उपर्युक्त नियमों पर ध्यान देने से यह भली प्रकार समझ में आ सकता है कि त्रिकालदर्शी महर्षियों ने कितनी गहराई तक भोजन समस्या पर विचार किया है। शिर पर कपड़ा बांधकर भोजन करने से शरीरस्थ ऊष्मा जो कि भोजन के समय समस्त मानवपिंड में व्यापृत होने के कारण जागृत हो जाता है—बाहर नहीं निकल पाता इससे बुद्धि पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। (सैनिक प्रवृत्ति वाले पुरुष जो कि स्वयं ननु नच न करके सेनापति की आज्ञानुसार ही अपना कर्तव्य पालन करते हैं वे इसके अपवाद कहे जा सकते हैं। सिख सम्प्रदाय भी इसी कोटि में परिगणित है। इसीलिए खालसा हर समय तैयार रहता है।)

कुर्सी आदि पर बैठकर भोजन इसलिए निषिद्ध है कि उन पर बैठकर भोजन करते हुये पांव नीचे लटकाने पड़ते हैं अर्थात्—आसन बांधकर नहीं बैठा जा सकता इससे नाभि से सम्बद्ध अधोभाग की सब धमनियें तनी रहने के कारण पाचनक्रिया पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता, तभी तो पाश्चात्य लोगों को और उनके मानसपुत्र कुछ भारतीयों को भोजन के साथ सोडे आदि पाचकपेयों की आवश्यकता पड़ती है। प्राचीनकालीन उत्तरीय वस्त्र की भांति आज के सभ्य भी रुमाल अनिवार्य मानते हैं, अन्यथा भोजन के समय छींक आने पर किंवा श्वासनलिका में भोजन जलांश के सम्पर्क से खरखरी=अत्थू—हो जाने पर भारतीय तो शायद अगत्या धोती के छोर से यथाकथञ्चित् निर्वाह भी कर ले परन्तु मिस्टर अपटूडेट मिश्र को तो आड़े वक्त पर नाक पोंछने के लिये पतलून काम न दे सकेगी। अतः पर्णा=साफा=अंगोछा आवश्यक है।

दुनिया भर के मल, मूत्र, थूक सिणक में सने तलों वाले बूट, चप्पल, खड़ाऊ पहिनकर भोजन करना मानो संसार भर के रोगों को अपने घर में निमन्त्रित करना है। चमड़ा वैसे भी दुर्गन्धपूर्ण परमाणुओं से बनी एक अपवित्र वस्तु है ? फिर उसका भोजन के समय सम्पर्क कहां की सभ्यता है ? आजकल दुर्भाग्यवश हाथ में बन्धी रिस्टवाच की चैन कलाई पर बन्धे बन्धे भोजन करने का, या परसने का प्रचार बहुत बढ़ रहा है। उन्हें यह मालूम नहीं कि ये नर्म चमड़े—'गोसल्ला' से तैयार किये जाते हैं। गोसल्ला का तात्पर्य है, कि सगर्भा गाय के पेट के बच्चे को जन्म से पूर्व ही विष आदि के इन्जैक्शन से मार दिया जाता है। केवल गोसल्ला चर्म विदेशों को भेजने के लिए भारत में लाखों गोवत्स प्रतिवर्ष मारे जाते हैं, इनका पाप ऐसे चमड़े को व्यवहार में लाने वाले लोगों को ही लगता है, यदि मण्डी में ऐसी वस्तुओं की खपत न हो तो फिर अत्याचार अपने आप ही खत्म हो जाएँ। अतः भोजन के समय चमड़े का सर्वविध सम्पर्क सर्वथा वर्जनीय है।

एक ग्रास को दांतों से कुतरकर उसे पुनः पुनः खाना वर्जित है, क्योंकि आज के नए परीक्षणों से यह सिद्ध हो गया है, कि एक बार मुंह से संपृष्ट वस्तु के साथ जो मुखान्तवर्ती पानी का संयोग हो जाता है, यदि उसे तत्काल खुर्दबीन=स्वल्पवीक्षण यन्त्र से देखा जाय तो उसमें अगणित कीट संसक्त हुवे दीख पड़ेंगे। पुनः उसी ग्रास के खाने पर या पीत शेष जल के पीने पर वे विकृत अवस्था में उदर में जाकर कई प्रकार के संक्रामक रोगों की उत्पत्ति के हेतु बन सकते हैं। दांतों के साथ गाजर, मूली, आदि कड़ी चीजों का काटना दांतों का स्थान च्युत करने का कारण बन जाता है-यह बात सभी भुक्तभोगी जान सकते हैं। कढ़ी शाक आदि अम्लतायुक्त पदार्थों को रोटी किंवा पूड़ी कचौड़ी के टुकड़ों के साथ थाली में इधर से उधर घसीटना ठीक नहीं, क्योंकि पात्र में स्वभावतः लगे जंग को टुकड़ों से चिपकाकार पेट में डालने से कई बार तबियत मचलाने लगती है, यह एक प्रकार का विष ही होता है, जो अधिक मात्रा में पेट में जाने पर वमन=कै तक करा डालता है।

भोजन में तीन व्यक्ति कण्टक माने गए हैं। 'आदि-कण्टक'-जो देर में पहुँचे और प्रतीक्षा में अन्य लोगों को पीड़ित करे। 'मध्य-कण्टक'-जो पानी का पात्र लुढ़कादे, रायते का शिकोरा ठुकरा दे, बुरी तरह से सड़प्पे मारकर साथियों को ग्लान करदे इत्यादि। 'अन्त्य कण्टक'—जो स्वयं झटपट पूरा भोजन करके अन्यों के मुँह की ओर ताकता हुआ दृष्टि दोष लगाने को उद्यत हो, अथवा सबके तृप्त हो जाने पर भी पंक्ति भर में अकेला खाता ही रहे, जिसकी प्रतीक्षा में अन्य सब तंग होने लगें। सो यहां अन्त्य-कण्टक का उल्लेख किया गया है। फूटे बर्तन में भोजन करने से कई भद्र पुरुषों की अंगुली टूटे किनारे में उलझ कर घायल हो जाती है, कइयों का घृत चू जाता है। नाव में भोजन करने से अन्यान्य यात्रियों के अतिरिक्त गरीब मल्लाह भी तो मुंह की ओर हीन-दीन दृष्टि से बार-बार ताकता रहेगा, जिससे दृष्टिदोष की पूरी सम्भावना है। कटिवस्त्र के अतिरिक्त दूसरे वस्त्र की आवश्यकता का उल्लेख किया जा चुका है। दृष्टिदोष निवृत्त्यर्थ किवाड़ बन्द करना किंवा पड़दा लगना आवश्यक है। चारपाई पर भोजन करना इसलिए वर्जित है कि प्रत्येक घर-गृहस्थ को यहां अवश्य ही समय-समय पर बाल बच्चे उस पर मल-मूत्र का परित्याग कर देते हैं; उसे चाहे कितना भी प्रक्षालन क्यों न किया जाए, तथापि रस्सियों की सन्धियों से मल का रह जाना अनिवार्य है। साथ ही भोजन द्रव्य, खीर, कढ़ी, शाक, सब्जी आदि भी परसते हुए किंवा खाते हुए भी हाथ से छूटकर गिर जाने अनिवार्य हैं, रात में सोते हुए पुनः वही पदार्थ अपने ही बिस्तर किंवा शरीर में न चिपकेंगे इसकी गारन्टी कौन कर सकता है।

नंगी हथेली पर रखकर वस्तु खाने में निश्चित ही बांये हाथ की हथेली को पात्र बनाया जाएगा और दांये से खाया जाएगा, ऐसी स्थिति में मलद्वार को स्वच्छ बनाने में प्रयोग होने वाले हाथ का मुंह से संयुक्त होना अनेक रोगों का कारण बन सकता है। शास्त्रीय व्यवस्था के अनुसार नाभि से ऊपरी भाग में दांये हाथ का और नाभि से नीचे वाले भाग में बांये हाथ का उपयोग होना चाहिए जिससे स्वास्थ्य सुरक्षित रहे। ऊंचे स्वर में फू-फू करते हुए सड़प्पे मारकर खाने से साथियों को बड़ी ग्लानि होती है, फिर स्वभाव पड़ जाने पर सर्वत्र ही वह व्यक्ति वैसा ही करता है, ससुराल में ऐसे व्यक्तियों का उपहास होते हमने स्वयं अनुभव किया है। अंगुली फैलाकर खाने से भी तरल वस्तु टपकती रहती है जिससे सब कुछ छीटम-छीट हो जाता है, अतः इसका निषेध है।

निश्चित ही घृत भोजन के अनेक दुर्गुणों को दूर कर देता है। वेद में 'आयुर्वै घृतम्' के अनुसार घी को साक्षात् आयु ही माना है। शुष्क अन्न अनुपात में भी अधिक खाना पड़ता है, इसलिये घृत भोजन का अनिवार्य अंग है। उच्छिष्ट वस्तु में, घृत जैसे रत्न का सम्पर्क करना किसी ब्राह्मण को बलात् कीचड़ में ढकेलने के बराबर है, शुद्ध में ही घृत मिला लेना चाहिए। पत्थर उच्छिष्ट हो जाने पर धोने मात्र से शुद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि वह भी एक पार्थिव द्रव्य ही है। ताम्रपात्र में जल के अतिरिक्त अन्य पदार्थ जल्दी विकृत हो जाते हैं। बड़ आक पीपल के पत्ते का खाद्य पदार्थों से संपृक्त होना स्वास्थ्य के लिये हानिप्रद है, क्योंकि ये सब दूध वाले वृक्ष हैं। ढाक कमल केला आदि स्वभावतः विशुद्ध हैं। इनके ऊपर प्रकृति ने ऐसी पालिश की है कि कोई पदार्थ इनसे विलिप्त नहीं हो सकता। सोना चांदी तैजस पदार्थ हैं; अतः इनका सम्पर्क अन्न को और भी विशुद्ध कर देता है। इस प्रकार भोजन के सम्बन्ध में आवश्यक बहुत से नियम प्रकट किये गये हैं जो धर्मशास्त्रों में देखे जा सकते हैं। विधिवत् भोजन करने का परिणाम आयुष्य वृद्धि है।