अनेक शास्त्रों का मथन करने पर जो भोजन करने के समय अवश्य पालनीय नियम मिलते हैं—हम पाठकों के ज्ञान की अभिवृद्धि के लिये उन्हें यहां अंकित करते हैं—'आचारादर्श' ग्रन्थ में उक्त महर्षियों के नाम से ये प्रमाण उद्धृत हुए हैं यथा—

(क) न वेष्टितशिराश्चापि नासन्दीकृतभाजनः।
नैकवस्त्रो दुष्टमध्ये सोपानत्कः सपादुकः॥
न चर्म्मोपरि संस्थश्च चर्म्मवेष्टितपार्श्ववान्।
ग्रासलेशं न चाश्नीयात् पीतशेषं पिबेन्न तु॥
शाकं मूलं फलेक्ष्वादि दन्तच्छेदैर्न भक्षयेत्।
सञ्चयेन्नान्नमन्नेन विक्षिप्तं पात्रसंस्थितम्।
बहूनां भुञ्जतां मध्ये न चाश्नीयात्त्वरान्वितः॥

(ख) न भिन्नभाण्डे भुञ्जीत (मनु)

(ग) न नावि भुञ्जीत (आपस्तम्ब)

(घ) एकवस्त्रो न भुञ्जीत कपाटमपधाय च। (देवल)

(ङ) खट्वारूढो न भुञ्जीत (यम)

(च) यस्तु पाणितले भुङ्क्ते यस्तु फूत्कारसंयुतम्।
प्रसृतांगुलिभिर्यश्च तस्य गोमांसवच्च तत्॥
(ब्रह्म पुराण)

(छ) न भुञ्जीताऽघृतं नित्यं सर्पिराहुरघापहम्। (देवल)

(ज) नोच्छिष्टो घृतमादद्यात् (विष्णु)

(झ) करे कार्पासके चैव पाषाणे ताम्रभाजने।
वटार्काश्वत्थपत्रेषु भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्॥
पलाशपद्मिनीचूतकदलीहेमराजते।
मधुपत्रेषु भोक्तव्यं ग्रासमेकं तु गोफलम्॥
(शिष्टस्मृति)

अर्थात्—(क) शिर ढांपकर भोजन न करे। कुर्सी पर थाल रखकर न खाये। एकमात्र वस्त्र पहिने और दुष्ट लोगों के सामने भोजन न करे। मृगादि के चर्म पर बैठकर भोजन न करे। जूता, चप्पल, खड़ाऊ पहिनकर भोजन न करे। चमड़े पर बैठकर और चमड़े—(पतलून की पेटी, तस्मे, घड़ी की चैन) द्वारा आवेष्टित भोजन न करे। किसी पदार्थ को दांतों से कुतर कर पुनः न खाए। एक बार होठों से लगाकर पिए हुए पानी के अवशिष्ट भाग को पुनः न पीए। शाक, मूल, फल, गन्ना आदि दांतों से काटकर न खाए। थाली में बिखरा भात आदि भोजन पूरी रोटी के साथ इकट्ठा न करे। पंक्ति भोजन में सबके खाते रहने पर स्वयं झटपट खाने का प्रयत्न न करे। (ख) फूटे बर्तन में न खाए। (ग) नाव में भोजन न करे। [लम्बी यात्रा में अनेक कमरों वाले—महाजलयान=स्टीमर इसका अपवाद है।] (घ) केवल एक वस्त्र पहिने और किवाड़=पड़दा बिना बन्द किए बिना भोजन न करे। (ङ) चारपाई=खाट पर बैठकर भोजन न करे। (च) खुली हथेली पर रखकर जोर जोर से सड़प्पे मारकर=फू फू करते हुए और अंगुलियें फैलाकर भोजन न करे। (छ) बिना घृत भोजन न करे, क्योंकि घृत ही भोजन के अनेक पापों का विनाशक है। (ज) उच्छिष्ट=झूठे पदार्थ में घृत नहीं डालना चाहिए। (झ) हाथ पर, कपड़े पर, पत्थर और तांबे के बर्तन में, वट, अर्क अश्वत्थ=बड़, आक, पीपल के पत्तों से बने दौने और पत्तलों पर नहीं खाना चाहिए। पलाश=ढाक, पद्मिनी=कमल, आम और केले से बनी पत्तल पर, सोने और चांदी के बर्तनों में तथा महुए के पत्ते पर भोजन करना लाभप्रद है।