ध्या से जहाँ अनेक रोगों की निवृत्ति, पूर्ण स्वास्थ्य की प्राप्ति और दीर्घायु का लाभ होता है, वहां विधिवत् प्राण त्याग कर सकने की योग्यता प्राप्त हो जाने के कारण पुण्य लोकों की प्राप्ति अथ च मोक्ष पद तक की भी प्राप्ति हो सकती है।
शास्त्रों का यह सर्वसम्मत सिद्धान्त है, कि मानव पिण्ड में जो प्रत्यक्ष नौ छिद्र हैं उनमें उत्तरोत्तर ज्यों-ज्यों ऊपर-ऊपर के छिद्र से मृत्यु के समय प्राण जायेंगे त्यों-त्यों उत्तम लोक की प्राप्ति होगी। शास्त्रवेत्ता पुरुष मुमूर्षु व्यक्ति के अन्तिम प्रयाण को देखकर एक हद तक यह जान सकता है, कि यह प्राणी दुर्गति को प्राप्त होगा या सुगति को ? यदि मृत्यु के समय मुमूर्षु का महामल गिर गया है—जिसकी दुर्गन्ध से सब स्थान ही भर गया है—तो समझ लेना चाहिए कि प्राण गुदा के मार्ग से निकले हैं अतः यह अधोगति को प्राप्त होगा। इसी प्रकार मूत्र निकलने से मूत्रेन्द्रिय द्वारा महा प्रयाण का अनुमान किया जा सकता है, इसे दूसरी कोटि की अपमृत्यु कह सकते हैं। इसी प्रकार मुख खुला रहने से तीसरी कोटि की, नाक से प्राण जाने पर चौथी कोटि की और नेत्र खुले रहने से पाँचवीं कोटि की आदि-आदि मृत्यु समझनी चाहिये।
शास्त्रों में कपाल-स्थानीय 'ब्रह्मरन्ध्र' नामक स्थान को दशम द्वार=गुप्त दर्वाजा बताया है, यदि इससे प्राण निकलें तो वह जीव 'न स पुनरावर्तते न स पुनरावर्तते' के अनुसार मोक्षपद को प्राप्त हो जाता है। इस तत्त्व को एक लौकिक दृष्टान्त द्वारा इस प्रकार समझना चाहिये। जैसे कोई राजा सुदृढ़ दुर्ग बनवाता है, उसमें अनेक बड़े-बड़े द्वार होते हैं, परन्तु एक गुप्त द्वार=सुरंग भी होती है। कभी कोई शत्रु आक्रमण करे, तो दुर्ग में बैठा हुआ राजा शत्रु के प्रहारों को अनेक उपायों से विफल करता हुआ आत्मरक्षा करता है, परन्तु कभी शत्रु का बल अधिक हो जाय और वह दुर्ग को घेरकर छिन्न भिन्न कर डाले और उसमें आग लगा दे, तो दुर्गस्थ राजा किले की रक्षा असम्भव समझकर उसके व्यामोह को छोड़कर सुरंग के गुप्त द्वार से निकल भागता है। यदि मूर्खतावश वह ऐसा न कर सकेगा तो फिर किले के विनाश के साथ उसे स्वयं भी शत्रु द्वारा पकड़ा जानेपर अनेक निगड यातनाओं का भाजन बनना होगा।
ठीक इसी प्रकार जीवात्मा रूप राजा, देह रूप सुदृढ़ दुर्ग में रहता है। मृत्यु रूप शत्रु अनादि काल से इसके पीछे पड़ा है। वह क्षुधा पिपासा रोग आदि अनेक महास्त्रों का प्रयोग करता हुआ इस शरीर रूप दुर्ग को विनष्ट करना चाहता है, परन्तु जीव रूप राजा,—अन्न, जल, औषधि रूप महास्त्रों के प्रयोग से शत्रु के आक्रमण को विफल करता हुआ आत्मरक्षा करता रहता है। अवसर पाकर जब कभी रोग आदि मृत्यु के दूत देह रूप किले को बेतरह घेरकर काबू कर लेते हैं और १०५ डिग्री ज्वर रूप अग्नि किले को भस्मसात् किये डालती है तब यदि जीव रूप राजा देह रूप किले के व्यामोह को छोड़कर दशमद्वार=सुरंगद्वार—कपाल मार्ग से भाग निकले—महाप्रयाण करे—तो फिर वह मृत्यु रूप शत्रु का कैदी न बनकर मुक्त हो जाएगा—जन्म मरण रूप अनेक जेल यातनाओं का भाजन नहीं बनेगा। दुर्भाग्यवश कदाचित् जीव रूप राजा दशम द्वार से आने जाने का अभ्यासी न हो अथवा समय पर चौकड़ी चूक जाए तो फिर समझ लेना चाहिए, कि सुर दुर्लभ मानव शरीर पाकर भी यह हतभाग्य जीव—'पुनरपि जननं पुनरपि मरणम्' के वक्र चक्र में पड़ गया है।
अब पाठकों को स्वभावतः यह जिज्ञासा हो सकती है कि—'दशम द्वार से प्राण जाएँ'—इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमें क्या करना चाहिये ?—इस प्रश्न का विस्तृत समाधान तो प्रसङ्गानुसार श्राद्ध विवेचन प्रघट्ट में किया जाएगा, परन्तु यहाँ उक्त-उद्देश्य की पूर्ति के अन्यतम प्रमुख साधन प्राणायाम का कुछ परिचय करा देना निरवकाश न होगा। वस्तुतः सन्ध्या=प्राणायाम वह दैनिक अभ्यास है, जो कि महा प्रस्थान के समय प्राणों का निरोध करके उन्हें ऊर्ध्व गति बनाने में काम आता है। जैसे सैनिक लोग युद्ध न होने के दिनों में भी नित्य चक्रमण=कवायद—परेड=चांदमारी करते रहते हैं और अभ्यास बढ़ाने के लिये समय-समय पर कृत्रिम युद्ध भी करते हैं—तभी वे युद्ध के मोर्चे पर शत्रु से लोहा लेने में समर्थ होते हैं। यदि वे नित्य निरन्तर ऐसा अभ्यास न करें तो वास्तविक समय पर कभी सफलता प्राप्त न कर सकेंगे। ठीक इसी प्रकार सन्ध्या=प्राणायाम को भी शास्त्रकारों ने न केवल नित्य कर्म्म कोटि में परिगणित करके इसे अनिवार्य अनुष्ठेय कृत्य ही घोषित किया है, अपितु इसको एक दिन भी न करने से 'प्रत्यवाय' भी माना है। जैसे परेड में अनुपस्थित सिपाही दण्डनीय समझा जाता है, इसी प्रकार मन्वादि स्मृतियों में सन्ध्या विहीन द्विज भी 'शूद्रवद् बहिष्कार्य' कहा गया है।
सन्ध्या के मुख्य कर्म
यदि हम सन्ध्या के समस्त अनुष्ठेय कर्म्मों और उनकी 'क्यों ?' लिखने लगें तो एक स्वतन्त्र ग्रन्थ ही बन जाए, इसलिये केवल मुख्य-मुख्य अनुष्ठेय कर्म और उनके तादृश होने के कतिपय हेतु ही यहाँ प्रकट किये जाते हैं,—सन्ध्या के मुख्य कृत्यों का संग्रह श्लोक है कि—
संकल्प आसनविशोधनमम्बुपानं,
प्राणावरोधनमघक्षयताऽभिषेकः।
सौत्रामणीसवनसावभृथार्घ्यदानं
सन्ध्याविधिर्निगदितो मुनिभिः पुराणैः॥
अर्थात्—संकल्प, आसन शोधन, आचमन, प्राणायाम, नित्य कृत पापक्षयार्थ अपामुपस्पर्श, अवभृथ, अघमर्षण, सूर्यार्घ्य और सूर्योपस्थान ये-सब सन्ध्याकी विधियें पुरातन मुनियों ने कही हैं।