शास्त्रीय-स्वरूप
(क) अन्नं ब्रह्म इत्युपासीत।
(ख) उपस्पृश्य द्विजो नित्यमन्नमद्यात्समाहितः।
भुक्त्वा चोपस्पृशेत्सम्यगद्भिः खानि च संस्पृशेत्॥
पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चैतदकुत्सयन्।
दृष्ट्वा हृष्येत्प्रसीदेच्च प्रतिनन्देच्च सर्वशः॥
(मनु २।५३-५४)
(ग) अन्नं ब्रह्मारसो विष्णुर्भोक्ता देवो महेश्वरः।
(घ) अन्नं विष्ठा, जलं मूत्रं यद् विष्णोरनिवेदितम्॥
(ब्रह्मवैवर्त पुराण ब्रह्मखण्ड २७।६)
(ङ) अस्नायी समलं भुङ्क्ते, अजपी पूयशोणितम्।
सूर्य्यायार्घ्यमदत्वा च नरः किल्विषमश्नुते।
(स्कन्दपुराण)
अर्थात्—(क) अन्न ब्रह्म है यह समझकर उसकी उपासना करनी चाहिये। (ख) दोनों हाथ दोनों पांव और मुख इन पांचों अंगों को) जल का उपस्पर्श करके नित्य सावधान होकर अन्न को खाना चाहिए, और भोजन के उपरान्त भली प्रकार आचमन करना चाहिए तथा जल के द्वारा मुखस्थ छहों छिद्रों का स्पर्श करना चाहिये। नित्य प्रथम भोजन का पूजन करना चाहिए और बिना निन्दा किये खाना चाहिये। भोजन को देखकर हर्षयुक्त होना चाहिए और प्रसन्नतापूर्वक उसका अभिनन्दन करना चाहिये। (ग) अन्न ब्रह्मा है, रस विष्णु है और और खाने वाले महेश्वर है। (घ) विष्णु भगवान् को भोग न लगा अन्न विष्टा के समान है और जल मूत्र के तुल्य है। (ङ) बिना स्नान किये भोजन खाना मल के तुल्य है। जप किये बिना भोजन खाना मल खाने के तुल्य है। जप किए बिना भोजन खाना राध, पीप, रुधिर खाने के समान है। और सूर्य को अर्घ दिये बिना भोजन करना पाप खाने के समान है।
वैज्ञानिक विवेचन
उपर्युक्त शास्त्रीय प्रमाणों में प्रधानतया जिन-जिन नियमों का संकेत किया गया है इन सबकी विस्तृत व्याख्या करने पर एक स्वतन्त्र ग्रन्थ तैयार हो सकता है, इसलिए हम यहां केवल अत्यावश्यक बातों का ही उल्लेख करेंगे। भोजन का सर्वप्रधान यह नियम है कि उसे केवल क्षुत् निवृत्ति का साधन, पेट भरने मात्र के लिए किया जाने वाला क्षुद्र कार्य नहीं समझना चाहिए, बल्कि खाद्य पदार्थ को साक्षात् ब्रह्म समझकर, भक्षण करना उसकी उपासना जैसा पवित्र कार्य मानना चाहिए। अब यदि भोक्ता भोजन खाने से पूर्व यह भावना सुदृढ़ बना ले कि मैं पेट भरने नहीं चला, किन्तु भगवदुपासना करने चला हूँ, तो अन्य सब नियम अपने आप ही पालन करने अनिवार्य हो जायंगे; जैसे ईश्वर की उपासना में हाथ-पांव प्रक्षालन करके शुद्ध धौतेय वस्त्र पहिनकर आसन पर बैठते हैं और सावधान मन से मौन होकर यथाविधि सब कृत्य करते हैं, तथैव भोजन के समय भी वैसे ही सब काम करना चाहिये। ईश्वर उपासना में किसी अपवित्र वस्तु को निकट भी नहीं आने देते। इसी प्रकार भोजन में भी कोई अपवित्र वस्तु चौके में नहीं घुसने देनी चाहिए।
यदि विचार किया जाये तो भोजन के इस प्रथम नियम से ही तत्सम्बन्धी अनेक शङ्काओं का अपने आप निराकरण हो जाता है। अब यदि कोई पूछे कि भोजन से पूर्व स्नान क्यों करें ? जूता क्यों उतारें ? वस्त्र क्यों उतारें ? कुर्सी पर क्यों न बैठें ? चौका क्यों लगायें ? आसन पर क्यों बैठें ? मौन क्यों रक्खें ? लसुन, प्याज, मद्य, मांस आदि का उपयोग क्यों न करें ? होटलों में यवन चाण्डाल खानसामाओं का पकाया क्यों न खायें ? और कांच और चीनी के बर्तनों में क्यों न खायें ? तो इन सब प्रश्नों का एक ही उत्तर दिया जा सकता है, कि यदि केवल पेट भरने के लिए खाना खाना हो, तब तो तुम पशुओं की भांति स्वतन्त्र हो जब जैसे जो चाहो यथेच्छ खाओ; परन्तु यदि दीर्घजीवी बनने के लिए भोजन करना है तो ईश्वर की उपासना में उपयुक्त न होने वाले सब रंग ढंग सब वस्तुजात अवश्य छोड़ने होंगे।