प्रत्येक धर्मानुष्ठान के आरम्भ में संकल्प परमावश्यक है—यह सर्वतन्त्र सिद्धान्त है। मनुस्मृति (२।३) में लिखा है कि—
संकल्पमूलः कामो वै यज्ञाः संकल्पसंभवाः।
व्रता नियमधर्माश्च सर्वे संकल्पजाः स्मृताः॥
अर्थात्—समस्त कामनाएँ संकल्प मूलक ही हैं। सब यज्ञ सङ्कल्प के अनन्तर ही सम्पन्न होते हैं, व्रत उपवास और सन्ध्या आदि समस्त धर्म्मानुष्ठान संकल्प जन्य हैं।
हम सिद्धान्ताध्याय के 'भावनावाद' प्रघट्ट में यह सिद्ध कर चुके हैं, कि मानव जीवन पर भावनाओं का कितना गहरा प्रभाव पड़ता है। सङ्कल्प भी अनुष्ठेय कर्म्म की साधना के प्रति साधक की भावना का ही मूर्त रूप है, जिसके अनुष्ठान से साधक अपने क्रियमाण कर्म्म के प्रति सर्वतोभावेन कटिबद्ध हो जाता है। आज के जड़वादी जगत् में भी सभी देशों की राष्ट्रीय संसदों के पदाधिकारी पद ग्रहण करने से पूर्व अपने किसी भी श्रद्धास्पद तत्त्वका नाम उच्चारण करते हुये 'शपथ' लेते हैं। कहना न होगा कि प्रकारान्तर से यह भी सङ्कल्प प्रणाली की परम्परा का ही निर्वाह है।
हमारे यहाँ 'शपथ' उठाना बहुत जोखों भरा काम समझा जाता है। इसलिये उसे प्राणों पर आ बनने की दशा में ही यथा कथञ्चित् कोई अगत्या उठाने को विवश हो सकता है। सर्व साधारण तो बड़ी से बड़ी हानि उठाकर भी—झूठे की कौन कहे—सच्चा नेम करने को भी उद्यत नहीं होता। और यदि अमुक कारण वश एक बार शपथ उठाली तो फिर—'रघुकुल रीति सदा चली आई। प्राण जाएँ पर वचन न जाही।'—के आदर्शानुसार अवसर पड़ने पर स्वयं हँसते २ प्राणों पर खेल गये। महाराजा दशरथ इसका सुप्रसिद्ध निदर्शन हैं परन्तु आज लोगों ने शपथ ग्रहण को भी एक रस्मी कार्य्यवाही मात्र समझ रक्खा है। देश धर्म्म और अपने मतदाताओं के प्रति वफादारी की शपथ उठाने वाले वे राष्ट्रीय संसदों के सदस्य जनमत की अवहेलना कर जनविरोधी कानून की सृष्टि करने में बिलकुल नहीं हिचकते।
इसलिये हमारे यहाँ मानव सुलभ निर्बलताओं को ध्यान में रखते हुए 'शपथ' जैसी अवश्य पालनीय प्रथा के लिए किसी भी 'ऐरे गैरे' को अवसर नहीं दिया जाता। किन्तु शपथ के बजाए प्रतिज्ञा को कार्य्यान्वित करने की निर्दुष्ट प्रणाली—संकल्प प्रथा का ही विधान किया गया है। शपथ उठाना एक अपमान सूचक प्रथा है उसे वही व्यक्ति उठाता है, जिसकी कि ईमानदारी में सर्व साधारण को सन्देह हो। और वह इस कठिनतम व्यापार द्वारा विश्वास दिलाना चाहता हो। परन्तु सङ्कल्प प्रथा शपथ प्रणाली के सर्वथा विपरीत वह अनुष्ठान है कि जिसमें साधक अमुक अनुष्ठेय कर्म्म के प्रति अपनी दृढ़निष्ठा और आत्मविश्वास की भावना से ताजा दम होकर कर्तव्य पालन में संलग्न हो जाता है।
सङ्कल्प की सबसे बड़ी विशेषता है—आर्य जाति के इतिहास की परम्परा की सुरक्षा। वैदिक काल से सङ्कल्प का इसी प्रकार प्रयोग हो रहा है और उसमें प्रतिदिन हमारे जीवन की एक कड़ी और जुड़ जाती है। आप जानते हैं हमारी जीवन शृंखला कितनी लम्बी बन चुकी है ? आप प्रतिदिन प्रत्येक कार्य के आरम्भ में सङ्कल्प को दोहराते अवश्य हैं, परन्तु आप में से बहुत कम व्यक्ति ऐसे हैं—जिन्होंने उसके अर्थ गाम्भीर्य पर ध्यान दिया है। जब जल हाथ में लेकर आप कहते हैं—
ॐ तत्सदद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीये परार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे अष्टादशोत्तरद्विसहस्रतमे वैक्रमाब्दे……आदि २।
इसका सीधा तात्पर्य हुआ कि आप अपनी उस चिरन्तन सत्ताका स्मरण करते हैं, जिसका कि प्रादुर्भाव इस धरातल पर आज से १ अरब ९७ करोड़ २९ हजार ६२ वर्ष पूर्व हुआ था। यह आर्य जाति की ही विशेषता है, कि वह इतने लम्बे समय से अपनी सांस्कृतिक विशेषताओं के साथ जीवित है। इस विस्तृत धरातल पर इतने समय में सहस्रों जातियाँ उत्पन्न हुईं और विनष्ट हो गईं, आज भी जो जीवित हैं उनकी सत्ता दो तीन हजार वर्ष से अधिक की नहीं है। क्या ईसाई, क्या मुसलमान, पारसी, यहूदी, ग्रीक और रोमन, सभी का प्रारम्भ तो अधिक से अधिक ३ हजार वर्ष पूर्व हुआ है। किन्तु हमें गौरव है कि हमारे पूर्वजों ने आज से करोड़ों वर्ष पूर्व सांस्कृतिक जीवन की जिस परम्परा को प्रारम्भ किया वह आज भी अक्षुण्ण है। सन्ध्या वन्दनादि सभी धार्मिक कृत्यों के समय संकल्प को बोलकर हम उसी परम्परा के इतिहास को दोहराते हैं।
इसके अतिरिक्त 'सृष्टि को बने हुए कितने वर्ष हुए'—यह प्रश्न आज, जब कि दुनिया के वैज्ञानिकों और विचारकों के लिए उलझी हुई पहेली बना हुआ है और वे इसके बारे में तरह तरह की अटकल लगाकर दिमागपच्ची कर रहे हैं, तब सन्ध्यावन्दन करने वाले एक साधारण हिन्दू के पास संकल्प के रूप में इस प्रश्न का नितान्त स्पष्ट और सच्चा रिकार्ड विद्यमान है—यह कम आश्चर्य की बात नहीं है।
वेदादि शास्त्रों में जल उपस्पर्श पूर्वक ही संकल्प करने का विधान इसलिये है क्योंकि जल में वरुण देव का आवास है और उसके साक्ष्य में जो प्रतिज्ञा की जाएगी उसका निर्वाह न करने पर वरुणदेव प्रतिज्ञा पालन न करने वाले को को दण्ड देंगे। वेद कहता है कि—
(क) अप्सु वै वरुणः। (तैत्तिरीय १।६।५।६)
(ख) अनृते खलु वै क्रियमाणे वरुणो गृह्णाति।
(तैत्तिरीय १।७।२।६)
इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक दृष्टि से जैसे हमारा मन भुक्त अन्न का परिणाम है इसी प्रकार—'आपोमयाः प्राणाः' इस वेद प्रमाण के अनुसार प्राण शक्ति भी पीये हुए जल का ही अन्तिम परिणाम है। सो प्रत्येक कर्म्म के अनुष्ठान में प्राणशक्ति के प्राबल्य की अनिवार्य आवश्यकता है, इसीलिये कर्म्म से विरक्त हुवे अकर्मण्य भीरु मनुष्य को कहा जाता है, कि 'इसके प्राण सूख गये'। सो प्राणशक्ति के जनक जल का उपस्पर्श करके साधक अपने आपको महाप्राण अनुभव करता हुआ अनुष्ठेय कर्म्म की साधना में सुतरां प्रवृत्त होता है। साथ ही सन्ध्या, तर्पण, यज्ञ, हवन, तप आदि सभी धर्म्मानुष्ठानों में जल की नितान्त आवश्यकता होती है। हमारे यहाँ मुसलमान ईसाई आदि आधुनिक मत वालों की भाँति सूखी—जलशून्य उपासना नहीं होती। आर्यसमाज प्रवर्तक स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपनी कल्पित सन्ध्या में सङ्कल्प और विनियोग आदि वैदिक विधियों का तो परित्याग कर दिया था, परन्तु आचमन और अङ्ग प्रोक्षण में तो जल की अनिवार्यता लिखी थी, परंतु दयानन्दानुयायी समाजी तो नमाजियों की भाँति जलशून्य सूखी सन्ध्या का सूखा शंख फूँकते हुए रही-सही वैदिक मर्यादा को भी तिलाञ्जलि देने लगे हैं। सो उपर्युक्त कारणावली का मनन करते हुए आस्तिक जनों को अपने समस्त धार्मिक अनुष्ठान जलोपस्पर्शपूर्वक सङ्कल्प से ही आरम्भ करने चाहिये, जिससे संकल्प के निमित्त प्रथम ही जल की विद्यमानता हो जाने पर आगे का समस्त क्रियाकलाप सुचारु रूप से चलता रहे।