त्रिकालज्ञ महर्षि आज के युग से सर्वथा सुपरिचित थे। यह तो केवल हमसे अल्पज्ञ प्राणी ही 'किं भविष्यति' के विषय में किंकर्तव्य विमूढ़ हैं। परन्तु अपनी 'ऋतम्भरा' प्रज्ञा द्वारा जिन्होंने हस्तामलक की भांति भूत भविष्यत् वर्तमान का अनुसन्धान किया हो, वे महात्मा तो काल की व्यावहारिक अनेकता में भी पारमार्थिक एकता के साक्षात् दर्शन करते हैं। जैसे बहुत बार अनुभव करने के कारण मध्याह्नकालीन सूर्य के प्रखर तेज की विद्यमानता में भी सायंकालीन घोर अन्धकार की अनिवार्यता को प्रत्यक्ष देखते हैं और ग्रीष्मकालीन उष्णता की विद्यमानता में भी शिशिरकालीन शीतता की अनिवार्यता को नहीं भूलते, ठीक इसी प्रकार त्रिकालदर्शी महर्षियों ने विभिन्न युगों के तारतम्य को जानकर पहिले से ही तत्कालीन युगधर्मों का प्रतिपादन किया है। सो आज के इस भयंकर युग में जब कि प्रत्येक प्राणी को तुल तुलकर चन्द तोला अन्न मिलता हो पांच ग्रास की कौन कहे—एक ग्रास भी किसी दूसरे को देना मानो मृत्यु को निमन्त्रण देना जान पड़ता है—तब पञ्चग्रासी कौन कर सकेगा ? इसलिए बलिवैश्वदेव के अतीव संक्षिप्त दरिद्रनारायण संस्करण का आविष्कार हुआ है, जिसे हम भक्तों की भाषा में ठाकुर जी को भोग लगाना कह सकते हैं।
सब जानते हैं, कि ठाकुर जी को भोग लगाने में कौड़ी पाई का खर्च नहीं होता, घर में रूखा सूखा जो भी भोजन बना हो उसे आधे सैकिण्ड में भगवदर्पण कर देना—आर्थिक दृष्टि से कोई महंगा सौदा नहीं है। एक बार जब एक महाशय ने हमसे पूछा कि क्या ठाकुर जी खाते हैं ?—तो हमने उत्तर दिया, कि यह प्रश्न तो उल्टा मुझे आपसे पूछना चाहिये, क्योंकि वेद शास्त्र की आज्ञा है कि भोग लगाना चाहिये, परन्तु आप भोग लगाने में सौ आनाकानी करते हैं। तब मैं आपसे पूछ सकता हूँ कि क्या ठाकुर जी खाते हैं' ? अर्थात् तुम जो सामने रक्खे भोजन को केवल आधा मिनट आँख बन्द करके ईश्वर समर्पण करते हुवे घबड़ाते हो क्या तुम्हें खतरा है, कि ठाकुर जी इसे खा जायेंगे ? सो यदि किसी नास्तिक को पूरा भरोसा है, कि ठाकुर जी नहीं खाते तब तो भोग लगाने में उसे कुछ भी खतरा नहीं होना चाहिए। निश्चिन्त होकर आंख बन्द करके 'त्वदीय वस्तु गोविन्द ! तुभ्यमेव समर्पये' कहते हुये, पंचविध हत्या का प्रायश्चित्त करना चाहिये।