यहां प्रसङ्ग वश पाठकों को यह बता देना भी अनुचित न होगा, कि सन् १८७५ से प्रादुर्भूत हुये, नये वैदिकधर्मी आर्यसमाजी महाशयों की भी एक छपी हुई सन्ध्या केवल एक पैसा कीमत में यत्र-तत्र बिकती है। इस पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर न केवल 'सन्ध्या' अपितु 'वैदिक-सन्ध्या' छपा रहता है। बहुत से अपरिचित आस्तिक लोग, वेदों में अगाध श्रद्धा रखने के कारण इस पर मोटे टाइप से छपा 'वैदिक' शब्द देखकर और सस्ती कीमत देखकर इसे ही असली सन्ध्या समझकर खरीद लेते हैं।
जब पहिले पहिल यह ट्रैक्ट हमारे हाथ में आया तो हमारे मन में नाना प्रकार के तर्क उठने लगे। सर्व प्रथम तो सन्ध्या के वैदिक विशेषण पर ही विचार चला।—क्या कोई 'अवैदिक' सन्ध्या भी विद्यमान है ?—जिससे पृथक् करने के लिये यह 'वैदिक' विशेषण लगाना आवश्यक हुआ !—फिर जबकि 'ब्राह्मण' मात्र कहने से अमुक व्यक्ति का द्विजत्व सिद्ध हो सकता है तो किसी को 'द्विज ब्राह्मण' कहना व्यर्थ ही है। ऐसा प्रयत्न वहीं किया जाता है जहां कि किसी अद्विज को ठोक पीट कर बलात् द्विज घड़ा गया हो ! तभी इस मिथ्या प्रयास पर परदा डालने के लिए ऐसी दुश्चेष्टा सहैतुकी कही जा सकती है ! क्या इसीप्रकार इस सन्ध्या में भी कोई गड़बड़ घुटाला तो नहीं है ? जिसे 'वैदिक' विशेषण की आड़ में छुपाने का प्रयत्न किया गया हो, इत्यादि इत्यादि अनेक तर्क-वितर्क उठने लगे।
अन्त में यही निर्णय हुआ कि जिस परम्परागत सन्ध्या के आधार पर आज तक हम सन्ध्योपासन करते रहे हैं वह तो करते ही रहे हैं, आज इस नई 'वैदिक सन्ध्या' के आधार पर भी सन्ध्योपासना करनी चाहिए। फिर तुलनात्मक दृष्टि से दोनों सन्ध्याओं में से किसके आधार पर की गई उपासना में अधिक मानसिक शान्ति प्राप्त होती है—यह अनुभव करना परमावश्यक है। कदाचित् इस नई सन्ध्या से लाभ हो तो फिर इसके अपनाने में क्या हानि ?
इस प्रकार पूरे श्रद्धालु बनकर एक दिन हमने 'वैदिक-सन्ध्या' के आधार पर अक्षरशः उपासना करनी आरम्भ की। 'शन्नो देवी' मन्त्र पढ़कर आचमन कर डाला, अब 'इन्द्रियस्पर्शमन्त्राः' इस शीर्षक के नीचे लिखे मन्त्रों को पढ़-पढ़कर इन्द्रियों को छूने लगे। 'ओं वाक् वाक्, चक्षुः चक्षुः, प्राणः प्राणः' कहते हुए क्रमशः मुख, नेत्र और नासिका का स्पर्श किया, परन्तु जब 'ओं नाभिः' कह कर नाभि को छूने का अवसर आया तो मनीराम ने तर्क का तीर दे मारा। सोचने लगा क्या 'नाभि' भी कोई इन्द्रिय है ?—शास्त्र में घ्राण, रसना, चक्षु, त्वचा और श्रोत्र ये पांच ज्ञानेन्द्रियें और हाथ, पांव, गुदा, लिंग और जिह्वा ये पाँच कर्मेन्द्रियें प्रसिद्ध हैं, कहीं कहीं इस गणना में मन को भी गिना जाता है, इस प्रकार दश या एकादश ही इन्द्रियें हैं, परन्तु 'नाभि' तो कोई इन्द्रिय नहीं है ? सो या तो ऊपर लिखा 'इन्द्रियस्पर्शमन्त्राः' यह शीर्षक अशुद्ध छपा है अथवा कोई और रहस्य है !
जब हमने अपने एक साहित्य शास्त्री मित्र के सामने यह आशंका रक्खी तो वे काशी परीक्षा में रटी हुई 'काव्य प्रकाश' की तोता रटन्त की बौछाड़ करते हुए बोले कि—'जो है सो है यहाँ 'गंगायां घोषः' की भांति अभिधार्थ न लेकर लाक्षणिक अर्थ लेना चाहिए, जैसे गंगा-प्रवाह में घोष=आभीर पल्ली=गामड़े का बसना असम्भव है—तो मुख्य अर्थ का बाध हो जाने के कारण गंगा शब्द का लाक्षणिक अर्थ गंगातट माना जाता है, इसी प्रकार—जो है सो है—साक्षात्कार कर-करकरके यहाँ भी नाभि का इन्द्रियत्व बाधित हो जाने के कारण तन्निकटवर्ती लिंगेन्द्रिय को स्पर्श करना ही लक्षणा में समझना चाहिए। जैसे अतिशीतत्व पावनत्व आदि गुण द्योतन करने के प्रयोजन से—'गंगातटे घोषः' न कहकर 'गंगायां घोषः' कहना सहैतुक है, वैसे ही अश्लील ग्राम्यत्व आदि दोषों की उपस्थिति के परिहार के लिए उक्त वैदिक सन्ध्या में भी सीधे-सीधे 'लिंगम्' ऐसा न कहकर 'नाभि' कहा गया है। साथ ही आर्यसमाज के मन्तव्यानुसार स्त्रियों को भी यही सन्ध्या ज्यों की त्यों करने का विधान है। ऐसी स्थिति में लिंग शब्द का प्रयोग स्त्रीपक्ष में फिट नहीं बैठ सकता था, जो है सो है इस विप्रतिपत्ति के परिहार के लिए भी स्त्री-पुरुष दोनों को अपने मूत्रेन्द्रिय स्पर्श का बोध हो सके और अश्लीलता के बिना एक ही शब्द से यह काम चल जाय इत्यादि अनेक हेतुओं से 'नाभि' शब्द लिखा गया है।'
यह विवेचना सुनकर अपने राम तो दंग रह गए, अन्त में 'वाक् वाक्' आदि इस मन्त्र समूह को वेद में देखकर भाष्यों द्वारा इसका वास्तविक अर्थ जानने की उत्कण्ठा हुई। उपलब्ध समस्त संहिताएँ, फिर ब्राह्मण आरण्यक और उपनिषद् कई बार खोज डाले परन्तु उक्त मन्त्रों का कहीं अस्तित्व न मिला। तब तो बड़ी निराशा हुई। रह-रहकर 'वैदिक-सन्ध्या' के लेखक पर क्रोध आया, कि जिसने सनातनकाल से प्रचलित और वैदिक विज्ञान से परिपूर्ण अनादि सन्ध्या को छोड़कर अपनी कपोलकल्पित तुकबन्दी पर वैदिक शब्द का लेबिल लगाकर लाखों श्रद्धालु हिन्दुओं को पथभ्रष्ट किया। मनुस्मृति के 'वाङ्मूला नियताः सर्वाः' के अनुसार संसार के सभी व्यवहार वाणी पर आश्रित हैं, सो जो व्यक्ति उसकी चोरी करता है अर्थात्—वेद के नाम पर विश्वास दिलाकर अवैदिक भावों का प्रसार करता है निःसन्देह वह मनुष्य—'यश्च तां स्तेनयेद्वाचं स सर्वस्तेयकृन्नरः' के अनुसार सब कुछ चुराने वाला समझा जाना चाहिए। कहां सन्ध्या सदृश पुनीत अनुष्ठान और कहां उसके नाम पर मूत्रेन्द्रियों के हाथों से पलोटने का व्यवहार ? प्रभो ! ऐसे दुराग्रहपूर्ण अनर्थों से हिन्दू जाति की रक्षा कीजिए !