प्रसंग-वश यहां यह भी प्रकट कर देना अनावश्यक न होगा; कि गले में माला कण्ठी बांधने की भी शास्त्र में व्यवस्था मिलती है यह क्यों ? इसलिये कि—

(१) अधिक जाप करने वाले व्यक्ति को—खासकर जो उपांशु=चुपचाप ओष्ठ और जिह्वा को हिलाये बिना—जिसका कि शास्त्र में अधिक माहात्म्य वर्णित है—जाप करता हो उसकी कण्ठ धमनियों को अधिक परिश्रम करना पड़ता है, इसलिये भय है कहीं वह साधक गलगण्ड, कण्ठमाला आदि रोगों से पीड़ित न हो जाय, इस खतरे से बचने के लिये तुलसी रुद्राक्ष आदि दिव्य वृक्षों से बनी कण्ठी माला धारण की जाती है, ये वृक्ष उक्त रोगों को दूर करने की अव्यर्थ औषधि हैं।

बच्चों को दाँत और दाढ़ उत्पन्न होने के समय बड़ा कष्ट होता है; एतदर्थ बहुत से गृहस्थ इस कष्ट से मुक्ति पाने के लिये विदेशी लुटेरों द्वारा तैयार किया कथित बिजली का फीता खरीद कर बच्चों के गले में बांधते हैं, यद्यपि इस फीते में केवल तांबे और जस्ते का एक दो तार काले कपड़े में सिला रहता है, परन्तु मूर्खलोग इसी दो आने की वस्तु को रुपये की खरीदकर देश का लाखों रुपया विदेशियों की भेंट चढ़ाते हैं। हमने स्वयं अनुभव करके देखा है कि यदि बच्चों के गले में तुलसी रुद्राक्ष की माला कण्ठी पहिनाई जाए तो दांतों के उद्गम के कष्ट के अतिरिक्त गलगण्ड कण्ठमाला आदि रोगों की भी निवृत्ति हो जाती है। उक्त बिजली का फीता कहे जाने वाली विदेशी वस्तु से तो हमारे अपने देश की कौड़ियों, छोटे शंखों, शिरस के बीजों से बनी कण्ठी सस्ती और अधिक लाभप्रद सिद्ध होती है, प्रायः देहातों में इसका प्रयोग भी होता है अब कुछ विलायती चाकचिक्य के भक्त उक्त देशी साधनों को छोड़कर विदेश की ओर ताकने में ही अपनी शिष्टता समझते हैं, परन्तु वस्तुतः कपर्दिका आदि वस्तुएं हैं बहुत लाभप्रद। यदि व्याघ्रनख, चांदी और सोने का भी उक्त कण्ठी में सन्निवेश हो तो फिर बहुत सी संक्रामक बीमारियों से भी बच्चा सुरक्षित रह सकता है।

(२) धार्मिक दृष्टि से यज्ञोपवीत की भांति कण्ठी माला भी हिन्दुत्व का अनिवार्य चिह्न है। बिशपों और पादरियों के गले में लकड़ी का क्रास और ईसा को दी गई फाँसी का फंदा=नैकटाई अवश्य रखते हैं। ईसाइयों के धार्मिक चिह्न नैकटाई को बाँधकर तो भारतीय भी अभी तक 'नाक—कटाई' का प्रदर्शन करते हैं। मौलाना साहिब के गले में तो पण्डित जी की भांति ही लम्बी तसबी लटकती रहती है। वास्तव में इस पवित्र वस्तु को लटकाने के लिये गले से अच्छा अन्य उपयुक्त स्थान भी तो नहीं है।